Banka News: सावन के पवित्र महीने में मिथिला की सांस्कृतिक परंपराएं एक बार फिर पूरे वैभव के साथ जीवंत हो उठी हैं. बांका जिले के पंजवारा और आसपास के क्षेत्रों में इन दिनों मधुश्रावणी पर्व की धूम है. गांव की गलियों, आंगनों और चौपालों में नवविवाहिताओं के कंठ से निकले लोकगीत वातावरण को भक्ति, प्रेम और लोकसंस्कार की मधुर सुगंध से भर रहे हैं. “बाबा यौ पाबनि मोर लगचायल, पिया मोर नहियै ऐलखिन ना…” जैसे गीत केवल संगीत नहीं, बल्कि नवदांपत्य जीवन की भावनाओं, विरह, आस्था और मंगलकामना का जीवंत दस्तावेज हैं.
यह पर्व मिथिला की उन दुर्लभ परंपराओं में शामिल है, जहां लोकगीत, व्रत, पूजा और प्रकृति एक साथ मिलकर सांस्कृतिक विरासत का अनूठा रूप प्रस्तुत करते हैं. मधुश्रावणी का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक जीवन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है.
लोकगीतों से गूंज रहे गांव, हर आंगन में दिख रही सांस्कृतिक छटा
पंजवारा और आसपास के गांवों में इन दिनों नवविवाहिताएं समूह बनाकर पारंपरिक गीत गा रही हैं. “विषहरी लिखबै हमहु मैना पात में, अपन बलम जी के साथ में…”, “गौरी पूजय लेल सीता बेहाल है…” और “मन छल पावैन बलम पूजिती, नहीं ऐला बालम हमर हे…” जैसे गीत पूरे क्षेत्र में गूंज रहे हैं.
इन गीतों में पति के प्रति प्रेम, लंबी आयु की कामना, माता गौरी के प्रति श्रद्धा और लोकजीवन की सरल संवेदनाएं सहज रूप से दिखाई देती हैं. यही कारण है कि मधुश्रावणी पर्व नई पीढ़ी को भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का कार्य कर रहा है.
पति की दीर्घायु के लिए 13 दिनों तक रखा जाता है व्रत
मधुश्रावणी पर्व विशेष रूप से नवविवाहित महिलाओं का पर्व माना जाता है. विवाह के बाद आने वाले पहले सावन में नवविवाहिताएं यह व्रत रखती हैं. पंचमी तिथि से लेकर शुक्ल पक्ष की तृतीया तक चलने वाले इस अनुष्ठान में 13 दिनों तक विशेष पूजा, कथा श्रवण और व्रत का पालन किया जाता है.
स्थानीय परंपरा के अनुसार महिलाएं सुबह स्नान के बाद पूजा की तैयारी करती हैं और दोपहर तक महिला पुरोहित से मधुश्रावणी की कथा सुनती हैं. इस दौरान नाग देवता, माता गौरी, भगवान गणेश और भगवान शिव की आराधना की जाती है.
बासी फूल से होती है मां गौरी की पूजा
मधुश्रावणी की सबसे अनोखी परंपराओं में से एक है बासी फूल से पूजा. नवविवाहिताएं प्रतिदिन अपनी सहेलियों के साथ बगिया में फूल चुनने जाती हैं. चुने गए फूलों को डाली में सजाकर रखा जाता है और अगले दिन उन्हीं बासी फूलों से माता गौरी की पूजा की जाती है.
पूजा के दौरान प्राचीन कथाओं का श्रवण किया जाता है, जिससे यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान न रहकर ज्ञान और परंपरा का माध्यम भी बन जाता है.
स्कंद पुराण से जुड़ी है मधुश्रावणी की मान्यता
लोक मान्यता के अनुसार मधुश्रावणी व्रत का संबंध स्कंद पुराण में वर्णित नाग पूजा से भी है. कहा जाता है कि कुरु प्रदेश के एक राजा को तपस्या से अल्पायु पुत्र प्राप्त हुआ था. उस पुत्र की नवविवाहिता पत्नी मंगलागौरी ने नाग देवता की पूजा कर अपने पति को दीर्घायु प्रदान की. इससे प्रसन्न होकर राजा ने इस पूजा को विशेष सम्मान दिया.
इसी कथा के कारण मधुश्रावणी पर्व में नाग देवता की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है.
माता पार्वती ने सबसे पहले रखा था यह व्रत
मिथिला क्षेत्र में यह भी मान्यता है कि माता पार्वती ने सबसे पहले मधुश्रावणी व्रत रखा था. उन्होंने जन्म-जन्मांतर तक भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए यह अनुष्ठान किया था. इसलिए इस पर्व के दौरान माता पार्वती और भगवान शिव से संबंधित कथाओं का श्रवण भी अनिवार्य माना जाता है.
पूजा में ससुराल से आई पूजन सामग्री, दूध, लावा, फल, मिठाइयां और अन्य पारंपरिक वस्तुओं का विशेष उपयोग होता है.
नाग-नागिन, गौरी और शिव की प्रतिमाओं का पूजन
मधुश्रावणी के दौरान महिलाएं नाग-नागिन, हाथी, माता गौरी और भगवान शिव की प्रतिमाएं बनाकर प्रतिदिन उनका पूजन करती हैं. सुबह और शाम नाग देवता को दूध और लावा का भोग लगाया जाता है.
व्रत रखने वाली महिलाएं पूरे 13 दिनों तक प्रतिदिन केवल एक बार अरवा भोजन ग्रहण करती हैं. यह अनुशासन, संयम और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है.
Banka News: मिथिला की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करता है यह पर्व
सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी मिथिला क्षेत्र में पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है. मधुश्रावणी केवल नवविवाहिताओं का व्रत नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक पहचान, लोकगीतों की विरासत और पारिवारिक मूल्यों का उत्सव है.
पंजवारा और आसपास के क्षेत्रों में इन दिनों हर शाम जब लोकगीतों की स्वर लहरियां गूंजती हैं, तो ऐसा लगता है मानो पूरी मिथिला अपनी परंपरा, प्रेम और आस्था के रंग में डूब गई हो.
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