आरा सदर अस्पताल में 3 दिन अल्ट्रासाउंड, एक घंटे ही नंबर लगाने की सुविधा, बाहर दोगुना खर्च करना मजबूरी

Arrah News : आरा के मॉडल सदर अस्पताल में कुव्यवस्था और स्वास्थ्य कर्मियों की मनमानी के कारण मरीजों को मुफ्त अल्ट्रासाउंड की सुविधा नहीं मिल पा रही है, जिससे उन्हें महंगे दामों पर निजी क्लीनिकों में जाना पड़ रहा है.

आरा (भोजपुर) से नरेन्द्र प्रसाद सिंह की रिपोर्ट
Arrah News : आरा सदर अस्पताल में सरकार द्वारा मरीजों को कई तरह की सुविधाएं देने की घोषणा करने के बावजूद अल्ट्रासाउंड के लिए काफी परेशानी उठानी पड़ रही है. मरीजों को मजबूरी में प्राइवेट क्लीनिकों में पहुंचकर अल्ट्रासाउंड कराना पड़ रहा है. बिहार एवं देश के गिने-चुने सरकारी अस्पतालों में मॉडल सदर अस्पताल का शुमार है. वर्ष 2009 से कई बार करोड़ों की राशि इसकी हालत को सुधारने के लिए सरकार ने लगाई है. इसके बावजूद आज भी यह स्थिति है कि मरीज सुविधाओं से वंचित हो रहे हैं. सरकारी सुविधा की जगह मजबूरी में उन्हें बाहर में जांच आदि का काम करना पड़ रहा है, जिससे उन्हें काफी आर्थिक क्षति हो रही है. ऐसे में मरीज सरकार की घोषणाओं से ठगा सा महसूस कर रहे हैं. अल्ट्रासाउंड ऐसी जगह रखा गया है कि वह मरीजों की मानसिक स्थिति पर बुरा असर करता है.

सप्ताह में मात्र 3 दिन ही सुविधा

सदर अस्पताल में सप्ताह में मात्र तीन दिन ही अल्ट्रासाउंड की सुविधा दी जाती है, जिसमें मंगलवार, गुरुवार एवं शनिवार शामिल हैं. शेष चार दिन अल्ट्रासाउंड के लिए अस्पताल प्रबंधन मरीजों को उनकी मजबूरी पर छोड़ देता है. निजी क्लीनिकों में पहुंचने पर उन्हें डेढ़ से दो गुना अधिक राशि इस कार्य के लिए देनी पड़ती है, जिससे मरीजों को काफी परेशानी हो रही है.

महज 1 घंटे के लिए नंबर लगाने की व्यवस्था

सदर अस्पताल में अल्ट्रासाउंड कराने को लेकर नंबर लगाने के लिए महज 1 घंटे की सुविधा दी जाती है. वह भी सुबह 7:00 बजे से सुबह 8:00 बजे तक ही उपलब्ध रहती है. ऐसे में यदि सदर अस्पताल में ही कोई डॉक्टर सुबह 8:00 बजे के बाद किसी मरीज को अल्ट्रासाउंड के लिए लिखता है, तो मरीज के सामने बस एक ही विकल्प रहता है कि उसे किसी भी सूरत में बाहर से ही अल्ट्रासाउंड कराना पड़ता है. आखिर अस्पताल प्रबंधन इस तरह से मरीजों को क्यों परेशान कर रहा है, यह मरीजों को समझ में नहीं आ रहा है. सदर अस्पताल में इलाज कराने आई मरीज पार्वती ने बताया कि मुझे अल्ट्रासाउंड के लिए लाइन नहीं लगाने दिया गया, जिसके कारण मजबूरी में बाहर जाकर अल्ट्रासाउंड कराना पड़ा, यह सही नहीं है.

कर्मियों की मनमर्जी और दुर्व्यवहार

आलम यह है कि अल्ट्रासाउंड करने वाले तकनीशियन एवं कर्मी मरीजों के साथ मनमर्जी करते हैं. उनका व्यवहार मरीजों के साथ अच्छा नहीं रहता है. कई मरीजों ने यह भी आरोप लगाया कि उनसे पैसे की भी मांग की जाती है.

क्या कहते हैं सिविल सर्जन

सिविल सर्जन डॉ. शिवेंद्र कुमार सिन्हा ने कहा कि मामला संज्ञान में नहीं था. इसकी जांच कराई जाएगी तथा मरीजों को अधिक से अधिक सुविधा देने का प्रयास किया जाएगा.

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लेखक के बारे में

Published by: Nikhil Anurag

मूलतः निखिल अनुराग. पेशे से पत्रकार. बुद्ध की धरती पर जन्म. बिहार का सबसे नवीनतम जिला (अरवल) से ताल्लुक. पढ़ाई की शुरूआत गांव से ही. फिर पलायन कर गंगा के तट पटना पहुंचा. ज्ञान की धरती से कुछ तालीम हासिल कर राष्ट्रीय राजधानी की ओर कूच. पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट ( माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय). नोएडा की धरती पर विद्वतजन से कुछ न कुछ सीखा. करंट अफ़ेयर्स, राजनीति, खेल, अंतरराष्ट्रीय संबंध, गाँव, खेत-किसान पसंदीदा टॉपिक. स्कूल, कॉलेज युनिवर्सिटी में यूथ से गपशप करना एनर्जी का अतिरिक्त स्रोत. साल 2020 में नोएडा से शुरू हुई इस लेखन यात्रा कलम, डेस्कटॉप, लैपटॉप के की-बोर्ड से होते हुए स्मार्ट फोन तक पहुंच गयी. ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ रही है, सीखने, पढ़ने, लिखने की भूख भी बढ़ रही है. नोएडा में टीवी न्यूज में काम करने के बाद हिंदुस्तान ग्रूप होते हुए बिहार, झारखंड की सबसे पसंदीदा अखबार प्रभात खबर में कार्यरत. हां एक बात और... पढ़ने-लिखने की जिज्ञासा कभी खत्म नहीं होगी. साहित्य में बेहद दिलचस्पी.

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