अमरपुर (बांका) से प्रीतम कुमार की रिपोर्ट
Bihar Silk Women Weavers: वर्षों तक घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित रहने वाली महिलाएं आज पावरलूम पर सिल्क वस्त्र तैयार कर परिवार की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रही हैं. पहले जहां परिवार की निर्भरता खेती और दिहाड़ी मजदूरी पर थी, वहीं अब बुनकरी ने आय का नया स्रोत उपलब्ध कराया है. इसका असर बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर पर भी साफ दिखाई दे रहा है.
रंगाई की परेशानी बढ़ा रही लागत और मुश्किलें
बुनकर महिलाओं का कहना है कि तैयार धागों और कपड़ों की रंगाई तथा फिनिशिंग के लिए उन्हें दूसरे जिलों और राज्यों का रुख करना पड़ता है. इससे समय और परिवहन लागत दोनों बढ़ जाते हैं. कई बार काम प्रभावित होने से उत्पादन भी प्रभावित होता है. महिलाओं की मांग है कि स्थानीय स्तर पर आधुनिक रंग-रोगन और फिनिशिंग केंद्र स्थापित किए जाएं, जिससे उत्पादन लागत कम हो और अधिक महिलाएं इस उद्योग से जुड़ सकें.
बाजार नहीं, इसलिए बिचौलियों पर निर्भरता
कटोरिया क्षेत्र की महिलाओं की सबसे बड़ी चिंता तैयार उत्पादों की बिक्री है. स्थायी बाजार के अभाव में उन्हें बिचौलियों के जरिए माल बेचना पड़ता है, जिससे मेहनत के अनुरूप लाभ नहीं मिल पाता. उनका मानना है कि प्रखंड या जिला स्तर पर स्थायी सिल्क मंडी स्थापित होने से वे सीधे खरीदारों तक पहुंच सकेंगी और उत्पाद का उचित मूल्य प्राप्त कर सकेंगी.
सामाजिक सुरक्षा की भी मांग
बुनकर महिलाओं ने सरकार से स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना बीमा, वृद्धावस्था पेंशन और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ सुनिश्चित करने की मांग की है. उनका कहना है कि आर्थिक योगदान देने के बावजूद उन्हें पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं.
बिहार का नया सिल्क हब बन सकता है कटोरिया
ग्रामीणों का मानना है कि यदि सरकार रंग-रोगन केंद्र, भंडारण गृह, स्थायी मंडी, परिवहन सुविधा और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराए तो कटोरिया क्षेत्र बिहार के प्रमुख सिल्क उत्पादन केंद्रों में शामिल हो सकता है. इससे हजारों महिलाओं और युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलेगा और पलायन में भी कमी आएगी. बुनकर महिलाओं का विश्वास है कि उचित सुविधाएं मिलने पर उनके हाथों से तैयार रेशमी वस्त्र राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी अलग पहचान बना सकते हैं.
