बिहार सरकार द्वारा प्रस्तावित 'बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-2026' के विरोध में वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय (वीकेएसयू) के शिक्षकों ने कड़ा विरोध जताया है. शिक्षकों ने इसे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और उच्च शिक्षा के भविष्य के लिए गंभीर खतरा बताया है.
शिक्षकों ने सरकार से मांग की है कि इस प्रस्तावित अधिनियम को तुरंत वापस लिया जाए अथवा व्यापक विचार-विमर्श के बाद इस पर पुनर्विचार किया जाए.
'अधिनियम-1976 में संशोधन के बजाय पूरी व्यवस्था बदलने का प्रयास गलत'
शिक्षकों का कहना है कि राज्य के विश्वविद्यालय वर्षों से बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-1976 के तहत सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं और इसी व्यवस्था में पढ़कर हजारों विद्यार्थियों ने देश-विदेश में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है.
उनका तर्क है कि यदि मौजूदा व्यवस्था में कोई कमी थी, तो सरकार को शिक्षकों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों और शिक्षा विशेषज्ञों से संवाद कर आवश्यक संशोधन करने चाहिए थे, न कि पूरी व्यवस्था को ही बदलने का प्रयास करना चाहिए.
नौकरशाही के नियंत्रण में लाने का आरोप, प्रभावित होगा स्वतंत्र चिंतन
शिक्षकों ने आरोप लगाया कि प्रस्तावित अधिनियम का मुख्य उद्देश्य विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक और शैक्षणिक स्वायत्तता को सीमित कर उन्हें पूरी तरह से नौकरशाही के नियंत्रण में लाना है.
शिक्षकों के अनुसार, विश्वविद्यालय केवल डिग्री बांटने वाले संस्थान नहीं हैं, बल्कि ये ज्ञान, शोध, नवाचार और बौद्धिक नेतृत्व के मुख्य केंद्र होते हैं. ऐसे में अत्यधिक प्रशासनिक हस्तक्षेप से स्वतंत्र चिंतन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बुरी तरह प्रभावित होगी.
'नया कानून लाने से बेहतर है रिक्त पदों पर नियुक्ति और संसाधनों का विकास'
शिक्षकों ने कहा कि सरकार को नया कानून थोपने के बजाय विश्वविद्यालयों में रिक्त पड़े शिक्षकों के पदों पर जल्द नियुक्ति करनी चाहिए. साथ ही आधारभूत संरचना के विकास, आधुनिक प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों की स्थापना तथा शोध गतिविधियों को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए.
उनका स्पष्ट कहना है कि संसाधनों की कमी और प्रशासनिक समस्याओं का ठोस समाधान किए बिना केवल नया अधिनियम लागू करने से उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में कोई सुधार संभव नहीं है.
लोकतांत्रिक तरीके से विरोध जारी रखने का संकल्प
शिक्षकों ने सरकार से शिक्षा में सुधार के लिए सभी हितधारकों के साथ व्यापक संवाद स्थापित करने की अपील की है. उन्होंने कहा कि किसी भी नए कानून का निर्माण सर्वसम्मति और शिक्षाविदों की राय के आधार पर ही होना चाहिए. शिक्षकों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी आशंकाओं और सुझावों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो विश्वविद्यालय समुदाय लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखेगा.
इस अवसर पर डॉ. अमित कुमार, डॉ. आमिर महमूद, डॉ. रमेश कुमार, डॉ. रामधनी राम, डॉ. शशि, डॉ. फौजिया रहमान, डॉ. मनीष कुमार, डॉ. ट्विंकल, डॉ. किरण, डॉ. चिंटू, डॉ. प्रियंका, डॉ. प्रितिका, डॉ. अरविंद, डॉ. संजय चौबे, डॉ. मेराज, डॉ. वकारुजमा, डॉ. पूनम, डॉ. शैलजा, डॉ. अरमान, डॉ. लक्ष्मी सहित अनेक शिक्षकों ने प्रस्तावित अधिनियम के प्रति गहरा रोष व्यक्त किया तथा विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और शैक्षणिक गरिमा की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखने का संकल्प दोहराया.
