सावन में शिवभक्तों की पहली पसंद बना खटनई का बाबा कष्टहरनाथ मंदिर, स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन को उमड़ रही भीड़

खटनई गांव का बाबा कष्टहरनाथ महादेव मंदिर सावन में आस्था का केंद्र बना है, जहाँ भक्त लंबी पदयात्रा कर गंगाजल अर्पित करते हैं. मान्यता है कि बाबा के दरबार में सच्ची प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाती. जानिए इस ऐतिहासिक धाम के रहस्य.

Banka News: सावन के पवित्र महीने में बिहार और झारखंड की सीमा पर स्थित खटनई गांव का ऐतिहासिक बाबा कष्टहरनाथ महादेव मंदिर इन दिनों श्रद्धालुओं की आस्था का बड़ा केंद्र बना हुआ है. हर सोमवार को भागलपुर के बरारी घाट से गंगाजल भरकर कांवरिए और शिवभक्त लंबी पदयात्रा के बाद यहां पहुंच रहे हैं. मंदिर परिसर में सुबह से देर शाम तक “हर-हर महादेव” और “बोल बम” के जयघोष गूंज रहे हैं. स्थानीय मान्यता है कि बाबा कष्टहरनाथ के दरबार में सच्चे मन से की गई प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाती और भक्तों के कष्ट दूर होते हैं.

सावन के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ ने इस ऐतिहासिक धाम को एक बार फिर धार्मिक और सांस्कृतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है.

कैसे प्रकट हुए बाबा कष्टहरनाथ?

स्थानीय लोकमान्यताओं के अनुसार, बहुत पहले खटनई गांव का एक किसान अपने खेत की जुताई कर रहा था. इसी दौरान उसका हल एक रहस्यमयी पत्थर से टकराया और उछलकर उसके माथे पर जा लगा, जिससे रक्त बहने लगा. घटना से हैरान ग्रामीणों ने उस स्थान की खुदाई की, तो वहां से एक विशाल स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ.

ग्रामीणों ने इसे दिव्य संकेत माना और उसी स्थान पर विधि-विधान से पूजा-अर्चना शुरू की. समय के साथ इस शिवलिंग की महिमा दूर-दूर तक फैल गई और भगवान शिव को “कष्टहरनाथ” के नाम से पूजा जाने लगा.

रियासतों ने कराया मंदिर का विकास

इतिहास से जुड़े स्थानीय लोगों के अनुसार, बाद में लक्ष्मीपुर रियासत की रानी और घनैली स्टेट के राजाओं ने मंदिर के निर्माण, संरक्षण और पूजा व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दिया. उनके सहयोग से मंदिर का विस्तार हुआ और यह क्षेत्र धीरे-धीरे एक प्रमुख धार्मिक स्थल के रूप में स्थापित हो गया.

आज भी मंदिर की वास्तुकला और परिसर का स्वरूप उसके ऐतिहासिक महत्व की झलक देता है.

सावन में गंगाजल लेकर पहुंचते हैं कांवरिए

सावन के महीने में बाबा कष्टहरनाथ मंदिर का महत्व और बढ़ जाता है. भागलपुर के बरारी घाट से गंगाजल लेकर कांवरिए यहां पहुंचते हैं और शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं. कई श्रद्धालु बिहार के विभिन्न जिलों के साथ-साथ झारखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों से भी यहां आते हैं.

भक्तों का मानना है कि सावन के सोमवार को बाबा कष्टहरनाथ पर गंगाजल अर्पित करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं.

भूमफोड़ महादेव के रूप में होती है पूजा

मंदिर के पुजारी अरुण चौबे और आचार्य भवेश चौबे के अनुसार, यहां साक्षात भूमफोड़ महादेव विराजमान हैं. उनकी मान्यता है कि बाबा की महिमा अपरंपार है और पीढ़ियों से लोग यहां अपनी समस्याओं, कष्टों और पारिवारिक सुख-समृद्धि की कामना लेकर आते रहे हैं.

अरुण चौबे कहते हैं, “बाबा कष्टहरनाथ की महिमा हमारे पुरखों के जमाने से चली आ रही है. जो भी भक्त यहां आकर अपनी बाधाओं और मनोकामनाओं के साथ प्रार्थना करता है, उसकी मुराद भोलेनाथ अवश्य पूरी करते हैं.

कुलदेवता के रूप में भी पूजे जाते हैं बाबा

बिहार और झारखंड के कई परिवार बाबा कष्टहरनाथ को अपना कुलदेवता मानते हैं. विशेष अवसरों, विवाह, संतान प्राप्ति, स्वास्थ्य और पारिवारिक सुख-शांति की कामना के लिए लोग यहां विशेष पूजा-अर्चना कराने आते हैं.

इसी कारण यह मंदिर केवल सावन तक सीमित नहीं, बल्कि वर्ष भर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना रहता है.

पर्यटन विभाग ने कराए विकास कार्य

झारखंड सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा मंदिर परिसर और शिवगंगा तालाब के आसपास श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए बहुउद्देशीय भवन और धर्मशाला का निर्माण कराया गया है. इससे दूर-दराज से आने वाले भक्तों को ठहरने और विश्राम की सुविधा मिल रही है.

स्थानीय लोगों का मानना है कि धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से यह स्थल और अधिक विकसित हो सकता है.

पेयजल की समस्या अब भी बनी चुनौती

मंदिर के जीर्णोद्धार और पर्यटन सुविधाओं में वृद्धि के बावजूद कुछ बुनियादी समस्याएं अब भी बनी हुई हैं. स्थानीय निवासी कपिलदेव मिश्रा का कहना है कि श्रावण मेले के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं, लेकिन पेयजल की स्थायी व्यवस्था अब भी पर्याप्त नहीं है.

उनका मानना है कि यदि जलापूर्ति और अन्य आधारभूत सुविधाओं को मजबूत किया जाए, तो यह मंदिर क्षेत्रीय धार्मिक पर्यटन का और बड़ा केंद्र बन सकता है.

Banka News: आस्था, इतिहास और प्रकृति का अद्भुत संगम

खटनई गांव का बाबा कष्टहरनाथ महादेव मंदिर केवल एक प्राचीन शिवालय नहीं, बल्कि लोकविश्वास, इतिहास, प्राकृतिक वातावरण और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत संगम है. सावन के दिनों में यहां उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़ इस बात का प्रमाण है कि सदियों पुरानी आस्था आज भी लोगों के जीवन में उतनी ही गहराई से रची-बसी है.

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लेखक के बारे में

By गौरव कश्यप

गौरव कश्यप प्रिंट माध्यम में 14 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 4 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. पंजवारा (बांका) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक गतिविधि, खेल, इतिहास और राजनीतिक गतिविधियों की खबरों में रुचि रखते हैं.

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