Third World Countries : किसे कहते हैं तीसरी दुनिया, क्या भारत इस सूची में है शामिल?

Third World Countries : थर्ड वर्ल्ड, यह विशेषण उन देशों के लिए इस्तेमाल होता है जो विकास की दौड़ में अभी पिछड़े देश हैं. एक तरह से कम विकसित और गरीब देशों के बारे में बताने के लिए यह स्टीरियोटाइप संबोधन है. इस संबोधन के बारे में यह कहा जाता है कि एक अर्थशास्त्री अल्फ्रेड सावी ने सबसे पहले इस टर्म का प्रयोग पिछड़े देशों के लिए किया था. अब यह शब्द इसलिए चर्चा में है क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने देश में तीसरी दुनिया से माइग्रेशन बंद करने और वहां के लोगों को वापस भेजने की बात कही है.

Third World Countries : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तीसरी दुनिया के देशों से माइग्रेशन रोकने की धमकी दी है. उन्होंने यह कहा है कि वे तीसरी दुनिया के देशों से माइग्रेशन रोकने की योजना बना रहे हैं, ताकि अमेरिका में सिस्टम अच्छे से काम करे. उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका में वैसे लोगों को रहने की इजाजत नहीं हो सकती है जो वहां की सभ्यता संस्कृति और नियमों से मेल नहीं खाते हों. ट्रंप ने कहा कि ऐसे लोगों को वापस उनके देश भेजा जाएगा.

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यह बयान व्हाइट हाउस के पास हुई गोलीबारी के बाद दी है, जिसमें एक अफगानिस्तान के नागरिक ने दो नेशनल गार्ड को गोली मार दी थी, जिसमें एक मौत हो गई और दूसरा गंभीर रूप से घायल था. गौर करने वाली बात यह है कि ट्रंप ने तीसरी दुनिया शब्द का संबोधन किया है, लेकिन किसी खास देश का नाम नहीं लिया है. ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि आखिर डोनाल्ड ट्रंप किसे टारगेट कर रहे हैं और तीसरी दुनिया का अर्थ क्या है?

क्या है तीसरी दुनिया?

तीसरी दुनिया या थर्ड वर्ल्ड कंट्री वैसे देशों को कहा जाता है, जो विकासशील और कम विकसित देश हैं. ऐसे देशों में अधिकतर देश वो थे जो उपनिवेशवाद के शिकार रहे और सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रहे. थर्ड वर्ल्ड कंट्री टर्म कोल्ड वार के वक्त उन देशों के लिए भी इस्तेमाल हुआ जो ना तो अमेरिका के साथ थे और ना ही रूस के साथ. हालांकि यह कोई भौगोलिक विभाजन नहीं था. समय के साथ यह वर्गीकरण समाप्त होता गया और आज के संदर्भ में थर्ड वर्ल्ड टर्म गरीब और विकासशील देशों के लिए प्रयुक्त होने लगा.

थर्ड वर्ल्ड में कौन से देश हैं शामिल?

तीसरी दुनिया के देश, लाल रंग में दिखाए गए हैं. एआई इमेज

विश्व के मानचित्र पर देखें तो थर्ड वर्ल्ड वैसे देश हैं, जो उपनिवेशवाद के शिकार रहे और कम विकसित हैं. प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ हरिश्वर दयाल बताते हैं कि तीसरी दुनिया में वैसे देश शामिल हैं, जो पिछड़े हैं, जहां गरीबी है और जो विकासशील हैं. इन देशों ने गुलामी झेली है और पहली और दूसरी दुनिया के लोगों ने इन देशों के संसाधनों का भरपूर दोहन भी किया है. अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के कई देश इस सूची में आते हैं.

थर्ड वर्ल्ड और पहली और दूसरी दुनिया का संबंध क्या है?

पहली और दूसरी दुनिया में विकसित देश आते हैं जहां औद्योगीकरण ज्यादा हुआ था और विकास भी. ऐसे देशों का नेतृत्व अमेरिका और रूस जैसे देश करते थे. डॉ हरिश्वर दयाल कहते हैं कि तीसरी दुनिया के लोग रोजगार और बेहतर जीवन के लिए पहली और दूसरी दुनिया का रुख करते हैं. इसकी वजह यह है कि यहां रोजगार और बेहतर जीवन के अवसर ज्यादा हैं. विकासशील देशों में इसकी कमी है. साथ ही इन देशों में जनसंख्या में काफी बढ़ी है क्योंकि मृत्युदर कम हुआ है, इसकी वजह से यहां वर्किंग एज के लोगों की आबादी बहुत अधिक है, काम की कमी की वजह से ये लोग विकसित देशों का रुख करते हैं.

डॉ हरिश्वर दयाल बताते हैं कि वहीं विकसित देशों में इनकम अधिक होने की वजह से फैमिली छोटी रखते हैं. जन्मदर यहां बहुत कम है, ऐसे में वे लेबर और अन्य रिसोर्स पर्सन के लिए तीसरी दुनिया के लोगों पर ही निर्भर हैं. हां, यह सही है कि लीगल तरीके से तीसरी दुनिया के लोग अगर विकसित देशों का रुख करें, तो खर्च बहुत ज्यादा आएगा, इसलिए वे डंकी रूट का सहारा लेते हैं और फिर विकसित देशों में जाकर छोटे-बड़े काम करते हैं और वहां खप जाते हैं.

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क्या भारत तीसरी दुनिया का हिस्सा है?

भारत इस कोशिश में है कि वह जल्दी ही खुद को 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बना लें, इस लिहाज से भारत विश्व की पांच सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था का हिस्सा है. तीसरी दुनिया की जो परिभाषा है उसपर अगर गौर किया जाए, तो वर्तमान में भारत की जो अर्थव्यवस्था है, वह उससे मेल नहीं खाती है. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत तीसरी दुनिया का हिस्सा है या नहीं? चूंकि भारत एक विकासशील देश है इसलिए हमेशा से भारत को तीसरी दुनिया का हिस्सा माना गया. इस संबंध में डॉ हरिश्वर दयाल कहते हैं कि निश्चित तौर पर भारत तीसरी दुनिया का हिस्सा है, क्योंकि आज भी हमारे देश में गरीबी है और हम विकासशील देश हैं. हां, यह बात जरूर है कि हम अच्छे तरीके से विकास कर रहे हैं और हमारे विकास की गति बहुत अच्छी है. हमारे जो दावे हैं, उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि निकट भविष्य में हम विकसित देश बन जाएं, लेकिन फिलवक्त हम विकासशील देश ही हैं.

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लेखक के बारे में

Author: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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