Ganesh Chaturthi Special: प्रभात खबर के गणेश गणेश चतुर्थी सीरिज में आज हम आपके लिए लेकर आए हैं वो पौराणिक कहानी, जिसमें ये वर्णन हा कि गणेश जी की पूजा में तुलसी क्यों नहीं चढ़ाई जाती? इसके पीछे क्या है पौराणिक कथा? जानें तुलसी और भगवान गणेश के बीच हुए संवाद, श्राप और वरदान की पूरी कहानी. एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवी तुलसी तीर्थ यात्रा कर रही थीं, इसी दौरान उन्होंने गंगा तट पर गणेश जी को ध्यान में लीन देखा. गणेश जी को पीले वस्त्र, चंदन का लेप और शांत स्वरूप देखकर उनसे प्रभावित हुईं. उन्होंने गणेश जी से विवाह करने की इच्छा जताई. इस प्रसंग का वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण के गणपति खंड के 46वें अध्याय में मिलता है.
गणेश जी ने विवाह का प्रस्ताव ठुकरा दिया
कथा के अनुसार गणेश जी तप में लीन थे, इसलिए उन्होंने तुलसी के विवाह प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया. उन्होंने कहा कि वे सांसारिक बंधनों से दूर रहकर भगवान की भक्ति और तपस्या में लगे हैं. गणेश जी के इनकार से तुलसी नाराज हो गईं और उन्हें यह अपना अपमान लगा.
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क्रोध में तुलसी ने गणेश जी को दिया श्राप
गणेश जी ने जैसे ही विवाह के लिए इंकार किया, तुलसी नाराज हो गईं. उन्होंने गणेश जी को श्राप दिया कि उनके एक नहीं बल्कि दो-दो विवाह होंगे. इसके बाद गणेश जी ने भी तुलसी को श्राप दिया कि उनका विवाह एक असुर से होगा और बाद में वे एक पौधे के रूप में परिवर्तित हो जाएंगी. ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, यही श्राप आगे चलकर तुलसी के शंखचूड़ से विवाह और फिर तुलसी के पौधे के रूप में प्रतिष्ठित होने से जुड़ता है.
पश्चाताप के बाद गणेश जी ने दिया वरदान
श्राप मिलने के बाद तुलसी को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने गणेश जी से क्षमा मांगी. गणेश जी प्रसन्न हुए और उन्होंने तुलसी को वरदान दिया कि वे भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय होंगी. वे शुभ और पवित्र मानी जाएंगी तथा लोगों के लिए मोक्ष और पुण्य से जुड़ी होंगी. हालांकि, गणेश जी ने यह भी कहा कि वे तुलसी के पत्ते स्वीकार नहीं करेंगे. इस तरह कथा में श्राप के साथ तुलसी को भगवान विष्णु की प्रिय बनने का वरदान भी मिलता है.
