36 की जगह हैं सिर्फ 10 चिकित्सक

100 शैय्या वाले सदर अस्पताल को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए 36 चिकित्सकों की है आवश्यकता. जिनमें कम से कम 8 महिला एवं 28 पुरुष चिकित्सक हो. लेकिन वर्तमान में मात्र एक चौथाई भाग ही चिकित्सक कार्यरत हैं. यानि पुरुष में 7 एवं महिला में 3 चिकित्सक. इन चिकित्सकों में भी सभी विभाग […]

100 शैय्या वाले सदर अस्पताल को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए 36 चिकित्सकों की है आवश्यकता. जिनमें कम से कम 8 महिला एवं 28 पुरुष चिकित्सक हो. लेकिन वर्तमान में मात्र एक चौथाई भाग ही चिकित्सक कार्यरत हैं. यानि पुरुष में 7 एवं महिला में 3 चिकित्सक. इन चिकित्सकों में भी सभी विभाग के चिकित्सक नहीं है जैसे हड्डी, नेत्र, हार्ट एवं शिशु सहित अन्य रोग शामिल हैं.

मवेशियों के साथ नदियों की कछार जा रहे किसान
जल संकट. चुआड़ी खोदने पर भी अब नहीं निकल रहा पानी
जिले के विभिन्न भागों में जल संकट गहरा गया है. चापाकल सूख रहे हैं. ताल-तलैये का पानी पताल जा रहा है. पशुपालकों को अपने मवेशी के लिए पानी नहीं मिल रहा. इस वजह से पशुपालक अब नदियों की कछार की अोर जा रहे हैं.
बांका :जिले में जल संकट की स्थिति उत्तरोत्तर गंभीर होती जा रही है. जिले के दक्षिणी पठारी भूगोल वाले प्रखंडों में पानी के लिए हाहाकार की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है. आमलोगों को पीने लायक स्वच्छ पानी तो दूर, माल मवेशियों को पीने के लिए गड्डों, तालाबों और बावडि़यों आदि तक में पानी नहीं है. क्षेत्र की तमाम नदियां, तालाब आदि सूख चुके हैं.
नदियों की धार में चुआड़ी खोदने पर भी पानी नहीं निकल रहा. भूगर्भीय जल स्तर के काफी नीचे चले जाने की वजह से यह स्थिति उत्पन्न हुई है. क्षेत्र के कुएं सूख चुके हैं. ज्यादातर चापाकल भी फेल हो चुके हैं. जो बचे हैं वो भी फेल होने के कगार पर है. क्षेत्र के किसान माल मवेशियों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं. वे मवेशियों को लेकर पलायन करने लगे हैं.
पलायन का यह सिलसिला पिछले दस दिनों से ज्यादा समय से जारी है. क्षेत्र के किसान बड़ी संख्या में लोग अपने गाय, बैलों, बछड़ों, भैंसों और बकरियों आदि के साथ अपना इलाका छोड़ पानी की तलाश में उत्तर की ओर पलायन कर रहे हैं. गरमी के मौसम में जिले के दक्षिणी इलाके से मवेशियों के साथ किसानों के पलायन का सिलसिला कोई नया नहीं है.
क्षेत्र में हर वर्ष पानी के लिए तबाही मचती है और इससे बचने के लिए किसान अपने मवेशियों को लेकर उत्तर की दिशा में पलायन कर जाते हैं. इस क्षेत्र में उन्हें हरियाली की तलाश होती है. पहले ज्यादातर ऐसे किसानों और मवेशियों के काफिले की यात्रा जिले की सीमा के अंदर ही रह जाती थी. जिले की उत्तरी सीमा चांदन, अंधरी व महमूदा नदियों के संगम सिंहनान क्षेत्र तक है. लेकिन इस बार इस इलाके में भी पानी और हरियाली का अभी से नितांत अभाव है.
करीब 10 हजार किसान जिले के दक्षिणी सीमावर्ती कटोरिया, चांदन, सूईया, भैरोगंज, जयपुर आदि क्षेत्रों से अपने मवेशियों के साथ पलायन करते हैं. इस बार ये किसान अपने मवेशियों के साथ गंगा नदी के कछार तक जाने के मूड में हैं. कटोरिया, सूईया क्षेत्र के धन्नु यादव, गणेशी यादव, मगन मुर्मू, नीलांबर साह, गणेश राय आदि ने बांका – कटोरिया रोड में भसोना बांध तथा सन्हौला नहर के पास बताया कि पिछले दो दिनों से वे यहां अपने मवेशियों के साथ रूके हैं.
लेकिन यहां भी पानी और चारे का अभाव है. उन्हें इस बार नाथनगर, सीमरिया, कजरैली, कहलगांव, सुलतानगंज आदि क्षेत्रों तक जाना होगा. इस जिले में पानी की उम्मीद नहीं है. उन्होंने बताया कि बड़ी संख्या में किसान पहले ही पलायन कर चुके हैं. जबकि सैकड़ों पलायन की तैयारियां कर रहे हैं.
दूध बेच कर होता है गुजारा : मवेशियों के साथ पलायन करने वाले किसानों का गुजारा साथ चल रहे दूधारू मवेशियों का दूध बेच कर होता है. उनके साथ बहुत से लगोर और दूधारू मवेशी भी है. क्षेत्र में इन देशी गायों के दूध की बहुत मांग है. खेतों में ही दूह कर किसान स्थानीय लोगों को दूध बेचते हैं. इससे मिलने वाली राशि से उनका गुजारा होता है.
गोबर की भी मिलती है कीमत :
पानी और चारे की तलाश में अपने मवेशियों के साथ निकली किसानों के साथ एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि जहां तहां अपने खेतों में उनके मवेशियों को ठहराने के एवज में उन्हें राशि एवं भोजन मिल जाता है. स्थानीय किसान अपने खेतों की उर्वरा बढ़ाने के लिए उनके मवेशियों को इसमें बैठाते हैं. यह एक पुरानी परंपरा रही है. इससे मवेशी पालक किसानों को अच्छी खासी आय हो जाती है.
दो माह घर से बाहर रहते हैं पशुपालक : जिले के दक्षिणी पहाड़ी इलाके के पशुपालक किसान अपने मवेशियों के साथ उनके चारे पानी के लिए हर वर्ष करीब दो माह बेघर रहते हैं. खेत बहियार और मैदान ही उनका आशियाना होता है. उन्हें अपने मवेशियों की जीवन रक्षा के लिए बंजारे का जीवन जीना पड़ता है. यह उनके लिए एक बड़ी त्रासदी होती है.
इन किसानों की अपने घर वापसी मौसम में बारिश उतरने के बाद ही हो पाती है. यह स्थिति आधा जेठ बीतने या आषाढ़ माह के प्रवेश के बाद ही आती है. इस दौरान किसान मवेशियों के साथ अपने घर परिवार वालों से दूर ही रहने को विवश होते हैं.
हर साल पलायन करते हैं 10 हजार पशुपालक
जिले के दक्षिणी पठारी भूगोल वाले चार प्रखंडों में पानी के लिए हाहाकार
आदमी तो दूर, मवेशियों तक को पीने के लिए पानी के पड़ रहे लाले
दो महीने रहते हैं मवेशियों के साथ घर से बाहर

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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