बांका : दिगंबर जैन सिद्ध क्षेत्र, बौंसी में चल रहे दश लक्षण महापर्व के चौथे दिन श्रद्धालुओं ने श्रद्धा और भक्ति के साथ उत्तम शौच धर्म का महत्व समझा. इस अवसर पर मंदिर परिसर में धार्मिक और आध्यात्मिक वातावरण बना रहा. बड़ी संख्या में जैन श्रद्धालु पहुंचे और पूजा-अर्चना, साधना समेत विभिन्न धार्मिक गतिविधियों में शामिल हुए.
शरीर ही नहीं, मन-वचन-कर्म की शुद्धता का संदेश
दश लक्षण महापर्व के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म के माध्यम से बाहरी स्वच्छता के साथ आंतरिक पवित्रता का संदेश दिया गया. जैन धर्म में शौच का अर्थ केवल शरीर की स्वच्छता तक सीमित नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म की शुद्धता से भी जुड़ा है.
श्रद्धालुओं को बताया गया कि अशुद्ध विचारों, बुरे संस्कारों और नकारात्मक भावनाओं से दूर रहकर संयम, साधना और आत्मचिंतन के मार्ग पर चलना उत्तम शौच धर्म का सार है.
क्रोध, लोभ, मान और माया से दूर रहने की प्रेरणा
धार्मिक आयोजन के दौरान बताया गया कि क्रोध, लोभ, मान और माया जैसे विकार व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास में बाधक माने जाते हैं. इनसे मुक्त होकर मन की शुद्धता और आत्मचिंतन पर ध्यान देने से साधना, ध्यान और सत्संग में एकाग्रता बढ़ाने की प्रेरणा मिलती है.
उत्तम शौच धर्म के माध्यम से श्रद्धालुओं को आत्मकल्याण और मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए संयमित जीवन अपनाने का संदेश दिया गया.
आत्मशुद्धि और संयम का पर्व है दश लक्षण महापर्व
क्षेत्र प्रबंधक पवन कुमार जैन ने कहा कि दश लक्षण महापर्व आत्मशुद्धि और संयम का संदेश देने वाला महत्वपूर्ण पर्व है. उत्तम शौच धर्म व्यक्ति को अपने भीतर झांकने, नकारात्मक भावनाओं को त्यागने और जीवन में पवित्र विचारों को अपनाने की प्रेरणा देता है.
उन्होंने कहा कि शरीर, वाणी और मन की पवित्रता को जीवन का हिस्सा बनाना ही इस पर्व की सार्थकता है.
इस मौके पर बड़ी संख्या में जैन श्रद्धालु मौजूद रहे. मंदिर परिसर में दिनभर भक्ति और आध्यात्मिकता का माहौल बना रहा.
