बिहार के सीमावर्ती जिले अररिया में पिछले कुछ वर्षों के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे और पहुंच में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है. गर्भवती महिलाओं की प्रसव पूर्व जांच (ANC), संस्थागत प्रसव, बच्चों के टीकाकरण और बीमार बच्चों को त्वरित इलाज दिलाने के मामले में जिले ने राज्य के औसत से भी बेहतर प्रदर्शन किया है. हालांकि, हालिया राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) के आंकड़े जिले की स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवस्था की एक गंभीर व चिंताजनक तस्वीर भी उजागर करते हैं. जिले में बाल विवाह की ऊंची दर, किशोरियों में गर्भधारण, पोषण की कमी और निजी अस्पतालों में अत्यधिक सिजेरियन (C-Section) प्रसव आज भी प्रशासन व समाज के सामने बड़ी चुनौती बने हुए हैं.
1. मातृत्व स्वास्थ्य: ANC में 96.4% की छलांग, लेकिन पहली तिमाही व आयरन की खुराक में सुस्ती
जिले में गर्भवती महिलाओं तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच का दायरा काफी विस्तृत हुआ है:
- ANC जांच में बड़ी उपलब्धि: NFHS-5 में जहां केवल 69.9% महिलाओं को कम से कम एक बार प्रसव पूर्व जांच मिली थी, वहीं NFHS-6 में यह आंकड़ा बढ़कर 96.4% हो गया है, जो बिहार के राज्य औसत (94%) से भी आगे है.
- 4 या अधिक ANC: चार या उससे अधिक बार जांच कराने वाली महिलाओं का अनुपात 25.8% से सुधरकर 32.7% पहुंचा है.
- चिंता का पहलू: पहली तिमाही में ही जांच कराने वाली महिलाओं का अनुपात मात्र 46.5% है (बिहार औसत 63.9%). इसके अलावा, 100 दिन या उससे अधिक आयरन-फोलिक एसिड की खुराक लेने वाली महिलाएं 17.6% से घटकर 12.6% रह गई हैं, जो स्वास्थ्य सेवा की निरंतरता और गुणवत्ता पर सवाल खड़े करता है.
2. बाल विवाह और किशोर गर्भधारण: सामाजिक कुरीति से सेहत पर संकट
जिले के स्वास्थ्य सूचकांकों में सबसे कमजोर कड़ी बाल विवाह और कम उम्र में मातृत्व है:
- 50.3% लड़कियों का बाल विवाह: अररिया में 20 से 24 वर्ष आयु वर्ग की 50.3% युवतियों का विवाह 18 वर्ष से कम उम्र में ही हो गया. NFHS-5 (52%) की तुलना में इसमें बेहद मामूली सुधार हुआ है, जबकि पूरे बिहार में यह औसत घटकर 34.6% पर आ गया है.
- 17.4% किशोरियां मां बनीं: जिले में 15 से 19 वर्ष की 17.4% लड़कियां मां बन चुकी हैं या गर्भवती हैं (बिहार औसत 11.4%). यह आंकड़ा NFHS-5 के 13.3% से और बढ़ गया है, जो स्वास्थ्य के साथ-साथ शिक्षा और महिला-बाल विकास विभागों के संयुक्त हस्तक्षेप की मांग करता है.
3. संस्थागत प्रसव में सुधार, पर निजी क्षेत्र में 68.1% सिजेरियन डिलीवरी
प्रसव के मामले में सरकारी व्यवस्था पर भरोसा बढ़ा है, लेकिन प्राइवेट अस्पतालों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं:
- 77.9% संस्थागत प्रसव: कुल संस्थागत प्रसव 66.2% से बढ़कर 77.9% हुआ, जिसमें अकेले सरकारी अस्पतालों की हिस्सेदारी 61.3% है.
- सिजेरियन डिलीवरी का बड़ा अंतर: सरकारी संस्थानों में सी-सेक्शन प्रसव की दर मात्र 1.2% है, जबकि निजी नर्सिंग होम व अस्पतालों में यह दर उछलकर 68.1% पर पहुंच गई है (NFHS-5 में 45.2%). यह भारी अंतर निजी क्षेत्र के चिकित्सीय निर्णयों की उच्चस्तरीय समीक्षा की आवश्यकता दर्शाता है.
4. NFHS-5 बनाम NFHS-6: अररिया के प्रमुख स्वास्थ्य व पोषण आंकड़े
जिले के स्वास्थ्य, टीकाकरण और कुपोषण की तुलनात्मक स्थिति:
| प्रमुख स्वास्थ्य मानक (Health Indicators) | NFHS-5 स्थिति | NFHS-6 स्थिति | बिहार राज्य औसत (NFHS-6) |
| कम से कम 1 बार ANC जांच | 69.9% | 96.4% | 94.0% |
| पहली तिमाही में ANC जांच | — | 46.5% | 63.9% |
| संस्थागत प्रसव (Institutional Delivery) | 66.2% | 77.9% | — |
| निजी अस्पतालों में C-Section डिलीवरी | 45.2% | 68.1% | — |
| सरकारी अस्पतालों में C-Section डिलीवरी | — | 1.2% | — |
| पूर्ण टीकाकरण (Full Immunization) | 61.6% | 75.7% | 77.3% |
| बाल विवाह (18 वर्ष से कम में शादी) | 52.0% | 50.3% | 34.6% |
| किशोर गर्भधारण (15-19 वर्ष) | 13.3% | 17.4% | 11.4% |
| परिवार नियोजन साधनों का उपयोग | 46.0% | 57.7% | — |
| बच्चों में स्टंटिंग (नाटापन) | 49.9% | 37.7% | 35.6% |
| गंभीर कम वजन वाले बच्चे (Severe Wasting) | 5.2% | 6.7% | — |
5. टीकाकरण व बाल स्वास्थ्य में बढ़त, पर कुपोषण का दंश बरकरार
बच्चों के स्वास्थ्य के मोर्चे पर मिश्रित परिणाम देखने को मिले हैं:
- टीकाकरण में सुधार: पूर्ण प्रतिरक्षित बच्चों का प्रतिशत 61.6% से बढ़कर 75.7% हो गया है. जन्म के समय हेपेटाइटिस-बी का टीका 78% बच्चों को मिला. बीमार बच्चों को समय पर डॉक्टर तक ले जाने का दर 81.3% (बिहार 65.7%) रहा.
- कुपोषण की गंभीर स्थिति: स्टंटिंग 49.9% से घटकर 37.7% हुई है, लेकिन अब भी 41.5% बच्चे कम वजन के हैं. गंभीर रूप से कम वजन (Severely Underweight) वाले बच्चों की तादाद 5.2% से बढ़कर 6.7% हो गई है. 6 से 23 महीने के महज 13.6% बच्चों को ही पर्याप्त पौष्टिक आहार मिल पा रहा है.
निष्कर्ष: अस्पतालों तक पहुंच बनी, अब पोषण और सामाजिक सोच बदलने की बारी
NFHS-6 के निष्कर्ष साफ करते हैं कि अररिया में बुनियादी मेडिकल सुविधाओं की पहुंच का विस्तार हुआ है, लेकिन इसे स्थायी रूप देने के लिए बाल विवाह की रोकथाम, किशोरियों की स्कूली शिक्षा और बाल पोषण पर जमीनी स्तर पर सख्त सामाजिक व प्रशासनिक पहलों की दरकार है.
