19 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हुए थे जगतपति कुमार, बोले थे- 'दम है तो सीने पर मारो'

Aurangabad News : 19 साल की उम्र में शहीद हुए जगतपति कुमार की कहानी, जिन्होंने पटना सचिवालय गोलीकांड में अंग्रेजों को ललकारते हुए सीने पर गोली खाई थी. जानें उनका बलिदान.

Aurangabad News : आजादी की लड़ाई का इतिहास बिहार के उन सात अमर शहीद छात्रों के बलिदान के बिना अधूरा है, जिन्होंने 11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने की कोशिश में अंग्रेजों की गोलियां अपने सीने पर खायी थीं. इन सात वीरों में औरंगाबाद जिले के ओबरा प्रखंड के खरांटी गांव के लाल जगतपति कुमार का नाम भी स्वर्णाक्षरों में दर्ज है. महज 19 वर्ष की उम्र में देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले जगतपति ने गोली लगने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी थी. अंग्रेज सिपाहियों को ललकारते हुए उनकी आवाज गूंजी थी- 'पैरों पर क्यों गोली मार रहे हो, दम है तो सीने पर मारो.' आजादी के 75 वर्ष से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी खरांटी की मिट्टी अपने इस वीर सपूत की शहादत की कहानी कहती है. गांव में पुनपुन नदी के किनारे बना उनका स्मारक उनकी वीरता की याद दिलाता है, जबकि उनका पुश्तैनी घर अब खंडहर में तब्दील हो चुका है.

जमींदार परिवार में जन्मे, लेकिन दिल में थी आजादी की आग

जगतपति कुमार का जन्म 7 मार्च 1923 को खरांटी गांव में हुआ था. उनके पिता सुखराज बहादुर क्षेत्र के प्रतिष्ठित जमींदार थे और माता का नाम देवरानी था. तीन भाइयों में सबसे छोटे जगतपति का परिवार संपन्न था, लेकिन उनके मन में बचपन से ही देश को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त कराने की बेचैनी थी. गांव के लोग उन्हें प्यार से 'जागो भैया' कहकर पुकारते थे. जगतपति की प्रारंभिक शिक्षा गांव में हुई. उच्च शिक्षा के लिए वे पटना पहुंचे. पटना कॉलेजिएट स्कूल से मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने बीएन कॉलेज में आईएससी प्रथम वर्ष में दाखिला लिया. कॉलेज पहुंचते ही वे स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों में सक्रिय हो गये.

भारत छोड़ो आंदोलन में निभायी निर्णायक भूमिका

8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने 'भारत छोड़ो' आंदोलन का आह्वान किया. इसके बाद पटना में भी आंदोलन तेज हो गया. 9 अगस्त को डॉ. राजेंद्र प्रसाद की गिरफ्तारी की खबर पहुंची तो छात्रों में आक्रोश फैल गया. जगतपति कुमार ने छात्रों को संगठित कर जुलूस निकाला. 10 अगस्त को उन्होंने बीएन कॉलेज की छत पर तिरंगा फहराया. अगले दिन अनुग्रह नारायण सिंह की गिरफ्तारी के बाद छात्रों का आक्रोश और बढ़ गया. हजारों छात्रों ने सचिवालय पर तिरंगा फहराने का संकल्प लिया. इस जुलूस का नेतृत्व जगतपति कुमार कर रहे थे.

पैर में लगी गोली, फिर भी नहीं रुके जगतपति

11 अगस्त 1942 को छात्रों की टोली पटना सचिवालय के पूर्वी गेट के पास पहुंची. ब्रिटिश प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आदेश दिया. पहली गोली जगतपति के पैर में लगी. वे जमीन पर गिर पड़े, लेकिन अगले ही पल उठ खड़े हुए. उन्होंने अपनी कमीज के बटन खोल दिये और अंग्रेज सिपाहियों को चुनौती देते हुए कहा- 'पैरों पर क्यों गोली मार रहे हो, दम है तो सीने पर मारो.' इसके बाद चली गोलियां उनके सीने को छलनी कर गयीं और वे शहीद हो गये. उस दिन सचिवालय गोलीकांड में कुल सात छात्र शहीद हुए थे. यह घटना इतिहास में पटना सचिवालय गोलीकांड के नाम से दर्ज है.

शहादत के बाद भी परिवार ने नहीं लिया सरकारी लाभ

जगतपति की शहादत की खबर खरांटी पहुंची तो परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. बताया जाता है कि बेटे की शहादत से उनके पिता सुखराज बहादुर इतने व्यथित हुए कि उनकी आंखों की रोशनी चली गयी. इसके बावजूद परिवार ने देशभक्ति की मिसाल कायम रखी. शहीद के माता-पिता ने अंग्रेज सरकार की ओर से मिलने वाली पेंशन और अन्य सुविधाएं स्वीकार करने से इनकार कर दिया. परिवार ने अपनी जमीन पर ही जगतपति की स्मृति में स्मारक बनवाया.

स्मारक बना, लेकिन पुश्तैनी घर हो गया खंडहर

जगतपति कुमार की स्मृति से जुड़े दो प्रमुख स्थान हैं. पटना सचिवालय के सामने सप्तमूर्ति शहीद स्मारक में सातों शहीद छात्रों की प्रतिमाएं स्थापित हैं. वहीं खरांटी में पुनपुन नदी के किनारे उनका स्मारक बनाया गया है. स्थानीय लोगों के अनुसार, वर्ष 1976 में स्वतंत्रता सेनानियों ने जनसहयोग से स्मारक का निर्माण कराया था. वर्ष 1998 में तत्कालीन विधायक और वर्तमान काराकाट सांसद राजाराम सिंह ने अपनी विधायक निधि से वहां एक छोटा पार्क भी बनवाया था. हालांकि, समय के साथ देखरेख के अभाव में यह स्थान उपेक्षा का शिकार हो गया. स्मारक परिसर में संसाधनों की कमी साफ दिखाई देती है और शहीद का पुश्तैनी घर खंडहर में बदल चुका है. चारों ओर घास उग आयी है. परिवार के अधिकांश लोग अब अन्यत्र बस चुके हैं. हर वर्ष 11 अगस्त को शहादत दिवस पर स्मारक को सजाया जाता है और श्रद्धांजलि दी जाती है, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षभर इस ऐतिहासिक स्थल की सुध लेने वाला कोई नहीं होता.

तीन वर्षों से तिरंगा यात्रा के जरिए शहीद को नमन

जगतपति कुमार की शहादत को नयी पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए सड़क दुर्घटना रोकथाम समिति के तत्वावधान में पिछले तीन वर्षों से शहादत दिवस पर विशेष आयोजन किया जा रहा है. स्कूली बच्चों के नेतृत्व में भव्य तिरंगा यात्रा निकाली जाती है. प्रभात फेरी ओबरा तक पहुंचती है और मुख्य सड़क से होते हुए शहीद के शहादत स्थल तक जाती है. इस आयोजन के माध्यम से स्थानीय लोग और विद्यार्थी शहीद जगतपति कुमार के बलिदान को याद करते हुए उनके देशप्रेम और साहस की कहानी नयी पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं.

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By Brajesh divedi

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