15 अगस्त 1947: जून 1948 की जगह 10 महीने पहले मिली आजादी, किसका था ये फैसला?

20 फरवरी 1947 को ब्रिटेन ने ऐलान किया था कि भारत को जून 1948 तक आजादी दे दी जाएगी, लेकिन कुछ ही महीनों बाद यह समय-सीमा घटाकर 15 अगस्त 1947 कर दी गई. आखिर ऐसा क्या हुआ कि करीब 10 महीने पहले ही सत्ता हस्तांतरण का फैसला लेना पड़ा? इस बदलाव में माउंटबेटन की भूमिका क्या थी और क्या इस जल्दबाजी का भारत के विभाजन और उसके बाद हुई हिंसा से कोई संबंध था?

20 फरवरी 1947 को ब्रिटेन ने ऐलान किया था कि जून 1948 तक भारत को आजादी दे दी जाएगी.लेकिन कुछ ही महीनों बाद यह तारीख अचानक बदल गई और करीब 10 महीने पहले, 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हो गया. इस आजादी की कीमत बेहद भयावह थी. भारत का विभाजन हुआ और भारत-पाकिस्तान दो नए देश बने. लाखों लोग विस्थापित हुए और बड़े पैमाने पर हिंसा हुई.

लेकिन सवाल ये है कि आखिर ब्रिटेन ने आजादी की तय समय-सीमा को इतना कम क्यों कर दिया? और 15 अगस्त की तारीख कैसे तय हुई?

15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी का फैसला किसका था?

  • 1947 के साल की शुरुआत में ब्रिटिश सरकार की योजना कुछ और थी. 20 फरवरी 1947 को प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने ऐलान किया कि ब्रिटिश भारत में सत्ता जून 1948 तक भारतीय हाथों में सौंप दी जाएगी.
  • लेकिन मार्च में नए वायसराय के तौर पर लॉर्ड लुई माउंटबेटन भारत पहुंचे और घटनाक्रम तेजी से बदलने लगा. 3 जून 1947 को ब्रिटिश सरकार ने नया ऐलान किया, इसमें कहा गया कि जून 1948 तक इंतजार करने के बजाय सत्ता हस्तांतरण इसी साल किया जाएगा.
  • दरअसल बदलते हालात और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण ब्रिटिश सरकार के सामने अब सवाल सिर्फ यह नहीं था कि भारत को कब आजाद किया जाए, बल्कि यह था कि सत्ता किस व्यवस्था के तहत और कितनी जल्दी हस्तांतरित की जाए.

ये भी पढ़ें: क्यों नहीं रह पाया संयुक्त भारत? क्या थे वो फैसले जिसके कारण दो हिस्सों में बंट गया भारत

जून 1948 से अगस्त 1947 कैसे हुई आजादी?

  • 1946 की Cabinet Mission Plan के जरिए ब्रिटिश सरकार ने कोशिश की थी कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच ऐसा संवैधानिक समझौता हो सके, जिससे भारत एक राजनीतिक इकाई के रूप में आगे बढ़े. लेकिन कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सहमति नहीं बन पाई और 1947 तक राजनीतिक गतिरोध और गहरा गया.
  • मुस्लिम लीग संविधान सभा की प्रक्रिया से अलग हो गई थी. ऐसे में ब्रिटिश सरकार के सामने सवाल था कि वह सत्ता किसे और किस व्यवस्था के तहत सौंपे.
  • 1946 के दौरान सांप्रदायिक तनाव और हिंसा भी बढ़ चुकी थी. 1947 की शुरुआत तक हालात ऐसे हो गए थे कि ब्रिटिश सरकार के सामने सत्ता हस्तांतरण को अनिश्चित समय तक टालना मुश्किल होता जा रहा था.
  • इसलिए 20 फरवरी के फैसले को लेकर 3 जून तक ब्रिटिश सरकार का निर्णय बदल चुका था. उसका कहना था कि सत्ता हस्तांतरण की तारीख को कम करना ही व्यावहारिक रास्ता है.
  • लेकिन इस नई योजना में सिर्फ भारत की आजादी शामिल नहीं थी. बल्कि इसमें पंजाब और बंगाल जैसे प्रांतों के बंटवारे की प्रक्रिया भी शामिल थी. यानी भारत की आजादी बंटवारे के साथ जुड़ी हुई थी.

माउंटबेटन के आने के बाद रफ्तार क्यों बढ़ी?

  • माउंटबेटन 24 मार्च 1947 को भारत के वायसराय बने. उनके सामने समय कम था, लेकिन समस्या बहुत बड़ी थी.
  • कांग्रेस संयुक्त भारत के लिए मजबूत केंद्र चाहती थी, जबकि मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग से पीछे हटने को तैयार नहीं थी और देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव और हिंसा गंभीर होती जा रही थी.
  • माउंटबेटन ने जल्द ही यह समझ लिया कि किसी साझा संवैधानिक समझौते का लंबे समय तक इंतजार करना मुश्किल होगा. इसलिए उसने भारत की आजादी की नई योजना बनाई और जून 1948 के बजाय 1947 का साल चुना.

लेकिन 15 अगस्त की तारीख ही क्यों?

  • 3 जून 1947 की घोषणा में सत्ता हस्तांतरण की समय-सीमा को आगे लाने का फैसला जरूर हुआ था, लेकिन उसी दिन 15 अगस्त की अंतिम तारीख घोषित नहीं की गई थी. इसके बाद की राजनीतिक और कानूनी प्रक्रिया में 15 अगस्त की तारीख तय हुई.
  • 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद ने Indian Independence Act पारित किया. इसकी पहली धारा में स्पष्ट किया गया कि 15 अगस्त 1947 से भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र Dominions के रूप में अस्तित्व में आएंगे.
  • इस तरह 3 जून की राजनीतिक योजना से लेकर 18 जुलाई के कानून तक सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया कानूनी रूप लेती गई और 15 अगस्त अंतिम तारीख बन गई.
  • इस पूरी प्रक्रिया में माउंटबेटन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी. प्रशासनिक तैयारियां भी इसी तारीख को ध्यान में रखकर आगे बढ़ रही थीं. 2 जुलाई को नेहरू के लिखे एक पत्र में भी 15 अगस्त से नई सरकार और प्रांतीय प्रशासन में होने वाले बदलावों की तैयारियों का उल्लेख मिलता है.
  • इससे साफ होता है कि 15 अगस्त की तारीख अचानक नहीं आई थी. जून से जुलाई 1947 के बीच राजनीतिक फैसलों और कानूनी प्रक्रिया के जरिए इसे अंतिम रूप दिया जा रहा था.

ये भी पढ़ें: कौन था रैडक्लिफ? जिसने बिना देखे खिंच दी भारत-पाकिस्तान की सीमा

क्या भारत चाहता था 15 अगस्त की आजादी?

  • भारत के लिए जल्दी मिलने वाली आजादी के साथ बंटवारा भी आने वाला था.
  • पंजाब और बंगाल का विभाजन, प्रशासन और संपत्ति का बंटवारा, सेना का पुनर्गठन—ये सब काम बहुत कम समय में करने थे. जुलाई में ब्रिटिश संसद की चर्चा से पता चलता है कि Partition Council और सेना के बंटवारे की तैयारी शुरू हो चुकी थी.
  • लेकिन समय बेहद कम था. Indian Independence Act 18 जुलाई 1947 को कानून बना और 15 अगस्त तक सिर्फ कुछ हफ्ते बचे थे.
  • भारतीय नेता जल्दी आजादी के पक्ष में जरूर थे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि सभी ने 15 अगस्त की तारीख तय की थी.
  • जून और जुलाई के नेहरू-माउंटबेटन के पत्राचार से पता चलता है कि भारतीय नेतृत्व भी कम समय में नई प्रशासनिक व्यवस्था की तैयारी कर रहा था. 2 जुलाई के एक पत्र में नेहरू ने 15 अगस्त से होने वाले प्रशासनिक बदलावों को लेकर माउंटबेटन से चर्चा की थी.
  • यानी फर्क यह है कि भारतीय नेतृत्व जल्दी आजादी चाहता था, लेकिन 15 अगस्त की तारीख का फैसला अकेले भारतीय नेतृत्व ने नहीं किया था.

तो क्या माउंटबेटन ने चुनी थी 15 अगस्त की तारीख?

यह सवाल आज भी इतिहासकारों के बीच बहस का विषय है.

  • एक नजरिया मानता है कि 1947 में हालात इतने खराब थे कि सत्ता को ज्यादा समय तक टालना जोखिम भरा हो सकता था.
  • वहीं दूसरा नजरिया कहता है कि माउंटबेटन ने उपलब्ध समय को काफी कम कर दिया और इतनी बड़ी प्रक्रिया को बेहद जल्द पूरा करने की कोशिश की.

सच्चाई शायद इन दोनों के बीच है.

दस्तावेजों से इतना साफ है कि जून 1948 तक इंतजार करना जरूरी नहीं था, लेकिन फरवरी 1947 की योजना में इतना समय मौजूद था. जून में समय-सीमा आगे लाई गई और जुलाई में 15 अगस्त को कानून में अंतिम तारीख बनाया गया.

तो जल्दबाजी के कारण से भारत-पाकिस्तान का बंटवारा?

इसका सीधा जवाब देना मुश्किल है.

हिंसा के पीछे वर्षों से बढ़ रहा सांप्रदायिक तनाव, कांग्रेस और मुस्लिम लीग का संघर्ष, पाकिस्तान की मांग और 1946-47 में पहले से जारी हिंसा जैसे कई कारण थे. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि सिर्फ कम समय मिलने की वजह से भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ.

फिर भी सवाल बना रहता है कि क्या इतने बड़े बंटवारे के लिए पर्याप्त समय मिला था?

सीमाएं तय करनी थीं, प्रशासन और सेना बांटनी थी और लाखों लोगों की सुरक्षा का सवाल था. लेकिन इन सबके लिए समय बेहद कम था.

ये भी पढ़ें: ऑफिशियल डाक्यूमेंट में है 15 अगस्त, फिर एक दिन पहले स्वतंत्रता दिवस क्यों मनाता है पाकिस्तान?

तो 15 अगस्त का फैसला किसका था?

इसका सबसे संतुलित जवाब यही है कि यह किसी एक का निजी फैसला नहीं था. ब्रिटिश सरकार ने जून 1947 में सत्ता हस्तांतरण की समय-सीमा आगे बढ़ाई, ब्रिटिश संसद ने जुलाई में Indian Independence Act पारित किया और 15 अगस्त को अंतिम तारीख बनाया. माउंटबेटन इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में थे और उनकी देखरेख में तैयारियां बेहद तेजी से आगे बढ़ीं.

इतिहास इसका कोई आसान जवाब नहीं देता. लेकिन इतना जरूर दिखाता है कि 15 अगस्त 1947 की तारीख अचानक तय नहीं हुई थी.

इसके पीछे ब्रिटेन की जल्द भारत से निकलने की इच्छा, भारत का राजनीतिक संकट, Partition का फैसला और माउंटबेटन की तेज कार्यशैली, इन सभी ने भूमिका निभाई.

15 अगस्त 1947 सिर्फ भारत की आजादी की तारीख नहीं थी. यह उस बेहद कम समय-सीमा की भी तारीख थी, जिसमें ब्रिटिश राज ने सत्ता हस्तांतरण, भारत का विभाजन और दो नए देशों की प्रशासनिक व्यवस्था को एक साथ पूरा करने की कोशिश की.

पढ़िए देश दुनिया और बिहार झारखंड की ओरिजिनल खबर


प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By गौतम कुमार

गौतम कुमार वर्तमान में प्रभात खबर से जुड़े पत्रकार हैं. वे राजनीति, इतिहास, साहित्य, खेल, कानून, लोक संस्कृति और मनोरंजन जैसे विविध विषयों पर लिखते हैं. किसी विषय पर रिपोर्टिंग या लेखन के दौरान उनका जोर केवल घटनाओं की जानकारी देने पर नहीं, बल्कि उसके पीछे की पृष्ठभूमि, सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ और उसके प्रभाव को समझाने पर रहता है.

अपने पत्रकारिता करियर में गौतम कुमार ने RealisticMedia और दैनिक भास्कर जैसे मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है. पत्रकारिता के अलावा उन्हें डिजिटल कंटेंट लेखन, वीडियो स्क्रिप्टिंग और डिजिटल प्रोडक्शन का अनुभव भी है. स्वतंत्र लेखक और ब्लॉगर के तौर पर उन्होंने अलग-अलग विषयों और डिजिटल माध्यमों के लिए लेखन किया है.

किताबों, फिल्मों और कहानियों में उनकी विशेष रुचि है. वे मानते हैं कि अच्छी किताब या अच्छी फिल्म मिलने के बाद बाकी दुनिया कुछ देर इंतजार कर सकती है. यही रुचि उनके लेखन में भी दिखाई देती है, जहां वे खबर और घटनाओं के पीछे छिपी कहानी को समझने और पाठकों के सामने उसे सरल और संदर्भपूर्ण तरीके से रखने की कोशिश करते हैं.

गौतम कुमार मानते हैं कि किसी विषय पर राय अलग हो सकती है और नजरिया भी अलग हो सकता है, लेकिन सार्थक संवाद की शुरुआत इन्हीं अलग-अलग दृष्टिकोणों को समझने से होती है. इसलिए पाठकों की राय, सुझाव और विचार उनके लिए महत्वपूर्ण हैं. उनसे सोशल मीडिया के माध्यम से भी जुड़ा जा सकता है.

Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >