कागजों पर ही तोड़ रही हैं दम

चिंताजनक. योजनाएं बनती तो हैं, पर नहीं हो पाती हैं पूरी जिले में योजनाएं तो बनती हैं लेकिन अधूरे में दम तोड़ने के लिए. केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न जन कल्याणकारी योजनाओं का जिले में बुरा हाल है. बांका : जिला में बड़े पैमाने पर योजनाएं लंबित है. उन योजनाओं की भी कमी नहीं […]

चिंताजनक. योजनाएं बनती तो हैं, पर नहीं हो पाती हैं पूरी

जिले में योजनाएं तो बनती हैं लेकिन अधूरे में दम तोड़ने के लिए. केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न जन कल्याणकारी योजनाओं का जिले में बुरा हाल है.
बांका : जिला में बड़े पैमाने पर योजनाएं लंबित है. उन योजनाओं की भी कमी नहीं जिनपर शिलान्यास के बाद कोई काम ही नहीं हुआ. काम शुरू भी हुआ तो योजना आधी अधूरी पड़ी रह गई. सर्वाधिक बुरा हाल सांसद और विधायक निधि से ली गयी योजनाओं का है. अनेक योजनाओं में कागज पर काम पूर्ण दिखाये जाते हैं. धरातल पर योजनाएं नहीं दिखती या फिर योजनाएं दिख भी जाएं तो यह आम लोगों के किसी उपयोग के लायक नहीं होती. लेकिन सरकार की राशि खर्च हो जाती है. उपयोगिता प्रमाण पत्र भी भेज दिये जाते हैं. छोटी योजनाओं की छोड़िए…
सिंचाई, सड़क, ग्रामीण विकास, पेयजल, नगर विकास आदि बड़ी योजनाओं की स्थिति भी इन से बहुत ज्यादा अलग नहीं है. बात तब खुलती है जब इन योजनाओं की किसी आधिकारिक बैठक में समीक्षा होती है और बात योजनाओं के भौतिक सत्यापन तक जा पहुंचती है. तब अधिकारियों के हाथों और पैरों से पसीने निकलने लगते हैं. लेकिन इन्हें कैसे और कहां मैनेज किया जाता है यह संबंधित विभागों के अभियंता खूब जानते हैं.
शनिवार को निगरानी एवं अनुश्रवण समिति की बैठक में योजनाओं को लेकर कुछ इसी तरह की बातें सामने आयिन. योजनाओं के लंबित रहने या अधूरे रहने की वजह जब अधिकारियों और अभियंताओं से पूछी गयी तो वे बगलें झांकने लगे. खास बात यह भी है कि ऐसे मामलों में सीधी कार्यवाही करने की बजाय आला अधिकारी या संबंधित नोडल एजेंसी के पीठासीन पदाधिकारी चाहे वह जनप्रतिनिधि हो या मंत्री, अधिकारियों को सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ देते हैं. उन पर विभागीय कार्यवाही के लिए लिखने की बात कही जाती है. कभी वेतन रोक जाता है तो कभी सिर्फ मौखिक चेतावनी दी जाती है कि समय पर काम पूरा नहीं हुआ तो उन पर कार्रवाई होगी. पर इससे उन अभियंताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता.
कार्रवाई की जगह दी जाती है सिर्फ चेतावनी
जिले में पेयजल योजनाएं भी बदहाल
जिले में गरमी के मौसम में एक ओर जहां पेयजल के लिए हाहाकार मचा था, वहीं पीएचइडी विभाग इससे निबटने की तैयारियां करता रहा. जिले में पेयजल संकट की गंभीर स्थिति से निबटने के लिए विभाग को मुख्यमंत्री चापाकल योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में चापाकल लगाने थे. लेकिन ये चापाकल कहां और किस तरह लगे या वर्तमान में वे किस हाल में है, इसकी जानकारी विभाग को भी नहीं है. शुक्रवार को जिला निगरानी सह अनुश्रवण समिति की बैठक में जब कार्यपालक अभियंता से इस बारे में पूछा गया तो वह इधर उधर देखने लगे. उन्होंने विषय परिवर्तन कर दिया और निर्मल भारत योजना के अंतर्गत शौचालय निर्माण के आंकड़े पेश करने शुरू कर दिये.
योजना में हावी हैं बिचौलिये
इंदिरा आवास योजनाओं की प्रगति भी लक्ष्य के अनुरूप नहीं है. योजना में बिचौलिए हावी हैं. योजना की राशि सीधे लाभुकों को दी जा रही है, बावजूद इसकी समुचित मॉनिटरिंग नहीं होने की वजह से योजना कई क्षेत्रों में दम तोड़ रही है. सिंचाई योजनाओं का सर्वाधिक बुरा हाल है. भू संरक्षण विभाग की ओर से जिले में करोड़ों रुपये की लागत से वर्षा जल संरक्षण एवं सिंचाई के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में तालाब बनाने की बात कही जा रही है. लेकिन ये तालाब कहां और किस हाल में हैं, किसी को कुछ नहीं पता. दो माह पूर्व जिलाधिकारी ने स्वयं इस मामले में पहल करते हुए विभागीय अधिकारी को निर्मित जलाशयों की सूची पेश करने का आदेश दिया था ताकि उनका भौतिक सत्यापन किया जा सके. लेकिन इसका क्या हुआ किसी को कुछ नहीं मालूम.
लघु सिंचाई योजनाओं का बुरा हाल
बांका जिले में लघु सिंचाई विभाग के अंतर्गत 22 उद्वह सिंचाई योजनाएं हैं. लेकिन इन में से सिर्फ एक चालू है. बाकी 21 का कोई अता-पता नहीं. जिले में नहरों की स्थिति भी ठीक नहीं. ओढ़नी जलाशय के बाया नहर पर करोड़ों रुपये व्यय हुए लेकिन यह नहर आज तक पूर्ण नहीं हो सका. सरकट्टा डेम भी आधा अधूरा पड़ा है. जिले में सैकड़ों चौपाल, तालाब, चहारदीवारी, खेल मैदान आदि की योजनाएं हैं जिन के नाम पर बड़े पैमाने पर राशि की बंदरबांट तो हुई लेकिन योजनाएं आज तक पूरी नहीं हो पायीं.

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