दाउद खां के किले को पर्यटन स्थल का नहीं मिला दर्जा

-अवशेष को बचाने की चल रही कवायद दाउदनगर (अनुमंडल) : दाउदनगर के ऐतिहासिक व गौरवशाली अतीत की याद दिलाने वाली पुराना शहर स्थित दाउद खां के ऐतिहासिक किले के अवशेष को बचाने की कवायद तो सरकार द्वारा की जा रही है. लेकिन चहारदीवारी निर्माण व अतिक्रमणमुक्त नहीं कराया जा रहा है. इस किले को पर्यटन […]

-अवशेष को बचाने की चल रही कवायद
दाउदनगर (अनुमंडल) : दाउदनगर के ऐतिहासिक व गौरवशाली अतीत की याद दिलाने वाली पुराना शहर स्थित दाउद खां के ऐतिहासिक किले के अवशेष को बचाने की कवायद तो सरकार द्वारा की जा रही है. लेकिन चहारदीवारी निर्माण व अतिक्रमणमुक्त नहीं कराया जा रहा है. इस किले को पर्यटन स्थल दर्जा मिलने की उम्मीद लोग संजोय बैठे हैं. यह किला स्थापत्य कला का एक बेहतरीन उदाहरण है.
किले की कलाकृति के अवशेष इसकी विशेषता को दर्शाते हैं. इसके अंदर दक्षिण 20, पश्चिम से 10 व उत्तर में 7 अस्तबल नुमा ध्वस्त होते अवशेष और मसजिद की आकृति के अवशेष आज भी विद्यमान है. औरंगजेब के शासनकाल में बिहार में प्रथम सूबेदार 1659 में दाउद खां कुरैशी बनाये गये. तीन अप्रैल 1660 को दाउद खां पलामू फतह के लिए पटना से रवाना हुए . पलामू फतह के बाद पटना वापसी के क्रम में उन्हें अंछा परगना में ठहरने की नौबत आयी. वे शिकार पर निकले तो उन्हे बताया गया कि यह इलाका खतरनाक है.
बड़े इलाके का राजस्व जब दिल्ली पहुंचाया जाता था तो इस रास्ते में उसे लूट लिया जाता था. इसकी सूचना बादशाह को दी गयी. 1663 (1074 हिजरी) में यहां किला का निर्माण शुरू कराया गया,जो 10 साल बाद 1673 में बन कर तैयार हो गया. ऐतिहासिक तथ्य है कि दाउद खां के आगमन से पूर्व यह बस्ती अंछा परगना का सिलौटा बखौरा था. दाउदनगर का लिखित इतिहास दाउद खां से ही शुरू हुआ और माना जाता है कि उनके नाम पर ही इस शहर का नाम दाउदनगर पड़ा.

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