कल्पना कीजिए.
कोई सैनिक युद्ध में हार जाए तो...
वह कैदी बन सकता है.
उससे पूछताछ हो सकती है.
उसे जेल में रखा जा सकता है.
लेकिन अगर युद्ध के दौरान उसके शरीर को ही प्रताड़ना का हथियार बना दिया जाए, तो यह केवल हिंसा नहीं रह जाती, बल्कि इंसान की गरिमा पर हमला बन जाती है.
Russia-Ukraine War को तीन साल से ज्यादा हो चुके हैं. इस दौरान मिसाइल, ड्रोन, टैंक और बमों की चर्चा सबसे ज्यादा हुई. लेकिन संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय जांचकर्ताओं की हालिया रिपोर्ट एक ऐसे पहलू की ओर इशारा करती है, जिसकी चर्चा अपेक्षाकृत कम हुई है.
रिपोर्ट के अनुसार, रूसी हिरासत केंद्रों में कई यूक्रेनी युद्धबंदियों और नागरिकों के साथ यौन हिंसा और यौन यातना (Sexual Torture) के गंभीर आरोप सामने आए हैं. रूस इन आरोपों को लगातार खारिज करता रहा है और उन्हें राजनीतिक रूप से प्रेरित बताता है.
युद्ध में गोलियां शरीर को घायल करती हैं, लेकिन यौन हिंसा का उद्देश्य अक्सर शरीर से ज्यादा मन को तोड़ना होता है.
युद्ध का नया चेहरा या पुरानी रणनीति?
युद्ध के दौरान महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के मामले पहले भी सामने आते रहे हैं. बोस्निया, रवांडा, कांगो और इराक जैसे कई संघर्षों में यह देखा गया है कि महिलाओं के साथ बलात्कार को समुदाय को डराने और अपमानित करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया.
लेकिन यूक्रेन युद्ध में सामने आ रही तस्वीर एक अलग सवाल खड़ा करती है.
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, जिन 310 मामलों की जांच चल रही है, उनमें 280 पीड़ित पुरुष, 26 महिलाएं और 4 लड़कियां हैं.
यानी इस बार सबसे अधिक निशाने पर पुरुष युद्धबंदी बताए जा रहे हैं.
यह आंकड़ा बताता है कि आधुनिक युद्ध में यौन हिंसा केवल महिलाओं तक सीमित नहीं रह गई है. इसका इस्तेमाल किसी भी बंदी को मानसिक रूप से तोड़ने के लिए किया जा सकता है.
रिपोर्ट में क्या कहा गया है?
अमेरिकी अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने कई पूर्व यूक्रेनी युद्धबंदियों, यूक्रेनी अभियोजकों और संयुक्त राष्ट्र के जांचकर्ताओं से बातचीत के आधार पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है.
रिपोर्ट के अनुसार, कई पूर्व कैदियों ने आरोप लगाया कि हिरासत के दौरान उनके साथ यौन यातना की गई.
इन आरोपों में शामिल हैं-
- बलात्कार या बलात्कार का प्रयास
- निजी अंगों पर हमला और गंभीर चोट पहुंचाना
- बिजली का झटका देना
- निर्वस्त्र कर घंटों खड़ा रखना
- यौन अपमान के जरिए मानसिक प्रताड़ना
कुछ पूर्व कैदियों ने यह भी दावा किया कि उन्हें धमकी दी गई कि वे भविष्य में संतान पैदा नहीं कर सकेंगे.
इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से हर मामले में पुष्टि करना संभव नहीं है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने भी कई मामलों की जांच जारी होने की बात कही है.
आखिर ऐसा क्यों किया जाता है?
युद्ध में किसी सैनिक को मार देना आसान है.
लेकिन कई बार उद्देश्य केवल दुश्मन को हराना नहीं होता.
उसे मानसिक रूप से इस तरह तोड़ देना होता है कि वह अपने समाज में लौटने के बाद भी सामान्य जीवन न जी सके.
यौन यातना का सबसे बड़ा उद्देश्य यही माना जाता है.
यह पीड़ित को केवल शारीरिक दर्द नहीं देती, बल्कि शर्म, भय, अपराधबोध और सामाजिक अलगाव की भावना भी पैदा करती है.
युद्ध के बाद भी यह घाव वर्षों तक बना रहता है.
युद्ध खत्म हो सकता है, लेकिन यातना की याद अक्सर युद्ध से भी लंबी चलती है.
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पुरुष पीड़ितों पर कम चर्चा क्यों होती है?
जब भी युद्ध में यौन हिंसा की बात होती है, तो सबसे पहले महिलाओं की तस्वीर सामने आती है.
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि पुरुषों के साथ होने वाली यौन हिंसा पर अक्सर बहुत कम चर्चा होती है.
इसके पीछे कई कारण हैं.
पहला, सामाजिक शर्म.
दूसरा, पुरुषों द्वारा शिकायत दर्ज कराने में झिझक.
तीसरा, यह धारणा कि पुरुष ऐसे अपराधों के शिकार नहीं हो सकते.
इसी वजह से कई मामले कभी सामने ही नहीं आते.
यही कारण है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक संख्या आधिकारिक आंकड़ों से कहीं अधिक हो सकती है.
संयुक्त राष्ट्र क्या कहता है?
संयुक्त राष्ट्र की जांच टीमों ने कई पूर्व युद्धबंदियों और नागरिकों से बातचीत की है.
उनके अनुसार, जिन मामलों की जांच चल रही है, उनमें अधिकांश पीड़ितों ने हिरासत के दौरान यौन हिंसा का आरोप लगाया है.
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि कई मामलों में पीड़ितों के बयान एक-दूसरे से मेल खाते हैं.
हालांकि जांच अभी पूरी नहीं हुई है.
इसलिए सभी मामलों पर अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है.
रूस का पक्ष भी समझना जरूरी
इन सभी आरोपों पर रूस ने लगातार इनकार किया है.
मॉस्को का कहना है कि ये आरोप राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं और इनके पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं.
रूस ने यह भी कहा है कि उसके खिलाफ लगाए गए कई आरोप युद्ध प्रचार (Propaganda) का हिस्सा हैं.
दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र ने कई बार कहा है कि उसे रूसी नियंत्रण वाले कुछ इलाकों तक जांच के लिए पूरी पहुंच नहीं मिली.
यही वजह है कि स्वतंत्र जांच कई मामलों में चुनौती बनी हुई है.
किसी भी युद्ध में एक पक्ष के आरोप और दूसरे पक्ष के इनकार के बीच सच्चाई तक पहुंचना आसान नहीं होता. इसलिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की निष्पक्ष जांच बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है.
असली संख्या शायद कहीं ज्यादा हो
यूक्रेनी अभियोजकों का कहना है कि उनके पास सैकड़ों मामलों की जांच चल रही है.
लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है.
कारण साफ है.
कई पीड़ित बोलना नहीं चाहते.
उन्हें बदनामी का डर होता है.
कई लोग मानसिक आघात से बाहर ही नहीं निकल पाते.
और कई ऐसे इलाके हैं, जहां स्वतंत्र जांच एजेंसियां पहुंच ही नहीं सकी हैं.
यानी जो सामने आया है, वह पूरी तस्वीर नहीं भी हो सकता है.
आधुनिक युद्ध का बदलता चेहरा
आज युद्ध केवल मोर्चे पर नहीं लड़े जाते.
ड्रोन, साइबर हमले, सूचना युद्ध, आर्थिक प्रतिबंध और मनोवैज्ञानिक दबाव आधुनिक संघर्ष का हिस्सा बन चुके हैं.
इसी कड़ी में यौन हिंसा को भी कई विशेषज्ञ मनोवैज्ञानिक युद्ध (Psychological Warfare) का एक खतरनाक रूप मानते हैं.
यह केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे समाज के आत्मविश्वास को चोट पहुंचाने का प्रयास होता है.
सबसे बड़ा सवाल
रूस-यूक्रेन युद्ध कब खत्म होगा, इसका जवाब अभी किसी के पास नहीं है.
लेकिन एक सवाल आज ही पूछा जाना चाहिए.
अगर युद्ध में इंसान की गरिमा ही सबसे बड़ा निशाना बन जाए, तो जीत किसकी होगी?
इतिहास बताता है कि युद्ध में केवल शहर नहीं उजड़ते.
मानवीय मूल्य भी घायल होते हैं.
और जब किसी युद्ध में शरीर को ही संदेश बनाने की कोशिश होने लगे, तब यह केवल दो देशों का संघर्ष नहीं रह जाता.
यह पूरी मानवता के सामने खड़ा एक नैतिक प्रश्न बन जाता है.
इसीलिए इन आरोपों की निष्पक्ष, स्वतंत्र और विश्वसनीय जांच जरूरी है. क्योंकि युद्ध में सच्चाई अक्सर सबसे पहले घायल होती है, लेकिन न्याय की शुरुआत भी उसी सच्चाई को सामने लाने से होती है.
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