Dwijapriya Sankashti Chaturthi Vrat Katha: पंचांग के अनुसार आज फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि है, जिसे द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है. इस वर्ष 5 फरवरी 2026, गुरुवार के दिन द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जा रहा है. यह चतुर्थी तिथि 5 फरवरी की रात 12 बजकर 9 मिनट से प्रारंभ हो चुकी है.
संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है. इस दिन व्रत रखने से जीवन के कष्ट, बाधाएं और परेशानियां दूर होती हैं. मान्यता है कि इस व्रत में कथा का पाठ करना अनिवार्य होता है, क्योंकि बिना कथा पढ़े व्रत पूर्ण नहीं माना जाता. कथा का श्रवण या पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक शांति और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है.
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन इनमें से एक कथा सबसे अधिक प्रसिद्ध है. यह कथा भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी हुई है.
कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती चौपड़ का खेल खेल रहे थे. उस समय वहां कोई ऐसा नहीं था, जो खेल का निर्णय कर सके. तब दोनों ने मिट्टी से एक बालक की मूर्ति बनाई और उसमें प्राण डाल दिए. उस बालक को आदेश दिया गया कि वह खेल में हार-जीत का फैसला करेगा.
खेल शुरू हुआ और हर बार माता पार्वती भगवान शिव को हरा रही थीं. लेकिन एक बार बालक ने गलती से भगवान शिव को विजेता घोषित कर दिया. यह देखकर माता पार्वती क्रोधित हो गईं और गुस्से में बालक को लंगड़ा होने का श्राप दे दिया.
बालक ने अपनी गलती मानते हुए क्षमा मांगी, लेकिन माता पार्वती ने कहा कि वह श्राप वापस नहीं ले सकतीं. तब बालक ने श्राप से मुक्ति का उपाय पूछा. देवी पार्वती ने बताया कि फाल्गुन मास की संकष्टी चतुर्थी के दिन सच्चे मन से भगवान गणेश की पूजा और व्रत करने से वह श्राप से मुक्त हो सकता है. बालक ने विधि-विधान से संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा और गणेश जी की पूजा की. भगवान गणेश की कृपा से वह श्राप से मुक्त हो गया और स्वस्थ हो गया.
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इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि संकष्टी चतुर्थी का व्रत सच्चे मन से करने पर भगवान गणेश सभी संकटों को दूर करते हैं
