प्रो मुश्ताक अहमद प्रधानाचार्य
Ramzan 2026: इस्लामी कैलेंडर जो चांद के अनुसार चलते हैं और उन्हें कमरी यानी चांद का महीना कहा जाता है, उसका नौवां महीना रमजान रहमत, बरकत और मगफेरत, अर्थात माफी का महीना माना जाता है. उसका कारण यह है कि इसी पाक महीने में इस्लाम धर्म की धार्मिक किताब कुरान शरीिफ नाजिल हुई, सीएम कॉलेज, दरभंगा अर्थात पूर्ण हुई. साथ ही साथ इस्लाम धर्म के जो पांच बुनियादी सतून (स्तंभ) अर्थात तौहीद, नमाज, रोजा, हज और जकात हैं, उनमें रोजा इसी पाक रमजान महीने में रखे जाते हैं. आम दिनों में मुसलमानों पर पांच समय की नमाज फर्ज (अनिवार्य) है, जबकि रमजान के महीने में तरावीह का पढ़ना भी सुन्नत है. रमजान में रोजा रखना हर एक बालिग (वयस्क) और स्वस्थ व्यक्तियों पर फर्ज (अनिवार्य) है. रोजा इफ्तार सामूहिक तौर पर करने की परंपरा है और तरावीह (विशेष नमाज जिसमें कुरआन सुना जाता है) भी मस्जिदों में सामूहिक पढ़ने की रिवायत है. लेकिन प्राकृतिक आपदा और महामारी के समय सामूहिक नमाज को छोड़कर अपने-अपने घरों के अंदर ही नमाज पढ़ने की हिदायत दी गई है.
पैगंबर की हदीस और सामाजिक संदेश
इस्लाम धर्म के प्रवर्तक पैगंबर हजरत मोहम्मद स०अ०व० की कई हदीस (वक्तव्य) मौजूद हैं, जिनमें पैगंबर स०अ०व० ने रमजान की फजीलत बयान की है. इस्लाम धर्म सामाजिक सरोकार और समता का संदेश देता है. समाज के निर्धन, असहाय, गरीब और मजबूर लोगों को मदद करने का उपदेश दिया गया है और इसके लिए धनवान लोगों पर जकात अनिवार्य और सदका वाजिब किया गया है.
जकात, फितरा और इंसानियत का पैगाम
ज्ञातव्य हो कि रमजान के महीने में जकात और फितरा इसलिए गरीबों में बांटा जाता है, ताकि निर्धन लोग भी अपनी ईद अच्छी तरह से खुशी के साथ मना सकें. हजरत मोहम्मद स०अ०व० की हदीस है कि “तुम जमीन वालों पर रहम करो, आसमान वाला तुम पर रहम फरमाएगा. ” (हदीस सुनन अबी दाऊद नं. 4941). इसी प्रकार पैगंबर साहब ने फरमाया कि जो व्यक्ति दूसरों पर रहम नहीं करता, उस पर अल्लाह भी रहम नहीं करता. उन्होंने फरमाया, “जो शख्स हमारे छोटों पर रहम नहीं करता और बड़ों का अदब नहीं करता, वह हम में से नहीं है. ” (हदीस सुनन अबी दाऊद नं. 4943).
मानव कल्याण और इस्लाम का असली संदेश
उपरोक्त हदीस से यह साबित होता है कि समाज में जो निर्धन हैं, उनकी सहायता करना आवश्यक है, अर्थात यह धार्मिक उपदेश मानव कल्याण के लिए दिया गया है. इस्लाम धर्म में दान देते समय या किसी की मदद करते समय किसी खास धर्म की अनिवार्यता नहीं है. इसलिए कुरआन में अल्लाह को “अल्हम्दोलिल्लाहे रब्बिल आलमीन” अर्थात ईश्वर पूरी दुनिया का रब है और पैगंबर साहब को “रहमतुल लिल आलमीन” अर्थात पूरे विश्व के लिए रहमत (कल्याणकारी) कहा गया है.
वर्तमान समय में इस्लाम का प्रासंगिक संदेश
आज जब विश्व का मानव समाज तरह-तरह की कुंठा, धार्मिक उन्माद और वर्ग संघर्ष से त्रस्त है, तो ऐसे कठिन समय में इस्लाम धर्म के मानने वालों के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वे इस्लाम के असल संदेश और उपदेश की रोशनी में अपना आचरण प्रस्तुत करें, ताकि अन्य धर्मावलंबी इस्लाम की मजहबी एवं अखलाकी (नैतिक) विशेषताओं से अवगत हो सकें.
