औरंगाबाद में गांवों की शान रहे कुएं अब हो रहे गुम, सूख रहे पारंपरिक जलस्रोत

गांवों के पारंपरिक कुएं, जो कभी जीवन का आधार थे, अब इतिहास बनते जा रहे हैं. जल संरक्षण की कमी से भविष्य में पानी का संकट गहरा सकता है. जानें कैसे.

traditional water sources: कभी गांव की शान और ग्रामीण जीवन का अहम हिस्सा रहे कुएं अब आधुनिक जीवनशैली की भेंट चढ़ते जा रहे हैं. एक समय था जब गांवों में घर के दरवाजे पर बने कुएं से ही पीने से लेकर खाना बनाने तक के लिए पानी मिलता था. कुएं के आसपास सुबह-शाम लोगों की चहल-पहल रहती थी. महिलाएं समूह में कुएं पर पहुंचती थीं, गीत गाते हुए पानी भरती थीं और सिर पर पानी से भरे घड़े लेकर घर लौटती थीं.

समय के साथ हैंडपंप, नल, मोटर और नलकूप का चलन बढ़ा तो पारंपरिक जलस्रोतों की अनदेखी शुरू हो गई. देखते ही देखते अधिकांश कुएं अपना अस्तित्व खोने लगे.

मिट्टी और कचरे से भर गए कई पुराने कुएं

कई गांवों में पुराने कुएं पूरी तरह सूख चुके हैं. उचित जल संरक्षण और रखरखाव के अभाव में कुछ कुएं जर्जर होकर बेकार पड़े हैं, जबकि कई कुओं में मिट्टी और कचरा भर दिया गया है. कुछ जगहों पर स्थिति इतनी बदल गई है कि पुराने कुओं को भरकर उनके ऊपर मकान तक बना दिए गए हैं.

तालाबों की स्थिति भी इससे अलग नहीं है. पारंपरिक जलस्रोतों के लगातार खत्म होने का असर भूजल संरक्षण पर भी पड़ रहा है. जल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इन जलस्रोतों का संरक्षण नहीं किया गया, तो भविष्य में पानी का संकट और गहरा सकता है.

भूजल संरक्षण में कुएं और तालाबों की थी अहम भूमिका

पर्यावरणविदों के अनुसार कुएं और तालाब सिर्फ पानी उपलब्ध कराने के साधन नहीं थे, बल्कि भूजल स्तर को बनाए रखने में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. बारिश का पानी इन जलस्रोतों के माध्यम से जमीन में पहुंचता था, जिससे भूजल का प्राकृतिक रूप से रिचार्ज होता था.

पारंपरिक जलस्रोतों के खत्म होने और भूजल के लगातार दोहन से भविष्य में जल संकट बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. ऐसे में पुराने कुओं और तालाबों का संरक्षण जल प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है.

आस्था और ग्रामीण परंपराओं से भी जुड़ा रहा है कुआं

कुआं सिर्फ पानी का स्रोत नहीं रहा, बल्कि ग्रामीण जीवन और धार्मिक परंपराओं का भी अभिन्न हिस्सा रहा है. गांवों में नवविवाहिता के गृह प्रवेश और नवजात शिशु के जन्म के बाद कुआं पूजन की परंपरा रही है.

शादी-विवाह के दौरान आज भी कई जगहों पर कुआं पूजन की रस्म निभाई जाती है. हालांकि आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव से कई स्थानों पर यह परंपरा अब महज औपचारिकता बनकर रह गई है.

पुराने कुओं की बनावट में दिखती है ग्रामीण वास्तुकला

पुराने कुओं के निर्माण में दिखाई देने वाली वास्तुकला भी ग्रामीण विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है. बुजुर्गों के अनुसार पुराने समय में कुआं और पोखर खुदवाना सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय माना जाता था.

राजा-महाराजाओं और संपन्न लोगों द्वारा सार्वजनिक जलस्रोत बनवाने की परंपरा रही है. वेदों और पुराणों में भी जलस्रोतों के महत्व का उल्लेख मिलता है. ऐसे में पुराने कुएं केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि इतिहास और ग्रामीण संस्कृति के जीवंत प्रतीक भी हैं.

मौसम के अनुसार बदल जाता था कुएं के पानी का तापमान

बुजुर्ग बताते हैं कि पुराने कुओं का पानी प्राकृतिक रूप से मीठा और ठंडा होता था. गर्मी के मौसम में कुएं का पानी ठंडा और सर्दियों में अपेक्षाकृत गर्म महसूस होता था. ग्रामीण लंबे समय तक इसी पानी का इस्तेमाल पीने और घरेलू जरूरतों के लिए करते रहे.

अब बोतलबंद पानी और आधुनिक जलापूर्ति व्यवस्था ने ग्रामीण जीवन का स्वरूप बदल दिया है. सुविधा के बढ़ते साधनों के बीच पारंपरिक जलस्रोत धीरे-धीरे लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से दूर होते चले गए.

पुराने कुओं को फिर से विकसित करने की मांग

ग्रामीणों और बुजुर्गों का कहना है कि पुराने और जर्जर कुओं की पहचान कर उनकी मरम्मत कराई जानी चाहिए. नियमित सफाई और उचित रखरखाव के साथ इन्हें स्थानीय स्तर पर जल संरक्षण और पेयजल के वैकल्पिक स्रोत के रूप में विकसित किया जा सकता है.

इससे न केवल जल संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों की सदियों पुरानी जल संस्कृति और विरासत को भी बचाया जा सकेगा.

क्या कहते हैं चिकित्सक

प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. संजय कुमार बताते हैं कि कुएं का पानी स्वच्छ और सुरक्षित हो तथा समय-समय पर कुएं की सफाई कराई जाए और उसे ढककर रखा जाए, तो उसका इस्तेमाल किया जा सकता है.

उन्होंने बताया कि पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच जरूरी है. दूषित या खुले कुएं का पानी पीने से स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती है. इसलिए किसी भी कुएं के पानी को पीने से पहले उसकी गुणवत्ता और स्वच्छता सुनिश्चित करना आवश्यक है.

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By विनय सिंह

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