Aurangabad News : औरंगाबाद जिले में पंचायती राज और नगर निकायों में महिलाओं को आरक्षण देकर उन्हें राजनीतिक भागीदारी का अवसर तो दिया गया, लेकिन कई सरकारी बैठकों में महिला जनप्रतिनिधियों की जगह उनके पति के शामिल होने का सिलसिला अब भी जारी है. सरकार के स्पष्ट निर्देश के बावजूद नगर पंचायत, नगर परिषद, जिला परिषद, पंचायत समिति और विभिन्न विभागों की बैठकों में प्रतिनिधि पतियों का प्रभाव देखने को मिल रहा है.कई जगह तो वे बैठकों में न केवल शामिल होते हैं, बल्कि योजनाओं और विकास कार्यों से जुड़े फैसलों में भी अपनी राय रखते हैं.
महिला जनप्रतिनिधि की जगह पति करते हैं प्रतिनिधित्व
जिले के लगभग तमाम प्रखंडों में ऐसी स्थिति सामने आने की बात कही जा रही है.पंचायत समिति की बैठकों में महिला पंचायत प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पति के पहुंचने और चर्चा में भाग लेने की शिकायतें आम हैं.इसी तरह कई पंचायतों में महिला मुखिया की जगह उनके पति बैठकों में शामिल होकर योजनाओं और विकास कार्यों को लेकर अधिकारियों से बातचीत करते नजर आते हैं. वार्ड पार्षदों के मामले में भी कई स्थानों पर महिला पार्षद की जगह उनके पति बैठकों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं.
रोगी कल्याण समिति की बैठकों में भी हस्तक्षेप
सरकारी अस्पतालों में होने वाली रोगी कल्याण समिति की बैठकों में भी महिला जनप्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पति के शामिल होने की शिकायतें सामने आती रही हैं. अस्पताल की व्यवस्था, मरीजों की सुविधाओं और विकास कार्यों से जुड़े विषयों पर होने वाली इन बैठकों में प्रतिनिधि पतियों की मौजूदगी सवाल खड़े करती है. लोगों का कहना है कि जिस महिला जनप्रतिनिधि को जनता ने चुना है, निर्णय लेने का अधिकार भी उसी का होना चाहिए.
सरकारी बैठकों में शामिल होने पर रोक के बावजूद स्थिति जस की तस
सरकार की ओर से कई बार स्पष्ट किया जा चुका है कि निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधि ही आधिकारिक बैठकों में शामिल होंगी. उनके पति या अन्य प्रतिनिधियों को उनकी जगह बैठक में भाग लेने और निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनने का अधिकार नहीं है. इसके बावजूद जमीनी स्तर पर नियमों का पालन नहीं होने की शिकायतें सामने आ रही हैं. सवाल उठता है कि यदि अधिकारी बैठक में ऐसे प्रतिनिधियों की मौजूदगी स्वीकार कर रहे हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है.
महिला सशक्तीकरण के उद्देश्य पर भी सवाल
महिला आरक्षण का उद्देश्य महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में सीधे भागीदार बनाना है लेकिन अगर निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की जगह उनके पति ही सरकारी बैठकों में पहुंचकर निर्णय लेने लगें, तो आरक्षण और महिला सशक्तीकरण का मूल उद्देश्य ही प्रभावित होता है. अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन सरकारी बैठकों में महिला जनप्रतिनिधियों की अनिवार्य उपस्थिति सुनिश्चित करे और उनके स्थान पर शामिल होने वाले प्रतिनिधि पतियों पर नियमानुसार कार्रवाई करे.
नवीनगर और रफीगंज में महिला प्रतिनिधियों की जगह पतियों का दबदबा
नगर पंचायत नवीनगर और नगर पंचायत रफीगंज में महिला जनप्रतिनिधियों की जगह उनके पतियों के सरकारी बैठकों में शामिल होने का मामला चर्चा में है. आरोप है कि कई बैठकों में महिला वार्ड पार्षदों की जगह उनके पति पहुंचकर न केवल मौजूदगी दर्ज कराते हैं, बल्कि बैठक की चर्चा और निर्णय प्रक्रिया में भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं. इससे महिला जनप्रतिनिधियों के अधिकार और सरकार के महिला सशक्तीकरण के उद्देश्य पर सवाल उठ रहे हैं. नियमों के अनुसार निर्वाचित जनप्रतिनिधि को ही बैठक में शामिल होकर अपनी बात रखने का अधिकार है. इसके बावजूद प्रतिनिधि पतियों की मौजूदगी पर रोक नहीं लगने से व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं
ईओ और बीडीओ की भूमिका पर उठे सवाल
महिला जनप्रतिनिधियों की जगह उनके पतियों के सरकारी बैठकों में शामिल होने के बावजूद संबंधित अधिकारी कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे हैं, यह बड़ा सवाल बन गया है.नगर निकायों में ईओ और पंचायत स्तर पर बीडीओ की मौजूदगी में बैठकें होती हैं. ऐसे में नियमों के विपरीत प्रतिनिधि पतियों की भागीदारी पर रोक लगाने की जिम्मेदारी भी अधिकारियों की है.इसके बावजूद अनदेखी से प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं. क्या अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं है या जानबूझकर चुप्पी साधी जा रही है?बड़ी बात यह है की ईओ और बीडीओ के बगल में ही कुर्सी पर प्रतिनिधि बैठते हैं. इतना सब कुछ देखने के बाद भी कार्यवाई नहीं होना सिस्टम की लाचारी को दर्शाता है.
क्या कहता है नियम
महिला जनप्रतिनिधि (जैसे मुखिया, सरपंच, वार्ड पार्षद आदि) की जगह उनके पति या किसी अन्य पुरुष रिश्तेदार का सरकारी बैठकों में शामिल होना अवैध और नियमों के विरुद्ध है. ऐसा करने पर संबंधित महिला जनप्रतिनिधि की सदस्यता या पद जा सकता है.
कानूनी व प्रशासनिक कार्रवाई
पद से बर्खास्तगी: पंचायती राज और शहरी विकास विभाग के सख्त निर्देश हैं कि यदि बैठक में महिला के स्थान पर उनके पति या प्रतिनिधि शामिल होते हैं, तो निर्वाचित महिला प्रतिनिधि की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है और उन्हें पद से हटाया जा सकता है. प्रतिबंध: पति या पुरुष रिश्तेदारों को प्रशासनिक, वित्तीय और निर्णय लेने वाली बैठकों में भाग लेने की कोई कानूनी अनुमति नहीं है.
अधिकारियों पर कार्रवाई: यदि सरकारी अधिकारी (जैसे बीडीओ, सीओ या सचिव) पति को प्रतिनिधि के रूप में बैठक में शामिल होने की अनुमति देते हैं, तो उन अधिकारियों पर भी प्रशासनिक गाज गिर सकती है.
इस नियम का मुख्य उद्देश्य
नारी सशक्तिकरण: महिलाओं को वास्तविक रूप से मजबूत बनाना है ताकि 'सरपंच पति' या 'मुखिया पति' जैसी समानांतर सत्ता प्रथा (प्रॉक्सी गवर्नेंस) खत्म हो सके. निर्वाचित महिला को अपने क्षेत्र के विकास कार्यों, बैठकों और प्रशासनिक जिम्मेदारियों का निर्वहन स्वयं करना अनिवार्य है.
