गले की हड्डी बनी अंगूरी महुआ
कटोरिया और चांदन प्रखंड के महुआ वन क्षेत्र के किसानों व मजदूरों की कमर इस बार राज्य सरकार के नयी उत्पाद नीति ने तोड़ कर रख दी है. परिणामस्वरूप किसमिस के नाम से प्रसिद्ध महुआ अब कूड़ा बनने की स्थिति में है.
कटोरिया : जो महुआ इलाके के किसानों के लिए आर्थिक रीढ़ साबित होती थी, वही आज गले की हड्डी बनती जा रही है. कल तक हाथों में कंगन दिलाने वाला महुआ, अब हथकड़ी लगाने को आतुर है. चूंकि नये उत्पाद कानून के अनुसार घर में पांच किलो महुआ भी रखने पर जेल जाना पड़ जायेगा. जबकि महुआ के सीजन में गरीब व बेघर मजदूर वर्ग के लोगों घरों व झोपड़ी में भी दो से तीन क्विंटल महुआ सीजन में जमा होता है. उसी से उनके घरों का चूल्हा भी जलता है.
महुआ पेड़ों से गिरते हैं नोट
कटोरिया व चांदन प्रखंड क्षेत्र के राजबाड़ा, कोल्हुआ, देवासी, करडा, इनारावरण, भोरसार, जनकपुर, बाबूकुरा, रतनपुर, डोमावजान, लालपुर, कुसुमजोरी, टोनापाथर आदि इलाकों में महुआ का जंगल काफी अधिक है. महुआ के पेड़ों से गिरने वाला महुआ फूल सीधे सिक्के की तरह होता है. जिसे बटोरने पर वह नोट बन जाता है.
महुआ फसल के कारण इस इलाके के किसान से लेकर मजदूर वर्ग तक की काफी आमदनी होती है. अच्छे किस्म की महुआ की डिमांड शराब फैक्ट्री में होती है, जबकि उदास रंग वाले महुआ का उपयोग मवेशी को खिलाने में किया जाता है. इस बार जहां एक ओर महुआ की फसल का रिकॉर्ड उत्पादन होना तय है, वहीं दूसरी ओर सरकार के फैसले से किसानों व मजदूरों के होठ चिंता से सूख रहे हैं.
