औरंगाबाद में फीकी पड़ रही सावन की परंपराएं, झूले, कजरी और मल्हार की गूंज अब बन रही यादें

औरंगाबाद में सावन की पारंपरिक रौनक धीरे-धीरे कम हो रही है. कभी गांवों से लेकर शहरों तक झूले, कजरी और मल्हार की गूंज सुनाई देती थी, लेकिन अब यह परंपराएं केवल यादों तक सिमट गई हैं. बदलते समय के साथ इन सांस्कृतिक विरासतों को सहेजने की आवश्यकता है.

औरंगाबाद. अनादि काल से भारत की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा रहे सावन महीने की पारंपरिक रौनक अब धीरे-धीरे कम होती नजर आ रही है. कभी गांवों से लेकर शहरों तक झूले, कजरी और मल्हार की गूंज सुनाई देती थी, लेकिन बदलती जीवनशैली और आधुनिकता के प्रभाव ने इन परंपराओं को काफी हद तक पीछे छोड़ दिया है.

सावन आते ही सजते थे झूले और गूंजते थे कजरी गीत

एक समय था जब सावन लगते ही पेड़ों की डालियों पर झूले पड़ जाते थे. महिलाएं और युवतियां झूला झूलते हुए कजरी और मल्हार गाती थीं. ससुराल में रहने वाली बेटियां भी मायके लौटकर सखियों के साथ सावन का आनंद उठाती थीं. आज न झूले पहले जैसे दिखाई देते हैं और न ही कजरी की मधुर धुन पहले की तरह सुनाई देती है.

आधुनिक जीवनशैली ने बदली सावन की तस्वीर

बदलती जीवनशैली ने इन परंपराओं पर गहरा असर डाला है. बच्चे अब झूले झूलने की बजाय मोबाइल और वीडियो गेम में व्यस्त रहते हैं, जबकि महिलाएं टीवी और सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने लगी हैं. सामाजिक आयोजनों का स्वरूप भी बदल गया है और पारंपरिक कार्यक्रमों की जगह आधुनिक गतिविधियों ने ले ली है.

कजरी और लोक संस्कृति पर मंडरा रहा संकट

शिक्षक एवं लोकगायक सिंधु कुमार पासवान बताते हैं कि कजरी का इतिहास सैकड़ों वर्षों पुराना है और भोजपुरी अंचल में इसे राग मल्हार की रागिनी माना जाता है. कभी राजघरानों से लेकर गांवों के खेतों तक इसकी गूंज सुनाई देती थी. धान की रोपनी के दौरान महिलाएं भी कजरी गाती थीं, लेकिन अब यह परंपरा लगभग समाप्त होती जा रही है.

लोकगीतों में बसती थीं भावनाएं और सामाजिक एकता

कजरी और अन्य लोकगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं थे, बल्कि महिलाओं की भावनाओं, प्रेम, विरह और जीवन के अनुभवों की अभिव्यक्ति भी थे. इन गीतों के माध्यम से समाज में सामूहिकता और सांस्कृतिक जुड़ाव मजबूत होता था, जहां जाति और वर्ग जैसी सीमाएं मायने नहीं रखती थीं.

महिलाओं ने भी जताई परंपराओं के खत्म होने की चिंता

पीएम श्री अनुग्रह उच्च माध्यमिक विद्यालय, मदनपुर की प्रभारी प्राचार्य हेमलता सिंह बताती हैं कि पहले सावन में नवविवाहिताओं के मल्हार और कजरी गीत हर घर में सुनाई देते थे, लेकिन अब यह परंपरा केवल यादों तक सिमटकर रह गई है. वहीं गृहिणी रीना मेहता का कहना है कि जिम्मेदारियों और बदलती जीवनशैली के कारण मायके जाने की परंपरा भी कम हो गई है, जिससे सावन का पारंपरिक उत्साह फीका पड़ गया है.

सांस्कृतिक विरासत को बचाने की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि सावन केवल एक महीना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और लोक परंपराओं का जीवंत प्रतीक है. झूले, मेहंदी, हरी चूड़ियां, कजरी और मल्हार जैसी परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है. यदि समय रहते इन सांस्कृतिक विरासतों को नहीं सहेजा गया, तो आने वाले वर्षों में ये केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित होकर रह जाएंगी.


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By Vinay singh

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