खिलने लगे महुआ के फूल. गंध से खिंचा चला आता है हाथियाें का झुंड

सताने लगा हाथियों का भय कटोरिया : जहां एक ओर कटोरिया व चांदन वन क्षेत्र में महुआ के जंगलों की बहुतायत होना लोगों के लिए वरदान है़ वहीं दूसरी ओर झारखंड के जंगलों से प्रतिवर्ष भटक कर आनेवाले हाथियों के झुंड इस क्षेत्र के लोगों के लिए अभिशाप बन जाते हैं. पिछले तेरह वर्षों से […]

सताने लगा हाथियों का भय

कटोरिया : जहां एक ओर कटोरिया व चांदन वन क्षेत्र में महुआ के जंगलों की बहुतायत होना लोगों के लिए वरदान है़ वहीं दूसरी ओर झारखंड के जंगलों से प्रतिवर्ष भटक कर आनेवाले हाथियों के झुंड इस क्षेत्र के लोगों के लिए अभिशाप बन जाते हैं. पिछले तेरह वर्षों से लगातार हाथियों का झुंड बौंसी-कटोरिया के पहाड़ी व जंगली क्षेत्रों में प्रवेश करता है और जान-माल की भारी क्षति भी पहुंचाता है़ हाथियों की संख्या एक से लेकर तेरह-चौदह तक भी रहती है़ महुआ का सीजन शुरू होते ही हाथियों के भय से ग्रामीण सहमे हुए हैं. महुआ और महुआ से बने देसी शराब की सुगंध से हाथी आकृष्ट होते हैं और गांवों में हमला कर लाखों की क्षति पहुंचा जाते हैं.
जलजमाव वाले स्थान में डालता है डेरा : वर्ष 2003 से ही प्रत्येक वर्ष महुआ के मौसम में यानि मार्च-अप्रैल के महीनों में हाथियों का झुंड प्रवेश कर जल-जमाव वाले स्थानों में दिन भर डेरा जमाये रहता है़ जबकि रात्रि के समय भोजन की तलाश में गांव में घुस कर हमला बोल देता है़ हाथी गेहूं, मकई, महुआ, ईख, केला, पपीता, आम आदि की फसल को बरबाद तो करता ही है, ग्रामीणों द्वारा विरोध करने पर उनके घरों को भी सामूहिक रूप से ढाह कर तोड़ डालता है़
हाथियों के भय से कटोरिया व चांदन प्रखंड के भोरसार, औरावरण, पपरेवा, कलोथर, हिरणा, नारदो, कलोथर, कानीमोह, इनारावरण, जनकपुर, रतनपुर, देवासी, बघवा, गौरीपुर, कालीगढ़ी, घुठिया आदि गांवों के ग्रामीण सहमे हुए हैं़ वहीं दूसरी ओर वन विभाग के पास हाथियों के उत्पात से निबटने का कोई कारगर संसाधन और उपाय उपलब्ध नहीं है. हाथियों का उत्पात शुरू होने पर विभाग द्वारा प्रत्येक वर्ष पश्चिम बंगाल के पुरूलिया से हाथी विशेषज्ञ की टीम को बुला कर झुंड को झारखंड के जंगलों में पुन: प्रवेश कराया जाता है़
कहां से आते पांच करोड़: रेलवे द्वारा वन भूमि के अधिग्रहण के एवज में दिये जाने वाले मुआवजा की राशि से हाथी मैनेजमेंट प्लान में पांच करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव है़ रेलवे द्वारा राशि उपलब्ध कराने के साथ ही वन विभाग द्वारा हाथी मैनेजमेंट प्लान को धरातल पर उतारने का काम शुरू किया जाना था़ लेकिन अब तक रेलवे द्वारा वन विभाग को मुआवजा राशि का भुगतान नहीं किया गया है़ परिणाम स्वरूप योजना के कार्यान्वयन का काम अधर में है और क्षेत्र के लोग हाथी का तांडव झेलने को विवश हैं.
2003 से आ रहा है हाथियों का झुंड, होता है नुकसान
हाथी मैनेजमेंट प्लान
जंगली हाथी को रेलवे लाइन और गांवों से दूर रखने के लिए हाथी मैनेजमेंट प्लान तैयार किया गया है़ जिस पर पांच करोड़ की राशि खर्च होगी़ तीन करोड़ की राशि से रेलवे पटरी के बगल में नाले की खुदाई, जंगली इलाकों में बड़े-बड़े पोखर व चेकडैम की खुदाई, हाथियों के लिए चारा आदि के इंतजाम आदि शामिल हैं. शेष दो करोड़ राशि बैंक में फिक्स करके ब्याज की राशि को रख-रखाव पर खर्च करने की योजना बनी है़
अधर में मैनेजमेंट प्लान
हाथियों के अनुकूल साबित होने वाले कटोरिया के जंगलों में हाथी पुनर्वास योजना के तहत तैयार हाथी मैनेजमेंट प्लान पिछले पांच सालों से अधर में है़ इस महात्वाकांक्षी योजना को धरातल पर उतारने की दिशा में अब तक सशक्त कदम नहीं उठाये गये हैं. यदि देवघर-सुल्तानगंज रेल परियोजना के तहत आगामी महीना में देवघर-भागलपुर रेल परिचालन शुरू होने से पहले हाथी मैनेजमेंट प्लान के तहत काम शुरू नहीं किये गये,
तो वन एवं रेलवे दोनों विभागों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है़ रेल परिचालन से पटरी पार करने के दौरान हाथी के कटने एवं रेल-दुर्घटना होने की भी संभावना बनी रहेगी़

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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