Kalakoot Vish: सनातन धर्म के अनुसार देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीरसागर का मंथन किया था. इस महान कार्य में मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया. समुद्र मंथन से कुल 14 दिव्य रत्न निकले, लेकिन सबसे पहले जो वस्तु प्रकट हुई, वह थी अत्यंत भयावह कालकूट विष.
क्या था कालकूट या हलाहल विष?
कालकूट विष को हलाहल विष के नाम से भी जाना जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार यह विष इतना प्रचंड और विनाशकारी था कि उसकी ज्वाला और प्रभाव से संपूर्ण सृष्टि संकट में पड़ गई थी. देवता और असुर दोनों ही इस विष को स्वीकार करने से डर गए, क्योंकि यह पूरे ब्रह्मांड का विनाश करने में सक्षम माना जाता था.
भगवान शिव ने बचाई सृष्टि
जब कोई भी इस विष को ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं हुआ, तब भगवान शिव ने समस्त प्राणियों की रक्षा के लिए स्वयं आगे आने का निर्णय लिया. उन्होंने कालकूट विष को अपने हाथों से ग्रहण कर लिया और उसे पी गए. यह त्याग और करुणा का अनुपम उदाहरण माना जाता है.
माता पार्वती ने रोका विष का प्रभाव
कथा के अनुसार जब भगवान शिव ने विष पिया, तब माता पार्वती ने तुरंत उनके कंठ को पकड़ लिया ताकि विष उनके शरीर में न फैल सके. परिणामस्वरूप विष न तो बाहर निकला और न ही शरीर के भीतर पहुंचा. वह शिव के कंठ में ही रुक गया.
क्यों कहलाए नीलकंठ?
कालकूट विष के प्रभाव से भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया. तभी से उन्हें नीलकंठ महादेव के नाम से जाना जाने लगा. यह घटना त्याग, संरक्षण और लोककल्याण की सर्वोच्च मिसाल मानी जाती है.
