दुनिया महेंद्र सिंह धोनी को कैप्टन कूल, वर्ल्ड चैंपियन कप्तान और भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े नामों में से एक मानती है. लेकिन रांची में उनके बचपन के दोस्त और साथी खिलाड़ी रहे शब्बीर हुसैन के लिए वह आज भी वही ‘माही’ हैं, जो मैदान पर सबसे ज्यादा मेहनत करता था, दोस्तों के साथ हंसी-मजाक करता था और बड़े सपने देखने से कभी नहीं डरता था.
धोनी के 45वें जन्मदिन पर शब्बीर ने प्रभात खबर से खास बातचीत में माही के संघर्ष, सादगी और रांची से उनके गहरे रिश्ते से जुड़े कई दिलचस्प किस्से साझा किए. शब्बीर कहते हैं, “दुनिया उन्हें महेंद्र सिंह धोनी या लीजेंड कहती है, लेकिन हमारे लिए वह आज भी वही माही हैं. शोहरत और सफलता ने उन्हें कभी नहीं बदला.”
जब बाकी खिलाड़ी थक जाते थे, तब शुरू होता था माही का असली अभ्यास
शब्बीर बताते हैं कि क्रिकेट के प्रति धोनी का समर्पण बचपन से ही अलग था. सुबह-सुबह किट बैग लेकर मैदान पहुंचना और घंटों अभ्यास करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था. नेट्स में विकेटकीपिंग और बल्लेबाजी के बाद भी अगर बाकी खिलाड़ी मैदान छोड़ देते थे, तो माही अतिरिक्त अभ्यास करते रहते थे. उनके मुताबिक, धोनी हमेशा खुद को दूसरों से बेहतर बनाने की कोशिश करते थे. यही आदत आगे चलकर उन्हें भारतीय क्रिकेट की सबसे ऊंची जगह तक ले गई.
स्कूटर से आते थे मैदान, छक्कों से बनती थी पहचान
आज भले ही धोनी के पास शानदार गाड़ियों और बाइक्स का कलेक्शन हो, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब वह स्कूटर या मोटरसाइकिल से अभ्यास के लिए मैदान पहुंचते थे. रांची के मेकन स्टेडियम, हरमू मैदान और अन्य स्थानीय मैदानों में उनके लंबे-लंबे छक्के चर्चा का विषय हुआ करते थे. शब्बीर हंसते हुए याद करते हैं कि कई बार धोनी का शॉट मैदान के बाहर चला जाता था और गेंद ढूंढ़ने में काफी समय लग जाता था. तभी लोगों को लगने लगा था कि यह खिलाड़ी एक दिन बहुत आगे जाएगा.
रेलवे की नौकरी थी, लेकिन सपना सिर्फ क्रिकेट था
धोनी को दक्षिण-पूर्व रेलवे में टिकट कलेक्टर की नौकरी मिली थी. आमतौर पर नौकरी मिलने के बाद खिलाड़ी अपने सपनों से समझौता कर लेते हैं, लेकिन माही ने ऐसा नहीं किया. शब्बीर बताते हैं कि ड्यूटी खत्म होते ही वह सीधे मैदान पहुंच जाते थे. उन्होंने नौकरी को जिम्मेदारी की तरह निभाया, लेकिन क्रिकेट को कभी पीछे नहीं छोड़ा. यही जुनून उन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग बनाता था.
स्टार बनने के बाद भी दोस्ती नहीं भूले
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सफलता मिलने के बाद भी धोनी का व्यवहार नहीं बदला. शब्बीर कहते हैं कि माही आज भी पुराने दोस्तों से उसी आत्मीयता से मिलते हैं जैसे पहले मिलते थे. न कोई दिखावा, न कोई दूरी. यही उनकी सबसे बड़ी खूबी है. उन्होंने कभी अपने नाम और शोहरत को अपने व्यवहार पर हावी नहीं होने दिया.
रांची सिर्फ शहर नहीं, धोनी की पहचान है
विश्व क्रिकेट में इतनी सफलता हासिल करने के बावजूद धोनी ने कभी रांची को नहीं छोड़ा. आज भी जब समय मिलता है तो वह अपने फार्महाउस में समय बिताते हैं, बाइक चलाते हैं, खेती करते हैं और प्रकृति के बीच रहना पसंद करते हैं. शब्बीर मानते हैं कि धोनी का रांची से रिश्ता सिर्फ जन्मस्थान का नहीं, बल्कि भावनाओं का रिश्ता है. यही वजह है कि दुनिया घूमने के बाद भी उनका मन अपने शहर में ही बसता है.
एक खिलाड़ी नहीं, एक पीढ़ी की प्रेरणा
धोनी की सबसे बड़ी उपलब्धि सिर्फ विश्व कप जीतना नहीं है. उन्होंने झारखंड और छोटे शहरों के लाखों युवाओं को यह भरोसा दिया कि बड़े सपने देखने के लिए बड़े शहर में पैदा होना जरूरी नहीं है.आज रांची का हर युवा क्रिकेटर खुद को धोनी की कहानी में देखता है. विकेटकीपर बनने का सपना हो या भारत के लिए खेलने का, माही की यात्रा हर कदम पर प्रेरणा देती है.
रांची की हर गली में बसता है ‘माही’
शब्बीर की नजर में धोनी सिर्फ एक क्रिकेटर नहीं, बल्कि रांची की पहचान हैं. एक दौर था जब लोग रांची को सिर्फ झारखंड की राजधानी के रूप में जानते थे. आज दुनिया के क्रिकेट प्रेमियों के लिए यह ‘धोनी का शहर’ है. शायद यही किसी खिलाड़ी की सबसे बड़ी सफलता होती है. जब उसका नाम सिर्फ रिकॉर्ड बुक में नहीं, बल्कि अपने शहर के लोगों के दिलों में दर्ज हो जाए और रांची के लिए महेंद्र सिंह धोनी ठीक ऐसे ही हैं. दुनिया के लिए लीजेंड, लेकिन अपने शहर के लिए हमेशा वाले ‘माही’.
