औरंगाबाद : जूट की खेती कर पछता रहे किसान, न प्रोत्साहन राशि मिली, न फसल की कटाई, आंदोलन की चेतावनी

ओबरा में जूट की खेती करने वाले किसान प्रोत्साहन राशि और फसल की खरीद न होने से नाराज हैं। किसानों ने आंदोलन की चेतावनी दी है।

भारत सरकार के कपड़ा मंत्रालय की पहल पर कृषि सेवा स्वावलंबी सहकारी समिति लिमिटेड ने ओबरा और बारुण प्रखंड के किसानों को पहली बार जूट की खेती के लिए प्रेरित किया था. किसानों का आरोप है कि प्रति बीघा 15 हजार रुपये प्रोत्साहन राशि देने का वादा किया गया था, लेकिन फसल तैयार होने के बाद भी अब तक न तो भुगतान किया गया और न ही फसल की कटाई कराई गई. इससे किसानों में भारी नाराजगी है.

प्रोत्साहन राशि और खरीद का किया गया था वादा

ओबरा प्रखंड के किसान अश्विनी कुमार ने बताया कि उन्होंने विभाग और एजेंसी के निर्देश पर अपनी 10 बीघा जमीन में जूट की खेती की थी. उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि प्रति बीघा 15 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि मिलेगी और फसल की कटाई व खरीद की जिम्मेदारी भी एजेंसी की होगी. लेकिन कई महीने बीत जाने के बाद भी कोई वादा पूरा नहीं किया गया.

धान की रोपाई भी हुई प्रभावित

किसानों का कहना है कि खेतों में तैयार खड़ी जूट की फसल की कटाई नहीं होने से धान की रोपाई प्रभावित हो रही है. इससे उन्हें दोहरा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है. किसानों ने आरोप लगाया कि सरकारी योजना पर भरोसा कर उन्होंने खेती की, लेकिन अब वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं.

अन्य किसानों ने भी जताई नाराजगी

ओबरा के किसान महेश पांडेय ने भी कहा कि विभाग के आग्रह पर उन्होंने जूट की खेती की, लेकिन वादा की गई प्रोत्साहन राशि अब तक नहीं मिली. वहीं बारुण प्रखंड के धनगांई पंचायत के परसिया गांव के पूर्व पैक्स अध्यक्ष एवं किसान गोपाल कृष्ण ने कहा कि विभाग और एजेंसी की उदासीनता के कारण किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है.

जिलाधिकारी से हस्तक्षेप की मांग

किसानों ने जिला पदाधिकारी अभिलाषा शर्मा से मामले में हस्तक्षेप कर वादा के अनुरूप प्रोत्साहन राशि दिलाने और जूट फसल की खरीद सुनिश्चित कराने की मांग की है. उनका कहना है कि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य भी मिलना चाहिए.

समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन की चेतावनी

किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही प्रोत्साहन राशि का भुगतान, जूट फसल की कटाई और खरीद की व्यवस्था नहीं की गई तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे. उनका कहना है कि यदि ऐसी स्थिति बनी रही तो भविष्य में किसान सरकारी योजनाओं के तहत जूट जैसी वैकल्पिक फसलों की खेती करने से भी पीछे हट जाएंगे.


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By Brajesh divedi

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