Banka News: सावन के महीने में सुल्तानगंज से देवघर तक की कांवर यात्रा केवल एक पदयात्रा नहीं, बल्कि आस्था, धैर्य और संकल्प की कठिन परीक्षा मानी जाती है. इस यात्रा के दौरान एक ऐसा पड़ाव आता है, जहां पहुंचते ही हजारों कांवरिया कुछ देर के लिए जरूर रुकते हैं. यहां अक्सर यह आवाज सुनाई देती है, “ए बमजी, अब रुकए सूईया पहाड़ शिवलोक में, पहले अपनी मनोकामना को लेकर पत्थर रखने दिजिए…”
बांका जिले में स्थित सूईया पहाड़ कांवरिया मार्ग का एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक और प्राकृतिक पड़ाव है. मान्यता है कि जो श्रद्धालु सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर पैदल यहां तक पहुंचते हैं और आस्था के साथ पत्थर रखकर मनोकामना मांगते हैं, उनकी इच्छा बाबा भोलेनाथ अवश्य पूरी करते हैं. यही कारण है कि सावन के दिनों में पहाड़ की चोटी पर छोटे-बड़े पत्थरों से बने सैकड़ों छोटे-छोटे प्रतीकात्मक घर दिखाई देते हैं.
सूईया पहाड़ क्यों माना जाता है कांवर यात्रा की अग्निपरीक्षा
सुल्तानगंज से देवघर की लगभग 105 किलोमीटर लंबी पदयात्रा में सूईया पहाड़ की चढ़ाई सबसे चुनौतीपूर्ण पड़ावों में गिनी जाती है. नंगे पैर, कंधे पर कांवर और उसमें भरा गंगाजल लेकर जब श्रद्धालु इस पहाड़ी पर चढ़ते हैं, तो यह उनके शरीर और मन दोनों की परीक्षा बन जाती है.
कई कांवरियों का कहना है कि इस पहाड़ तक पहुंचते-पहुंचते यात्रा की थकान चरम पर होती है, लेकिन चोटी पर पहुंचते ही एक अलग प्रकार की ऊर्जा का अनुभव होता है. स्थानीय मान्यता है कि यहीं से बाबा बैद्यनाथ धाम पहुंचने की तीव्र इच्छा और अधिक प्रबल हो जाती है.
पत्थरों से बनाया जाता है प्रतीकात्मक घर
सूईया पहाड़ की सबसे अनोखी परंपरा है पत्थरों के टुकड़ों से छोटा-सा मकान बनाना. श्रद्धालु पहाड़ की चोटी पर पहुंचकर छोटे और बड़े पत्थरों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर घर जैसा आकार देते हैं. इसे मनोकामना का प्रतीक माना जाता है.
स्थानीय लोगों और कांवरियों के अनुसार, जो भक्त सच्ची श्रद्धा से यहां पत्थर रखकर मन्नत मांगते हैं, उनकी इच्छा पूरी होने की मान्यता है. इसी विश्वास के कारण पहाड़ पर जगह-जगह पत्थरों के छोटे-छोटे ढांचे दिखाई देते हैं, जो वर्षों से चली आ रही इस लोकपरंपरा के साक्षी हैं.
मान्यता है कि सावन में शिव परिवार यहां विराजमान रहता है
सूईया पहाड़ को लेकर एक लोकप्रिय धार्मिक विश्वास यह भी है कि सावन के पूरे महीने भगवान शिव अपने परिवार के साथ इस पहाड़ी पर विराजमान रहते हैं. इसलिए यहां पहुंचने वाले कांवरियों की प्रार्थना सीधे भोलेनाथ तक पहुंचती है.
श्रद्धालु पहले पत्थर रखकर अपनी मनोकामना व्यक्त करते हैं, फिर बोलबम और हर-हर महादेव का जयघोष करते हुए देवघर की ओर आगे बढ़ जाते हैं. कई कांवरिया इसे अपनी यात्रा का सबसे पवित्र और भावनात्मक पड़ाव मानते हैं.
पहाड़ पार करते ही दूर हो जाती है यात्रा की थकान
कांवरियों के बीच यह भी मान्यता प्रचलित है कि सुल्तानगंज से पैदल यात्रा के दौरान जो कठिनाइयां और शारीरिक पीड़ा होती है, वह सूईया पहाड़ पार करने के बाद काफी हद तक कम हो जाती है. श्रद्धालु इसे बाबा की कृपा मानते हैं और नए उत्साह के साथ बैद्यनाथ धाम की ओर प्रस्थान करते हैं.
इसी कारण कई कांवरिया पहाड़ की चोटी पर कुछ देर विश्राम करते हैं, जलपान करते हैं और फिर यात्रा के अगले चरण के लिए निकल पड़ते हैं.
प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है सूईया पहाड़
धार्मिक महत्व के साथ-साथ सूईया पहाड़ अपनी हरी-भरी वनस्पति, प्राकृतिक सौंदर्य और शांत वातावरण के लिए भी प्रसिद्ध है. सावन के दौरान जब चारों ओर हरियाली छा जाती है, तब यह पहाड़ और भी आकर्षक दिखाई देता है.
पहाड़ी की ऊंची चोटी पर कई खान-पान की दुकानें भी सजती हैं, जहां श्रद्धालु चाय, नाश्ता और स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लेते हैं. लंबे सफर के बीच यह स्थान यात्रियों के लिए विश्राम और ऊर्जा दोनों का केंद्र बन जाता है.
Banka News:आस्था और प्रकृति का अनोखा संगम
सूईया पहाड़ केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि कांवर यात्रा की सामूहिक स्मृति और लोकविश्वास का जीवंत प्रतीक है. यहां पत्थर रखना, मनोकामना मांगना, थकान भूल जाना और फिर “बोल बम” के जयघोष के साथ आगे बढ़ जाना, सावन यात्रा की उस परंपरा का हिस्सा है जो पीढ़ियों से चली आ रही है.
इसी वजह से सुल्तानगंज से देवघर जाने वाले हजारों कांवरियों के लिए सूईया पहाड़ आज भी एक ऐसा पड़ाव है, जहां आस्था, प्रकृति और लोकसंस्कृति एक साथ दिखाई देती है.
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