औरंगाबाद शहर. राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था 'शब्दाक्षर' की जिला इकाई के तत्वावधान में राष्ट्रीय प्रचार मंत्री धनंजय जयपुरी के आवास पर अतिथि साहित्यकार अरविंद पाठक 'निष्काम' के सम्मान में एक शानदार काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया.
कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथि कवि को अंगवस्त्र और जिले के साहित्यकारों की प्रकाशित पुस्तकें भेंट कर किया गया. इसके बाद आयोजित काव्य-गोष्ठी में भक्ति, श्रृंगार, हास्य और वीर रस की कविताओं ने उपस्थित श्रोताओं को देर तक मंत्रमुग्ध बनाए रखा.
कवि अरविंद पाठक 'निष्काम' की अध्यक्षता तथा अनिल 'अनल' के कुशल संचालन में आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती की वंदना के साथ हुई. आयोजक धनंजय जयपुरी ने मां की महिमा पर आधारित अपनी भावपूर्ण कविता - "मां से बढ़कर नहीं कोई नाता, है पिता, बाद जानो विधाता"- का पाठ कर पूरे वातावरण को भावुक कर दिया.
इसके बाद अपनी बेहतरीन गजलों के लिए प्रसिद्ध हिमांशु 'चक्रपाणि' ने अपना लोकप्रिय शेर - "वो अपने होंठ से मेरी गजल जब गुनगुनाते हैं, गजल के शब्द सारे फूल बनके मुस्कुराते हैं" - सुनाकर श्रोताओं से खूब वाहवाही बटोरी.
कविताओं के साथ गूंजती रही तालियां, ठहाकों से सराबोर रहा माहौल
गोष्ठी के अगले क्रम में कवि अनुज बेचैन ने अपनी गजल - "किस-किस तरह के ख्वाब दिखाने लगे हैं लोग, छू-छू के घाव दर्द बढ़ाने लगे हैं लोग"- प्रस्तुत कर वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर बेहद प्रभावी टिप्पणी की.
वहीं, डॉ. ओमप्रकाश पांडेय ने अपने दोहे -"मृदु शब्दों की वर्तिका, स्वर-व्यंजन का दीप, मधुर छंद के थाल में, सजा ज्ञान संदीप"-सुनाकर श्रोताओं की भरपूर सराहना प्राप्त की.
संचालक अनिल 'अनल' ने अपने चर्चित मुक्तक -"फेंके हुए पैसे को उठाता नहीं हूं मैं, हर दर पे जाके सर को झुकता नहीं हूं मैं" -का ओजपूर्ण पाठ किया, जिस पर पूरा सभागार देर तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा.
इसके अलावा, कवि नागेंद्र कुमार केशरी ने वीर रस से ओतप्रोत कविता -"पौरव कुल का राजा पोरस, था वह सिंह निराला, यूनानी आंधी का जिसने दम्भ चूर कर डाला"- सुनाकर श्रोताओं के दिलों में राष्ट्रभक्ति का जोश भर दिया.
अध्यक्षीय संबोधन और साहित्यिक परंपरा की सराहना
अपने अध्यक्षीय संबोधन में मुख्य अतिथि व वरिष्ठ कवि अरविंद पाठक 'निष्काम' ने कहा कि औरंगाबाद से उनका अत्यंत आत्मीय और पुराना रिश्ता रहा है.
उन्होंने साझा किया कि उनका ननिहाल इसी शहर में है और उनका बचपन यहीं बीता है. उन्होंने दिवंगत कवि मिथिलेश मधुकर को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए औरंगाबाद जिले की समृद्ध साहित्यिक परंपरा की मुक्तकंठ से सराहना की.
अपने विशेष काव्य पाठ के दौरान उन्होंने- "जो चला नहीं पथरीले पथ, जो चढ़ा नहीं पर्वत पर, जो देख नहीं पाया सूर्योदय, मैं उसकी बात करूं ही क्यों"- पंक्तियां सुनाकर श्रोताओं को पूरी तरह भावविभोर कर दिया.
पूरे आयोजन के दौरान कविता, गजल, हास्य और ठहाकों का ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिला कि सभी साहित्य प्रेमी देर तक शब्दों के इस अनूठे उत्सव का आनंद लेते रहे. इस सफल आयोजन ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि औरंगाबाद की साहित्यिक धरती आज भी रचनात्मक ऊर्जा और संवेदनशीलता से पूरी तरह समृद्ध है.
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