गर्भावस्था में निर्जला व्रत से बचें, मां और शिशु दोनों के लिए हो सकता है नुकसान : डॉ. कंचन कुमारी

Aurangabad News : गर्भावस्था के दौरान निर्जला व्रत रखना मां और शिशु की सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है. विशेषज्ञ डॉ. कंचन से जानें उपवास से जुड़ी सावधानियां और सही आहार के नियम.

Aurangabad News : तीज, करवा चौथ, हरितालिका, सोमवारी, नवरात्रि, एकादशी और अन्य धार्मिक व्रत भारतीय संस्कृति और आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. लेकिन जब बात गर्भवती महिलाओं की आती है तो चिकित्सक बिना सलाह के कठिन या निर्जला व्रत रखने से बचने की सलाह देते हैं. स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. कंचन कुमारी का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान मां का खान-पान सीधे गर्भ में पल रहे शिशु के विकास को प्रभावित करता है. ऐसे में लंबे समय तक भूखे रहना या पानी नहीं पीना मां और गर्भस्थ शिशु, दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है.

भूखे रहने से मां और शिशु दोनों पर पड़ सकता है असर

डॉ. कंचन कुमारी ने बताया कि गर्भस्थ शिशु को सभी आवश्यक पोषक तत्व मां के भोजन के माध्यम से ही प्राप्त होते हैं. यदि गर्भवती महिला लंबे समय तक भोजन या पानी का सेवन नहीं करती है तो शरीर में ऊर्जा और पोषण की कमी होने लगती है. इससे कमजोरी, चक्कर आना, ब्लड शुगर कम होना, डिहाइड्रेशन और रक्तचाप में उतार-चढ़ाव जैसी समस्याएं हो सकती हैं. इसका सीधा प्रभाव गर्भस्थ शिशु के विकास पर भी पड़ सकता है.

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निर्जला व्रत गर्भवती महिलाओं के लिए नहीं है उपयुक्त

उन्होंने कहा कि विशेष रूप से निर्जला व्रत गर्भवती महिलाओं के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं माना जाता. शरीर में पानी की कमी होने पर डिहाइड्रेशन की स्थिति बन सकती है, जिससे गर्भस्थ शिशु तक पर्याप्त रक्त और पोषण पहुंचाने में बाधा उत्पन्न हो सकती है. ऐसी स्थिति मां और शिशु, दोनों के स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकती है.

समय से पहले प्रसव का भी बढ़ सकता है खतरा

डॉ. कंचन कुमारी ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान लगातार पोषण की कमी रहने से शिशु का जन्म के समय वजन कम हो सकता है. इसके अलावा समय से पहले प्रसव (प्री-टर्म बर्थ), शिशु के शारीरिक विकास में बाधा और जन्म के बाद विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं का खतरा भी बढ़ सकता है. इसलिए गर्भावस्था के दौरान संतुलित और पौष्टिक भोजन करना सबसे आवश्यक है.

शारीरिक उपवास नहीं, आध्यात्मिक साधना को दें प्राथमिकता

उन्होंने कहा कि गर्भवती महिला के लिए सबसे बड़ा धर्म और सबसे बड़ा व्रत अपने गर्भस्थ शिशु को स्वस्थ रखना है. इस दौरान समय पर पौष्टिक भोजन करना, पर्याप्त मात्रा में पानी पीना, फल, दूध, दही, हरी सब्जियां और प्रोटीनयुक्त आहार लेना आवश्यक है. साथ ही डॉक्टर द्वारा दी गई आयरन, कैल्शियम और अन्य दवाओं का नियमित सेवन भी करना चाहिए. डॉ. कंचन कुमारी ने सलाह दी कि यदि कोई महिला धार्मिक आस्था के कारण व्रत रखना चाहती है तो शारीरिक उपवास की बजाय मानसिक और आध्यात्मिक साधना को प्राथमिकता दे. भगवान का स्मरण, पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन, मंत्र जाप, ध्यान और सत्संग जैसे माध्यम अपनाकर भी धार्मिक आस्था का पालन किया जा सकता है.

पूर्णिमा और अमावस्या को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण नहीं

डॉ. कंचन कुमारी ने स्पष्ट किया कि चिकित्सकीय दृष्टि से गर्भावस्था के दौरान किसी भी दिन भोजन छोड़ने की सलाह नहीं दी जाती. यदि किसी विशेष धार्मिक कारण से हल्का फलाहार या तरल पदार्थ लेने की इच्छा हो तो यह केवल चिकित्सकीय सलाह के बाद ही किया जाना चाहिए. नारियल पानी, दूध, ताजे फल या अन्य हल्का पौष्टिक आहार कुछ परिस्थितियों में विकल्प हो सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक भूखे रहना या पानी नहीं पीना उचित नहीं है. उन्होंने कहा कि पूर्णिमा या अमावस्या के आधार पर उपवास को सुरक्षित या असुरक्षित मानने के पक्ष में पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं. इसलिए गर्भवती महिलाओं को धार्मिक मान्यताओं के बजाय अपने चिकित्सक की सलाह को प्राथमिकता देनी चाहिए.

बिना डॉक्टर की सलाह कोई भी उपवास न करें

डॉ. कंचन कुमारी ने कहा कि प्रत्येक गर्भावस्था अलग होती है. किसी महिला को उच्च रक्तचाप, मधुमेह, एनीमिया, थायरॉयड, जुड़वा गर्भ या अन्य चिकित्सकीय समस्याएं हो सकती हैं. ऐसे में उपवास का निर्णय स्वयं लेने के बजाय स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करना चाहिए. डॉक्टर मां और गर्भस्थ शिशु की स्वास्थ्य स्थिति का मूल्यांकन कर उचित सलाह देते हैं. उन्होंने सभी गर्भवती महिलाओं और उनके परिवार के सदस्यों से अपील की कि धार्मिक आस्था का सम्मान करें, लेकिन मां और शिशु की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें. स्वस्थ मां ही स्वस्थ और सुरक्षित शिशु को जन्म दे सकती है.

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By Manish raj singham

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