पतित पावन हैं गोविंद, इनके सुमिरन में जीने से नष्ट होते हैं सारे कर्मबंध

ओशो सिद्धार्थ औलिया आध्यात्मिक गुरु, ओशोधारा नानकधाम के संस्थापक गुरु तेगबहादुर जी गुरु सिक्खी परंपरा के नवें गुरु हैं. वे छठे गुरु हरगोविंद सिंह जी के सुपुत्र हैं. आठवें गुरु हरकिशन जी मात्र आठ वर्ष की अवस्था में अपना शरीर छोड़ते समय संकेत दे गये थे कि अगले गुरु गुरद्वारा बाबा बकाला साहिब में होंगे. […]

ओशो सिद्धार्थ औलिया
आध्यात्मिक गुरु, ओशोधारा नानकधाम के संस्थापक
गुरु तेगबहादुर जी गुरु सिक्खी परंपरा के नवें गुरु हैं. वे छठे गुरु हरगोविंद सिंह जी के सुपुत्र हैं. आठवें गुरु हरकिशन जी मात्र आठ वर्ष की अवस्था में अपना शरीर छोड़ते समय संकेत दे गये थे कि अगले गुरु गुरद्वारा बाबा बकाला साहिब में होंगे. लेकिन बकाले में 22 दावेदार प्रकट हो गये. इस बीच, एक व्यापारी था- माखनशाह. जहाज लेकर समुद्र में था कि तूफान आ गया. जहाज डूबने लगा और उसने अपने गुरु से प्रार्थना की कि अगर मेरा जहाज बच गया, तो संगत को पांच सौ स्वर्ण असर्फियां दूंगा. माखनशाह जब आया तब तक आठवें गुरु विदा हो चुके. उसे बताया गया कि अगले गुरु बकाले में प्रकट होंगे. बकाले पहुंचने पर उसने देखा कि 22 लोग अपनी गद्दी लगाये बैठे हैं.
दो-दो मोहरें उसने सबको दी. सबने स्वीकार किया, सबने दावा किया कि मैं ही असली गुरु हूं. अंत में किसी ने बताया कि एक संत वर्षों से तपस्यारत हैं. वह मिला उनसे. लेकिन जब गुरु तेगबहादुर से मिला और उसने वहां भी दो मोहरें दीं, तो गुरु तेगबहादुर जी ने कहा कि तुमने तो पांच सौ मोहरों का वादा किया था. इतना सुनते ही माखनशाह बल्लियों उछलने लगा- ‘गुरु लाभेउ रे गुरु लाभेउ रे।’ अर्थात्, गुरु मिल गया, गुरु मिल गया. गुरु तेगबहादुर जी का जीवन एक तपस्वी का जीवन है. त्याग और बलिदान का जीवन है.
औरंगजेब के जमाने में जब हिंदुओं को जबरन मुसलमान बनाया जा रहा था, तो कश्मीर के पंडितों ने गुहार लगायी और गुरु तेगबहादुर जी ने कहा कि किसी संत को बलिदान देना होगा. गुरु गोविंद सिंह जी उस समय बच्चे थे. उन्होंने कहा-‘आपसे बड़ा संत और धरती पर कौन है?’ गुरु तेगबहादुर जी ने कहा- ‘तुम ठीक कहते हो.’
और उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता के लिए, धर्म परिवर्तन की औरंगजेब की मांग ठुकरा दी और अपना बलिदान दे दिया. दिल्ली स्थित गुरद्वारा शीशगंज इसी घटना की स्मृति में बनाया गया है. गुरु अर्जुन देव जी और गुरु तेगबहादुर जी ने मानवता और धार्मिकता के हित में जो बलिदान दिया, उसी से ही भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की पृष्ठभूमि पैदा हुई.
ऐसे गुरु तेग बहादुर जी कहते हैं-
साधो गोबिंद के गुन गावउ।
मानस जनमु अमोलकु पाइओ बिरथा काहि गवावउ।।
ऐ साधको, आसन, प्राणायाम, योग, व्रत, यज्ञ, दान आदि करने से बेहतर है कि गोविंद को जानो, उसके सुमिरन में जियो, उसके गुण गाओ, क्योंकि यह मनुष्य जन्म बड़ा मुश्किल से मिलता है. बहा जा रहा है सब कुछ. समय बीता जा रहा है. जल्दी करो. मनुष्य जन्म मिला है, तो इसको गोविंद को जानने में, अपने मूल से जुड़ने में, अपने गंव्यत में जाने में, इस समय को लगाओ. कौन जाने, आगे यह अवसर मिले न मिले. सुमिरन करो, क्योंकि गोविंद पतित पावन है. कैसे भी कर्मबंध हों, गोविंद के सुमिरन में जीना शुरू करो, तो सारे कर्मबंध नष्ट हो जाते हैं.
प्रचलित कथा है कि एक बार सोनपुर में गंडक नदी में एक हाथी स्नान कर रहा था कि एक ग्राह ने उसे पकड़ लिया. हाथी चिंघाड़ा. कहते हैं कि उसने गोविंद को याद किया और उसकी रक्षा हो गयी. गुरु तेगबहादुर जी कहते हैं कि अगर एक हाथी की पुकार परमात्मा सुन सकता है, तो क्या वह तुम्हारी पुकार न सुनेगा! सुनेगा, जरा उसे प्राणों से उसको पुकारो तो सही.
पतित पुनीत दीन बंध हरि सरनि ताहि तुम आवउ।।
गज को त्रास मिटिओ जिह सिमरत तुम काहे बिसरावउ।।
तजि अभिमान मोह माइआ फुनि भजन राम चितु लावउ।।
गुरु तेगबहादुर कहते हैं, आदमी अहंकार में जीता है. अहंकार है क्या? अस्तित्व से हम अलग हैं, यही तो अहंकार है. और फिर मोह क्या है? पकड़ कर रखना चाहते हैं हम. धन है, मकान है, पत्नी है, बेटा है. सबको हम पकड़ करके रखना चाहते हैं. जानते हैं कि ज्यादा देर हम पकड़े नहीं रह सकते, फिर भी पकड़ है कि छूटती नहीं. माया इसी का नाम है.
मन का विस्तार ही माया है. जहां-जहां से हम मन से जुड़े हैं, संबंध बना रखे हैं हमने, वह सब मृत्यु के साथ छूट जाता है. तो जिसे कल छूटना ही है, उसे आज ही क्यों न छोड़ दें. इसे छोड़ो और वह करो जो करने लायक है. करने लायक काम बस एक ही है. उस राम को जानो, उसके सुमिरन में जीना शुरू करो, उसमें दिल लगाओ.
तजि अभिमान मोह माइआ फुनि भजन राम चितु लावउ।।
नानक कहत मुकति पंथ इहु गुरमुखि होइ तुम पावउ।।
हमारा शरीर अयोध्या जैसा है. जैसे दशरथ की मृत्यु के साथ ही सिंहासन खाली हुआ और फिर राम प्रकट हुए, साधना में भी वैसा ही होता है. पहले अहंकार मरता है, तभी इंद्रियां खाली होती हैं और शून्य में पहुंचना, स्वयं ही निराकार हो जाना संभव होता है. फिर, इसी सिंहासन पर एक दिन राम आकर विराजमान हो जाता है.
सत्यखंड की यात्रा ही मुक्तिपंथ की यात्रा
गुरु तेगबहादुर जी कहते हैं कि नानक के दिखाये मुक्ति मार्ग को गुरुमुख होकर ही पाया जा सकता है. गुरुमुख होकर ही कर्मफल के प्रति यह बोध पनपता है कि वस्तुतः कर्ता हम नहीं हैं, बल्कि सब चीजें एक परम नियम से चल रही हैं.
जो घटित हो रहा है, गोविंद की ही कृपा से ही हो रहा है, इसमें मेरी कोई भूमिका नहीं. फिर, अंतिम चरण में व्यक्ति ओंकार से यानी गोविंद से एकाकार हो जाता है. कबीर इसी को ‘बूंद समानी समुंद में सो कत हेरी जाय’ कहते हैं. नानक इसे सत्यखंड कहते हैं. गुरु तेग बहादुर जी कहते हैं कि जब तुम्हारे जीवन में भी यह घटना घटे, तभी समझना कि संबोधि घटी, आत्मज्ञान घटित हुआ. सत्यखंड की यात्रा ही मुक्तिपंथ की यात्रा है.

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