बांका में मिट रहे हैं गांवों के कुएं, भूजल संरक्षण और सदियों पुरानी जल संस्कृति पर मंडरा रहा संकट

Traditional Wells Conservation Bihar: कभी गांव की पहचान और जीवनरेखा थे कुएं, आज कचरे से पट रहे हैं पारंपरिक जल स्रोत. विशेषज्ञों ने जताई भविष्य के जल संकट की आशंका.

पंजवारा बांका से गौरव कश्यप की रिपोर्ट

Traditional Wells Conservation Bihar: बदलते दौर में जहां आधुनिक जलापूर्ति व्यवस्था ने लोगों की जिंदगी को आसान बनाया है, वहीं सदियों पुरानी जल संस्कृति धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है. कभी गांवों की पहचान और शुद्ध पेयजल का सबसे भरोसेमंद स्रोत रहे कुएं आज उपेक्षा के शिकार हैं. नल-जल योजना, समर्सिबल पंप और पाइपलाइन आधारित जल व्यवस्था के बढ़ते उपयोग ने पारंपरिक जल स्रोतों की उपयोगिता को कम कर दिया है. परिणामस्वरूप अनेक कुएं या तो कचरे के ढेर में तब्दील हो चुके हैं या फिर उन्हें पूरी तरह पाट दिया गया है.

कभी गांवों की धड़कन हुआ करते थे कुएं

एक समय ऐसा था जब गांवों का सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन कुओं के इर्द-गिर्द घूमता था. सुबह होते ही महिलाओं की आवाजाही, पानी भरने की हलचल और सामाजिक मेलजोल का केंद्र यही कुएं होते थे. पीने के पानी से लेकर भोजन बनाने और घरेलू जरूरतों तक का अधिकांश काम इन्हीं जल स्रोतों पर निर्भर था.

कुएं केवल पानी उपलब्ध कराने का साधन नहीं थे, बल्कि ग्रामीण जीवन की पहचान और सामाजिक एकता के प्रतीक भी माने जाते थे. बदलती जीवनशैली और आधुनिक सुविधाओं के विस्तार के साथ उनकी उपयोगिता घटती चली गई और आज अधिकांश कुएं उपेक्षा की मार झेल रहे हैं.

भूजल संरक्षण की प्राकृतिक व्यवस्था थे कुएं

जल विशेषज्ञों के अनुसार कुएं भूजल संरक्षण और जल पुनर्भरण की प्राकृतिक प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा थे. बारिश का पानी कुओं के माध्यम से जमीन के भीतर पहुंचकर भूजल स्तर को बनाए रखने में मदद करता था. इससे आसपास के क्षेत्रों में जल संतुलन बना रहता था और गर्मी के मौसम में भी पानी की उपलब्धता अपेक्षाकृत बेहतर रहती थी.

कुओं की मौजूदगी मिट्टी में नमी बनाए रखने के साथ-साथ स्थानीय जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाती थी. लेकिन इनके खत्म होने से प्राकृतिक जल चक्र प्रभावित हो रहा है.

आधुनिकता की दौड़ में खो रही जल विरासत

ग्रामीण क्षेत्रों में अब नल-जल योजनाओं और समर्सिबल पंपों पर निर्भरता तेजी से बढ़ी है. सुविधाजनक जलापूर्ति व्यवस्था के कारण लोगों का पारंपरिक जल स्रोतों से जुड़ाव कम हो गया है. कई स्थानों पर पुराने कुओं को अनुपयोगी मानकर पाट दिया गया, जबकि अनेक कुएं रखरखाव के अभाव में जर्जर हो चुके हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल एक जल स्रोत का समाप्त होना नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और पर्यावरणीय विरासत का धीरे-धीरे खत्म होना है.

भविष्य में गहरा सकता है जल संकट

जल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में जल संकट और अधिक गहरा सकता है. भूजल स्तर में लगातार गिरावट और प्राकृतिक रिचार्ज व्यवस्था के कमजोर होने का असर भविष्य में पेयजल उपलब्धता पर पड़ सकता है.

विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में जहां भूजल ही मुख्य जल स्रोत है, वहां कुओं का संरक्षण जल सुरक्षा के लिए बेहद आवश्यक माना जा रहा है.

संरक्षण के लिए सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी

जानकारों का कहना है कि मनरेगा सहित विभिन्न सरकारी योजनाओं के माध्यम से पुराने कुओं की सफाई, मरम्मत और पुनर्जीवन का अभियान चलाया जाना चाहिए. साथ ही पंचायत स्तर पर इन जल स्रोतों की पहचान कर उनके संरक्षण की दिशा में ठोस पहल की जरूरत है.

इसके साथ ही आम लोगों को भी पारंपरिक जल स्रोतों के महत्व के प्रति जागरूक करना होगा. सामुदायिक भागीदारी के बिना इन ऐतिहासिक जल संरचनाओं को बचाना संभव नहीं है.

आने वाली पीढ़ियों के लिए बचानी होगी जल संस्कृति

कुओं का संरक्षण केवल पानी बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान और पर्यावरणीय विरासत को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी है. यदि समय रहते इनके संरक्षण की दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां गांवों की इस समृद्ध जल संस्कृति को केवल इतिहास की किताबों में ही पढ़ सकेंगी.

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Published by: AMIT KR SINHA

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