Jaya Ekadashi 2026: जया एकादशी भारत का एक विशेष पर्व है. यह पर्व भगवान विष्णु को समर्पित है. धार्मिक मान्यता है कि जो भी भक्त जया एकादशी के दिन भगवान नारायण की विधि-पूर्वक पूजा करता है, व्रत रखता है और चालीसा का पाठ करता है, उसके जीवन से दुख-दर्द और कष्ट दूर हो जाते हैं. साथ ही जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है.
भगवान विष्णु चालीसा
॥ दोहा ॥
विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय।
कीरत कुछ वर्णन करूं, दीजै ज्ञान बताय॥
नमो विष्णु भगवान खरारी, कष्ट नशावन अखिल बिहारी।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी, त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥
सुंदर रूप मनोहर सूरत, सरल स्वभाव मोहनी मूरत।
तन पर पीतांबर अति सोहत, बैजयंती माला मन मोहत॥
शंख चक्र कर गदा विराजे, देखत दैत्य असुर दल भाजे।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे, काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥
संतभक्त सज्जन मनरंजन, दनुज असुर दुष्टन दल गंजन।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन, दोष मिटाय करत जन सज्जन॥
पाप काट भव सिंधु उतारण, कष्ट नाशकर भक्त उबारण।
करत अनेक रूप प्रभु धारण, केवल आप भक्ति के कारण॥
धरणि धेनु बन तुम्हें पुकारा, तब तुम रूप राम का धारा।
भार उतार असुर दल मारा, रावण आदि को संहारा॥
आप वराह रूप बनाया, हिरण्याक्ष को मार गिराया।
धर मत्स्य तन सिंधु बनाया, चौदह रत्नों को निकलाया॥
अमिलख असुरन द्वंद मचाया, रूप मोहिनी आप दिखाया।
देवन को अमृत पान कराया, असुरन को छवि से बहलाया॥
कूर्म रूप धर सिंधु मझाया, मंदराचल गिरि तुरत उठाया।
शंकर का तुम फंद छुड़ाया, भस्मासुर को रूप दिखाया॥
वेदों को जब असुर डुबाया, कर प्रबंध उन्हें ढूंढवाया।
मोहित बनकर खलहि नचाया, उसी कर से भस्म कराया॥
असुर जलंधर अति बलदाई, शंकर से उसकी कीन्ह लड़ाई।
हार पार शिव सकल बनाई, कीन सती से छल खल जाई॥
सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी, बतलाई सब विपत कहानी।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी, वृंदा की सब सुरति भुलानी॥
देखत तीन दनुज शैतानी, वृंदा आय तुम्हें लपटानी।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी, हना असुर उर शिव शैतानी॥
तुमने ध्रुव प्रह्लाद उबारे, हिरण्यकशिपु आदि खल मारे।
गणिका और अजामिल तारे, बहुत भक्त भव सिंधु उतारे॥
हरहु सकल संताप हमारे, कृपा करहु हरि सृजन हारे।
देखूं मैं निज दर्शन तुम्हारे, दीनबंधु भक्तन हितकारे॥
चाहता आपका सेवक दर्शन, करहु दया अपनी मधुसूदन।
जानूं नहीं योग्य जब पूजन, होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥
शील दया संतोष सुलक्षण, विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण।
करहुं आपका किस विधि पूजन, कुमति विलोक होत दुख भीषण॥
करहुं प्रणाम कौन विधि सुमिरण, कौन भांति मैं करहु समर्पण।
सुर मुनि करत सदा सेवकाई, हर्षित रहत परम गति पाई॥
दीन दुखिन पर सदा सहाई, निज जन जान लेव अपनाई।
पाप दोष संताप नशाओ, भव बंधन से मुक्त कराओ॥
सुत संपत्ति दे सुख उपजाओ, निज चरणन का दास बनाओ।
निगम सदा ये विनय सुनावै, पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥
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