Madhushravani Festival : मिथिलांचल का लोकआस्था से जुड़ा प्रमुख पर्व मधुश्रावणी इन दिनों पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है. पर्व के चौथे दिन गुरुवार को पंजवारा में नवविवाहित महिलाओं ने अपने पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना के साथ पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना की. ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पूरे दिन भक्ति और लोकसंस्कृति का अनूठा वातावरण देखने को मिला.
लोकगीतों के बीच गूंजी आस्था की स्वर लहरियां
पर्व के चौथे दिन व्रती महिलाओं ने पारंपरिक लोकगीत गाते हुए मां गौरी, भगवान शिव और विषहरी (नाग देवी) की श्रद्धापूर्वक पूजा की. पूजा के दौरान महिलाओं ने सामूहिक रूप से मधुश्रावणी कथा का श्रवण किया. धार्मिक अनुष्ठानों के साथ लोकगीतों की मधुर धुनों ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया.
पारंपरिक विधि से संपन्न हुआ पूजन
पूजा के दौरान महिलाओं ने टोकरी में फूल, सिंदूर, अष्टदल और मौसमी फल अर्पित कर विधि-विधान से अनुष्ठान संपन्न किया. नवविवाहित महिलाओं ने पूरे मनोयोग और श्रद्धा के साथ पूजा कर अपने वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि और परिवार के मंगल की कामना की. परंपरागत रीति-रिवाजों का पालन करते हुए यह आयोजन आकर्षण का केंद्र बना रहा.
दांपत्य जीवन की खुशहाली का प्रतीक है मधुश्रावणी
जानकारों के अनुसार सावन माह में मनाया जाने वाला मधुश्रावणी पर्व नवविवाहित दंपतियों के प्रेम, विश्वास और अटूट रिश्ते का प्रतीक माना जाता है. यह अनुष्ठान लगातार तेरह दिनों तक चलता है, जिसमें नवविवाहित महिलाएं विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान और कथाओं का श्रवण करती हैं. इस पर्व का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी बेहद खास माना जाता है.
लोक संस्कृति को संजोए रखे हुए है यह पर्व
मधुश्रावणी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मिथिलांचल की समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं का जीवंत स्वरूप भी है. बदलते दौर में भी यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का काम कर रहा है. यही कारण है कि हर वर्ष नवविवाहित महिलाओं में इस पर्व को लेकर विशेष उत्साह और श्रद्धा देखने को मिलती है.
