Arrah News: (नरेन्द्र प्रसाद सिंह की रिपोर्ट) भोजपुर जिले में स्वास्थ्य विभाग के सख्त नियमों को ताक पर रखकर निजी जांच घरों (पैथोलॉजी लैब्स) और निजी अस्पतालों का अवैध संचालन धड़ल्ले से किया जा रहा है. ये संचालक न सिर्फ मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं, बल्कि जिला प्रशासन और सरकार को भी खुली चुनौती दे रहे हैं. कार्रवाई नहीं होने के कारण इन धंधेबाजों का मनोबल इस कदर ऊंचा है कि वे सीधे-साधे और गरीब मजदूरों को ठगने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं. स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन और अस्पताल प्रबंधन की शिथिलता के कारण इन फर्जी सेंटरों को मरीजों को लूटने की एक तरह से खुली छूट मिली हुई है.
आंकड़ों का खेल: जिले में 2000 से ज्यादा सेंटर, मगर निबंधित सिर्फ 150
भोजपुर जिले में अवैध स्वास्थ्य केंद्रों का जाल इस कदर फैल चुका है कि इसकी संख्या अब हजारों में है:
- कुल अवैध संस्थान: पूरे जिले में 2000 से भी अधिक अवैध जांच केंद्र, निजी अस्पताल, अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन, एक्स-रे, आयुर्वेद और होम्योपैथिक क्लीनिक बेरोक-टोक चलाए जा रहे हैं.
- आरा शहर का हाल: अकेले आरा नगर निगम क्षेत्र की हर गली-मोहल्ले में 300 से अधिक ऐसे सेंटर सक्रिय हैं. अनुमंडल, प्रखंड मुख्यालय तो दूर, अब ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे-मोटे बाजारों में भी इनका धंधा पैर पसार चुका है.
- कागजों पर सच: जिले में केवल 150 जांच घर और निजी क्लीनिक ही सदर अस्पताल (सिविल सर्जन कार्यालय) में निबंधित हैं. चौंकाने वाली बात यह है कि इन निबंधित संस्थानों में से भी 9 का नवीकरण अभी तक लंबित है.
महज 200 रुपये का शुल्क बचाने के लिए सरकार को लाखों का चूना
‘क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट’ के तहत ऐसे निजी संस्थानों को मानक पूरे करने पर 1 वर्ष से लेकर 5 वर्ष तक के लिए निबंधन का प्रावधान है. अमूमन सदर अस्पताल द्वारा शुरू में 1 वर्ष के लिए ही ‘प्रोविजनल निबंधन’ दिया जाता है. इसके लिए सरकार ने बेहद मामूली शुल्क निर्धारित किया है:
- जांच केंद्र (पैथोलॉजी): मात्र 200 रुपये प्रति वर्ष.
- निजी अस्पताल: बेड की उपलब्धता के आधार पर 100 रुपये से लेकर 1200 रुपये प्रति वर्ष.
इतनी कम फीस होने के बावजूद संचालक निबंधन कराने से भागते हैं ताकि वे सरकारी नियमों और टैक्स से बच सकें. इसके कारण सरकार को प्रतिवर्ष लाखों रुपये के राजस्व की भारी क्षति हो रही है और यह खेल जिला प्रशासन की नाक के नीचे चल रहा है.
न डॉक्टर, न ट्रेंड स्टाफ; गांव-गांव में फैला है दलालों का सिंडिकेट
सरकार के मानदंडों के अनुसार किसी भी निजी अस्पताल के निबंधन के लिए कम से कम एक योग्य डॉक्टर, प्रशिक्षित नर्स, कंपाउंडर, बेड और साफ-सफाई की मुकम्मल व्यवस्था अनिवार्य है. इसके विपरीत, जिले के अधिकांश अस्पतालों में कोई डॉक्टर ही नहीं होता. यहाँ केवल अप्रशिक्षित नर्स और कंपाउंडर के भरोसे मरीजों को भर्ती कर उनका दोहन किया जाता है.
इन अवैध सेंटरों के संचालकों ने सुदूर ग्रामीण इलाकों में दलालों का नेटवर्क फैला रखा है. ये दलाल गरीब और कम पढ़े-लिखे मरीजों को बहला-फुसलाकर इन अस्पतालों में लाते हैं, जहाँ उनसे मोटी रकम ऐंठी जाती है. हद तो तब हो जाती है जब गलत इलाज से मरीज की स्थिति अत्यंत दयनीय और चिंताजनक हो जाती है; ऐसी हालत में संचालक अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए परिजनों को तुरंत सरकारी अस्पताल ले जाने को कह देते हैं, जिससे कई बार रास्ते में ही मरीज दम तोड़ देते हैं.
अधिकारियों का पक्ष
‘इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच कराई जाएगी. जिले में बिना वैध निबंधन के स्वास्थ्य सेवाओं का संचालन करने वाले किसी भी संस्थान को बख्शा नहीं जाएगा और उन पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी. हालांकि, कई बार जांच के दौरान इन अवैध संस्थानों के संचालकों द्वारा टीम के सामने काफी विकट स्थिति पैदा कर दी जाती है, जिससे टीम के लिए खतरा भी उत्पन्न हो जाता है, लेकिन इसके बावजूद अभियान चलाकर इन्हें बंद किया जाएगा.’ — डॉ. शिवेंद्र कुमार सिंहा, सिविल सर्जन, भोजपुर (आरा)
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