बेगूसराय: जिस गांव में लड़कियों ने पहले अपराध झेला, फिर परिवार के ताने; आज अपने खेल प्रतिभा से बेटियों ने बदली बरौनी फ्लैग की तस्वीर

Barauni Flag Girls Sports Talent : कभी डर और अपराध के लिए जाना जाने वाला बरौनी फ्लैग गांव आज खेल प्रतिभाओं के लिए प्रसिद्ध है. यहां की बेटियों ने सामाजिक रूढ़ियों और तानों को पीछे छोड़ते हुए फुटबॉल के मैदान में अपनी पहचान बनाई है. उनका यह सफर सिर्फ खेल तक सीमित नहीं, बल्कि इसने कई बेटियों को सरकारी नौकरी का रास्ता भी दिखाया है.

Barauni Flag Girls Sports Talent : बेगूसराय. कभी जिस गांव की पहचान डर और दहशत के माहौल से जुड़ी थी,आज उसी गांव का नाम खेल प्रतिभाओं के लिए लिया जाता है. 90 के दशक में बंदूकों की आवाज और अपहरण की घटनाओं का खौफ लोगों को घरों में कैद रहने को मजबूर करता था, आज मैदान में बेटियों के कदमों की आहट और खेल की आवाज सुनाई देती है. यह कहानी है बरौनी फ्लैग गांव की,जहां बेटियों ने सामाजिक रूढ़ियों और तानों की परवाह किए बिना खेल के मैदान को अपना मुकाम बनाया. हाफ पेंट पहनकर मैदान में उतरना जहां कभी समाज के लिए चर्चा और मजाक का विषय था, वहां आज वही बेटियां अपने प्रदर्शन से परिवार, समाज और पूरे गांव का सिर गर्व से ऊंचा कर रही हैं.फुटबॉल के मैदान से शुरू हुआ यह सफर कई बेटियों को सरकारी नौकरी तक ले गया.

देखते ही देखते बरौनी फ्लैग की पहचान एक ऐसे गांव के रूप में बनने लगी,जहां घर-घर में खेल प्रतिभाएं तैयार होने लगीं.यही वजह है कि अब इसे लोग खेल गांव के नाम से भी पहचानने लगे हैं.

दहशत के दौर में मैदान तक बेटियों को लाना सबसे बड़ी चुनौती

फुटबॉल कोच संजीव कुमार सिंह उर्फ मुन्ना बताते हैं कि करीब 33 साल पहले लड़कियों को फुटबॉल खेलने के लिए मैदान तक लाना आसान नहीं था .90 के दशक में बिहार के कई इलाकों की तरह यहां भी अपहरण और अपराध का भय लोगों के मन में गहराई तक बैठा हुआ था. स्थानीय दबंगई और अपराध के कारण गोलियों की आवाज से इलाका थर्राता था. ऐसे माहौल में अभिभावक अपनी बेटियों को घर से बाहर भेजने से भी डरते थे, खेल तो दूर की बात थी. इसी डर के बीच कुछ बेटियों ने हिम्मत दिखाई और मैदान में उतरने का फैसला किया.

यमुना भगत स्टेडियम बरौनी फ्लैग

संजीव कुमार सिंह कहते हैं कि उस दौर में किसी लड़की को घर से निकालकर मैदान तक लाना ही अपने आप में बड़ी चुनौती थी. अभिभावकों को हर वक्त किसी अनहोनी की आशंका रहती थी. इसके बावजूद लड़कियों ने खेलना शुरू किया और धीरे-धीरे उनके प्रदर्शन ने लोगों की सोच बदलनी शुरू कर दी.

पहले ताने मिले, फिर उसी समाज ने बजाई तालियां

जब इन लड़कियों ने फुटबॉल खेलना शुरू किया तो परिवार और समाज के एक हिस्से का विरोध भी झेलना पड़ा. कोई कहता था कि लड़कियों का मैदान में जाकर खेलना ठीक नहीं है, तो कोई उनके पहनावे पर सवाल उठाता था. खेलने से क्या होगा? यह सवाल अक्सर बेटियों और उनके परिवारों के सामने खड़ा किया जाता था. लेकिन इन बेटियों ने जवाब शब्दों से नहीं, अपने खेल से दिया.

मैदान में घंटों अभ्यास,घर के कामकाज और सामाजिक तानों के बीच इन खिलाड़ियों ने अपना सफर जारी रखा. समय बदला, खिलाड़ियों ने प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन किया और उनकी सफलता देखकर परिवारों का नजरिया भी बदलने लगा. जो लोग कभी ताने मारते थे, वही बाद में उनकी हौसला अफजाई करने लगे.

अब मैदान में बड़े आयोजनों की दस्तक

बरौनी फ्लैग का यमुना भगत स्टेडियम भी इस बदलती पहचान का गवाह बन रहा है. यहां पहले संतोष ट्रॉफी जैसे बड़े फुटबॉल आयोजन हो चुके हैं और अब खेलो इंडिया के आयोजन राज्य सरकार करा चुके हैं. यह किसी भी गांव के लिए बड़ी उपलब्धि है कि जिस जगह कभी अपराध और भय की चर्चा होती थी, आज उसी जगह बड़े खेल आयोजनों होने के साथ ही उसकी चर्चा हो रही है. यमुना भगत स्टेडियम में बड़े स्तर के आयोजन होना इस बात का संकेत है कि बरौनी फ्लैग अब सिर्फ स्थानीय स्तर पर नहीं, बल्कि खेल के नक्शे पर अपनी पहचान मजबूत कर रहा है.

अन्नू-अंकिता तक, बेटियों ने बनाई सरकारी नौकरी की राह

बरौनी फ्लैग की बेटियों ने सिर्फ फुटबॉल के मैदान पर ही पहचान नहीं बनाई, बल्कि खेल को अपने करियर का माध्यम भी बनाया. अन्नू, रेमी, नव्या ,शिवांजलि, मौसम, रोजी, डेजी, अंकिता समेत कई खिलाड़ियों ने खेल के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकार में सरकारी नौकरी हासिल की.

इन बेटियों की सफलता ने गांव के दूसरे परिवारों को भी प्रेरित किया. अब बेटियों को खेल के मैदान में भेजना परिवारों के लिए शर्म या चिंता का विषय नहीं, बल्कि गर्व का कारण बन चुका है. एक समय जिस गांव में बेटियों के मैदान में उतरने पर सवाल उठते थे, आज उसी गांव की बेटियों की उपलब्धियां नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन रही हैं.

हाफ पेंट से सरकारी नौकरी तक पहुंची कहानी

इन खिलाड़ियों के संघर्ष की कहानी सिर्फ फुटबॉल खेलने तक सीमित नहीं है. यह उस सामाजिक सोच के खिलाफ भी संघर्ष था, जिसमें लड़कियों के पहनावे, घर से बाहर निकलने और खेलकूद में भाग लेने को लेकर तरह-तरह की बंदिशें थीं. मैदान में हाफ पेंट पहनकर उतरने पर कई बार उन्हें रिश्तेदारों और समाज के लोगों के ताने सुनने पड़े. लेकिन खिलाड़ियों ने इन बातों को अपने रास्ते की बाधा नहीं बनने दिया. आज उनकी सफलता उन तमाम सवालों का जवाब है.

जिस खेल को कभी लड़कियों के लिए ठीक नहीं बताया जाता था,उसी खेल ने कई बेटियों को सम्मान, पहचान और सरकारी नौकरी दिलाई.

नई पीढ़ी भी तैयार कर रही है अंतरराष्ट्रीय खेल का सपना

बरौनी फ्लैग की कहानी यहीं खत्म नहीं होती. गांव की नई पीढ़ी भी अब अपने पूर्ववर्ती खिलाड़ियों से प्रेरणा लेकर बड़े सपने देख रही है. इन दिनों युवा खिलाड़ी ऑल इंडिया फुटबॉल टूर्नामेंट में अपना हुनर दिखा चुकी हैं. अब उनकी नजर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने पर है. उनका सपना है कि वे देश के लिए खेलें और स्वर्ण पदक जीतकर भारत के साथ-साथ अपने गांव का नाम भी रोशन करें.

स्थानीय खिलाड़ी बताती हैं कि शुरुआत में समाज और रिश्तेदारों की ओर से तरह-तरह की बातें सुननी पड़ती थीं. लोग कहते थे कि छोटे कपड़े पहनकर खेलने जाती हो, आखिर खेलकर क्या करोगी, लड़की हो तो घर में रहो और घर का काम संभालो. लेकिन इन बातों ने उनके हौसले को कम नहीं किया. 

एक गांव, जिसने बदल दी बेटियों के प्रति सोच

बरौनी फ्लैग की सबसे बड़ी उपलब्धि सिर्फ यह नहीं है कि यहां की कई बेटियों ने खेल में सफलता हासिल की या सरकारी नौकरी पाई. असली बदलाव यह है कि खेल ने पूरे समाज की सोच बदल दी. एक समय बेटियों के मैदान तक पहुंचने पर सवाल खड़े होते थे. आज बेटियों की सफलता पर गांव गर्व करता है. खेल ने यहां सिर्फ खिलाड़ियों को नहीं बदला, बल्कि परिवारों की सोच,समाज का नजरिया और गांव की पहचान तक बदल दी.


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By विकास कुमार

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