मंदार पर्वत का सबसे बड़ा रहस्य : क्या नाथ स्थान कभी किसी प्राचीन राजा का राजमहल था?

The mysterious heritage of Mount Mandar : विशाल पत्थर के स्तंभ, पांच फीट मोटी दीवारें और रहस्यमयी गुफा... मंदार की तलहटी में खड़ा यह प्राचीन भवन आज भी इतिहासकारों को उलझा रहा है. बांका के विश्वप्रसिद्ध मंदार पर्वत के नीचे स्थित नाथ स्थान सदियों से रहस्य और इतिहास का केंद्र बना हुआ है. इसकी वास्तुकला, प्राचीन संरचना और ऐतिहासिक संदर्भ इस सवाल को जन्म देते हैं कि आखिर यह भवन कभी मंदिर था, मठ था या किसी राजा का राजभवन?

बौसी, (बांका) से संजीव पाठक की रिपोर्ट

Banka News : बांका जिले के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले मंदार पर्वत की तलहटी में स्थित एक प्राचीन पत्थर निर्मित भवन आज भी इतिहास के अनसुलझे रहस्यों में शामिल है. स्थानीय लोग इसे नाथ स्थान के नाम से जानते हैं, लेकिन इसकी वास्तविक पहचान को लेकर इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के बीच आज भी मतभेद है. कई विद्वानों का मानना है कि यह किसी प्राचीन राजा का राजभवन हो सकता है, जबकि कुछ इसे साधु-संतों के निवास स्थल से जोड़ते हैं.

पत्थरों से बनी संरचना खड़ी करती है कई सवाल

इतिहासकार उदयेश रवि के अनुसार, मंदार विद्यापीठ और पर्वत के बीच एक टीले पर स्थित इस भवन की स्थापत्य शैली इसे सामान्य धार्मिक संरचनाओं से अलग बनाती है. विशाल पत्थर के स्तंभों पर टिका मंडप, मोटी दीवारें और बड़े-बड़े शिलाखंडों से बना अग्रभाग इसकी भव्यता को दर्शाते हैं. पांच कमरों वाले इस भवन का दक्षिणी कक्ष विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है, जहां बने वेंटिलेटर से दीवारों की मोटाई पांच फीट से अधिक होने का संकेत मिलता है.

क्या सातवीं शताब्दी से भी पुराना है यह भवन?

विशेषज्ञों का मानना है कि भवन के निर्माण में उपयोग किए गए पत्थर मंदार पर्वत से ही काटकर लाए गए थे. इसकी प्राचीनता को देखते हुए कई शोधकर्ता इसे पाल वंश के उदय से भी पहले, यानी सातवीं शताब्दी से पूर्व का निर्माण मानते हैं. यदि यह दावा सही साबित होता है, तो यह भवन बिहार की सबसे प्राचीन संरचनाओं में से एक हो सकता है.

1810 के सर्वेक्षण में भी मिलता है उल्लेख

इतिहासकार उदयेश रवि बताते हैं कि नाथ स्थान का उल्लेख इतिहास के दस्तावेजों में भी मिलता है. प्रसिद्ध स्वीडिश सर्वेयर और इतिहास लेखक फ्रांसिस बुकानन हेमिल्टन ने वर्ष 1810-11 के अपने सर्वेक्षण में यहां दशनामी संप्रदाय के साधुओं और उनके गुरु अंतिक नाथ की कब्र का जिक्र किया था. उन्होंने लिखा था कि उस समय परिसर में अंतिक नाथ के शिष्य निवास करते थे और उनकी कब्र भी यहीं स्थित थी.

राजभवन या धार्मिक केंद्र? इतिहासकारों में मतभेद

इतिहासकार उदयेश रवि आगे बताते हैं कि इस भवन की वास्तविक पहचान को लेकर विद्वानों के अलग-अलग मत हैं. प्रसिद्ध इतिहासकार एएस आल्टेकर और राखालदास बनर्जी ने इसे किसी प्राचीन राजभवन का हिस्सा होने की संभावना जताई थी. वहीं बिहार दर्पण के लेखक गदाधर प्रसाद अम्बष्ठ ने इसे चोल राजा का राजभवन बताया है. हालांकि अब तक इस दावे की पुष्टि करने वाले ठोस पुरातात्विक प्रमाण सामने नहीं आये हैं.

रहस्यमयी गुफा बढ़ाती है रोमांच

भवन के सबसे बड़े कक्ष से जुड़े दक्षिणी कमरे में एक रहस्यमयी गुफा भी मौजूद है. वर्तमान में इसका प्रवेश द्वार बंद कर दिया गया है. स्थानीय लोगों के अनुसार अतीत में कई लोग गुफा के भीतर गए, लेकिन वापस नहीं लौटे. इसके बाद सुरक्षा कारणों से इसे बंद कर दिया गया. आज इसी स्थान पर सबलपुर गांव के लोग अपनी कुलदेवी की पूजा-अर्चना करते हैं.

वास्तुकला नहीं देती स्पष्ट जवाब

भवन की सपाट छत, विशाल पत्थर के स्तंभ और गुफानुमा संरचना इसे सामान्य मंदिरों से अलग बनाती है. वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार प्राचीन काल में इतनी भव्य पत्थर संरचनाएं आमतौर पर राजमहलों या प्रमुख धार्मिक स्थलों में ही बनाई जाती थीं. लेकिन इसकी बनावट पारंपरिक मंदिरों जैसी भी नहीं है. यही वजह है कि इसकी वास्तविक पहचान आज भी रहस्य बनी हुई है.

शोध और उत्खनन से खुल सकता है रहस्य

नाथ स्थान आज भी इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और शोधकर्ताओं के लिए अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है. विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक उत्खनन और विस्तृत शोध के माध्यम से ही इस प्राचीन भवन की वास्तविक कहानी सामने आ सकती है. तब तक मंदार पर्वत की तलहटी में खड़ी यह रहस्यमयी धरोहर इतिहास के सबसे दिलचस्प सवालों में से एक बनी रहेगी.

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Author: AMIT KUMAR SINH

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.

Read More
Tags

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >