नाले तो बन रहे, लेकिन पानी कहां निकलेगा ?

शहर में जगह-जगह नालों का निर्माण किया जा रहा है. यह विकास को दिखाता है. लेकिन गड़बड़ी की बू भी आती है. क्योंकि नाले के पानी की निकासी का कहीं कोई उचित प्रबंध नहीं किया गया है. बांका : शहर में नाले तो बन रहे हैं. लेकिन इनकी निकासी कहां, किधर और कैसे होगी इसका […]

शहर में जगह-जगह नालों का निर्माण किया जा रहा है. यह विकास को दिखाता है. लेकिन गड़बड़ी की बू भी आती है. क्योंकि नाले के पानी की निकासी का कहीं कोई उचित प्रबंध नहीं किया गया है.
बांका : शहर में नाले तो बन रहे हैं. लेकिन इनकी निकासी कहां, किधर और कैसे होगी इसका कोई इंतजाम नहीं है. नगर पंचायत प्रशासन इस दिशा में सुस्त है या फिर जान बुझकर इसके लिए कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है. लेकिन सच तो यह है कि यह समस्या शहर के लिए कोई नई नहीं है. शहर के लोग अर्से से सवाल उठाते रहे हैं कि जब कहीं किसी नाले की निकासी ही नहीं हो पाती तो फिर यहां दनादन नाले क्यों बनबाये जा रहे हैं.
हालांकि नगरवासी भी अब समझने लगे हैं और उन्हें इस सवाल के नगर पंचायत से किसी जवाब की अपेक्षा भी नहीं कि नाले क्यों बनवाये जा रहे हैं. दरअसल हाल में शहरी विकास योजना के तहत बांका नगर पंचायत को विकास के लिए विपुल राशि आवंटित हुई. अब इसे प्रमाद कहें या साजिश, बिना किसी उपयोगिता स्थापन के इस राशि का सद‍्उपयोग करने में नगर पंचायत प्रशासन लग गया. शहर के विभिन्न क्षेत्रों में ताबड़तोड़ नाले बनवाये जाने लगे. वे नाले भी जो पहले से बने थे टूटकर नये नाले की शकल लेने लगे. हद तो ये हुई कि नाले कई स्थानों पर बने नहीं और उद‍्घाटन तक हो गया. शहर में विडंबना यह है कि पिछले दो दशकों से यहां नाले तो बन रहे हैं लेकिन भरने के लिए. क्योंकि यहां इन नालों की निकासी का कोई बंदोबस्त नहीं है. ज्यादातर नाले जहां तहां टूकड़ों में बनाये गये हैं.
सौ दो सौ फीट की दूरी में बने इन नालों का संपर्क किसी और नाले से नहीं. मानो ये नाले ना होकर कोई टंकी हो. शहर के मुख्य बाजार से लेकर गली मुहल्लों तक में यही स्थिति है. इन्हें देखने वाला कोई नहीं है. लिहाजा ये नाले बनते हैं लेकिन जल निकासी की वजह कचरे से भर जाते हैं. बारिश का मौसम शुरू होने वाला है. यहां जल जमाव एक स्थाई समस्या है. मामूली बारिश में शहर जल जमाव की वजह से नरक में तब्दील हो जाता है. लोग घर से बाहर निकलते ही तैर कर सड़कों पर चलने को विवश होते हैं.
लेकिन इससे नगर पंचायत प्रशासन को क्या. फंड आते ही ठेकेदारी प्रथा यहां हावी हो जाती है. कहने को निर्माण होते हैं लेकिन इस निर्माण का कितना लाभ या उपयोग मिल सकता है यह सोचने की फिक्र किसी को नहीं. जनप्रतिनिधि मौन है और नागरिक बेचैन. यह स्थिति दशको से यहां जारी है. जिसका कोई निदान निकलने की संभावना भी दूर – दूर तक नहीं दिखती.

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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