बौंसी (बांका). चौठ चंदा के अवसर पर सोमवार की शाम बाबूडीह मोहल्ला स्थित कौशल्या देवी के आवास पर आस्था, परंपरा और पारिवारिक प्रेम का अनूठा संगम देखने को मिला. करीब 75 वर्ष की उम्र में भी कौशल्या देवी पिछले 40 वर्षों से चौठ चंदा का निर्जला व्रत करती आ रही हैं. सोमवार को उन्होंने पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर चांद को अर्घ्य दिया. इस दौरान उनके घर पर बड़ी संख्या में रिश्तेदारों के साथ आसपास के ग्रामीण भी मौजूद रहे.
चार दशक से लगातार निभा रही हैं निर्जला व्रत की परंपरा
कौशल्या देवी पिछले चार दशकों से चौठ चंदा का व्रत करती आ रही हैं. उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी आस्था और संकल्प में कोई कमी नहीं आयी है. सोमवार को उन्होंने पूरे दिन निर्जला उपवास रखा और शाम को चांद के दर्शन के बाद पारंपरिक तरीके से पूजा-अर्चना कर अर्घ्य अर्पित किया.
नये मिट्टी के बर्तन में जमाया दही, मौनी में सजाया अर्घ्य
चौठ चंदा की पूजा में पारंपरिक रीति-रिवाजों का विशेष महत्व है. कौशल्या देवी के घर भी इस परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ निभाया गया. पूजा के लिए नये मिट्टी के बर्तन में दही जमाया गया, जबकि अर्घ्य की सामग्री को बांस की मौनी में सजाया गया था. चांद के दर्शन होते ही कौशल्या देवी ने अर्घ्य देकर पूजा पूरी की.
मां के 40 साल पुराने संकल्प में बेटियों ने दिया साथ
कौशल्या देवी की तीनों बेटियां रानी, रेखा और लक्ष्मी भी चौठ चंदा के अवसर पर अपने-अपने ससुराल से मायके पहुंचीं. बेटियों ने मां के व्रत और पूजा की तैयारियों में सहयोग किया. मां के प्रति बेटियों का यह स्नेह और चार दशक पुरानी परंपरा से उनका जुड़ाव चौठ चंदा के पारिवारिक महत्व को दर्शाता है.
75 की उम्र में भी आस्था के आगे उम्र बेअसर
करीब 75 वर्ष की कौशल्या देवी के लिए चौठ चंदा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि चार दशक से चली आ रही आस्था, संकल्प और पारिवारिक परंपरा है. निर्जला उपवास के बावजूद उनके चेहरे पर पूजा को लेकर उत्साह नजर आया. उनकी यह साधना आसपास के लोगों के लिए भी आकर्षण और प्रेरणा का विषय बनी रही.
रिश्तेदारों और ग्रामीणों की मौजूदगी ने बढ़ायी रौनक
चौठ चंदा के मौके पर कौशल्या देवी के घर रिश्तेदारों और आसपास के ग्रामीणों की भीड़ जुटी. लोगों ने पूजा में सहभागिता निभाने के साथ इस पारंपरिक पर्व की खुशियां भी साझा कीं. मां की आस्था, बेटियों के स्नेह और ग्रामीणों के जुड़ाव ने आयोजन को पारिवारिक और सामाजिक एकता का स्वरूप दे दिया.
