वंदे मातरम…को लेकर एक बार फिर सियासी बहस हो रही है. 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम् के गायन का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसके बाद बीजेपी ने कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के सम्मान और तय प्रोटोकॉल के उल्लंघन का आरोप लगाया, दिल्ली के बाद गोवा में भी वंदे मातरम् को लेकर विवाद हुआ. इसी बीच कांग्रेस कार्यसमिति यानी CWC ने फैसला किया कि पार्टी अब आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम के सिर्फ पहले दो अंतरे ही गाएगी.
लेकिन सवाल है कि पहले दो अंतरों में ऐसा क्या है, जिस पर कोई आपत्ति नहीं और बाकी अंतरों में ऐसा क्या है, जिसे लेकर विवाद है? इसकी जड़ें 1937 के उस फैसले में हैं, जब कांग्रेस ने पहली बार तय किया था कि राष्ट्रीय कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सिर्फ शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाएं.
तो आखिर 1937 में ऐसा फैसला क्यों हुआ था? वंदे मातरम् को लेकर विवाद की शुरुआत कहां से हुई और करीब 90 साल बाद यह मुद्दा फिर सियासत के केंद्र में क्यों है? आइए, आसान भाषा में समझते हैं वंदे मातरम को लेकर पूरा विवाद क्या है.
आजादी के गीत से कैसे विवाद में आया वंदे मातरम
- वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में की थी. बाद में इसे उनके उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया, जिसकी कहानी 18वीं सदी के संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि पर आधारित थी.
- लेकिन वंदे मातरम की असली पहचान बनी 1905 के स्वदेशी आंदोलन के दौरान. ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन में यह एक प्रेरणादायक नारे की तरह इस्तेमाल होने लगा और धीरे-धीरे आजादी की लड़ाई का प्रतीक बन गया.
- हालांकि, इसकी लोकप्रियता के साथ ही इस पर सवाल भी उठने लगे. मुस्लिम लीग को गीत में भारत को मां के रूप में संबोधित करने और बाद के अंतरों में मौजूद धार्मिक संदर्भों पर आपत्ति थी. उसका तर्क था कि इन संदर्भों में मूर्तिपूजा की झलक मिलती है.
- यही विवाद आगे चलकर 1937 में कांग्रेस के सामने भी आया. कांग्रेस ने माना कि वंदे मातरम् राष्ट्रीय आंदोलन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसके धार्मिक संदर्भों को देखते हुए राष्ट्रीय कार्यक्रमों में इसके सिर्फ पहले दो अंतरे हीं गाए जाएं.
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कांग्रेस ने वंदे मातरम के पहले दो अंतरों को ही क्यों चुना?
- 1937 में कांग्रेस के सामने एक मुश्किल सवाल था. दरअसल वंदे मातरम आजादी के आंदोलन की पहचान बन चुका था, लेकिन इसके कुछ हिस्सों को लेकर मुस्लिम नेताओं की आपत्ति थी.
- अक्टूबर 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने इस पर विचार किया और तय किया कि सार्वजनिक और राष्ट्रीय कार्यक्रमों में वंदे मातरम के सिर्फ पहले दो अंतरे गाए जाएं.
- इसके पीछे सबसे बड़ी वजह थी कि पहले दो अंतरों में भारत की धरती की सुंदरता और समृद्धि हरी-भरी फसलें, नदियां, ठंडी हवा, चांदनी रात और फूलों से सजे पेड़ का वर्णन है.
वंदे मातरम के किन अंतरों को लेकर विवाद है?
हालांकि विवाद इसके बाद के अंतरों को लेकर है.
- तीसरे अंतरे में मातृभूमि की रक्षा के लिए करोड़ों भुजाओं और हथियारों की शक्ति का जिक्र है. चौथे में मातृभूमि की मौजूदगी को मंदिरों से जोड़ा गया है.
- और पांचवें अंतरे में भारत की तुलना दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवियों से की गई है.
- यही हिस्सा मुस्लिम नेताओं और विद्वानों की आपत्ति की बड़ी वजह बना. उनका तर्क था कि भारत को देवी के रूप में पूजना इस्लाम के खिलाफ है.
- इसके अलावा, वंदे मातरम् का मूल संदर्भ बंकिम चंद्र के उपन्यास ‘आनंदमठ’ से जुड़ा है, जिसमें तत्कालीन मुस्लिम सत्ता के खिलाफ संघर्ष की पृष्ठभूमि है.
- इसलिए आलोचकों का कहना रहा कि गीत के बाद के हिस्सों को इस ऐतिहासिक और साहित्यिक संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता.
यानी कांग्रेस का 1937 का फैसला मूल रूप से वंदे मातरम् को खारिज करना नहीं, बल्कि उसके ऐसे हिस्से को चुनना था जिसे राष्ट्रीय मंच पर ज्यादा सर्वस्वीकार्य माना जा सके.
बाद में 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने भी कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में वंदे मातरम् की ऐतिहासिक भूमिका रही है और उसे जन गण मन के समान सम्मान दिया जाएगा. आज जिस वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में गाया जाता है, उसमें भी परंपरागत रूप से यही पहले दो ही अंतरे इस्तेमाल होते हैं.
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पुराना फैसला या नया प्रोटोकॉल, क्या है आज का विवाद
वंदे मातरम को लेकर यह बहस सिर्फ कांग्रेस के 1937 वाले फैसले तक सीमित नहीं है. दिसंबर 2025 में संसद में इसकी 150वीं वर्षगांठ पर हुई विशेष चर्चा के दौरान भी यह मुद्दा उठा था
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि 1937 में मुस्लिम लीग के विरोध के दबाव में वंदे मातरम के मूल स्वरूप को सीमित किया. कांग्रेस ने इसका जवाब देते हुए नेहरू के उन बयानों का हवाला दिया, जिनमें उन्होंने वंदे मातरम् के खिलाफ विरोध को सांप्रदायिक राजनीति से जोड़कर देखा था. यानी 1937 के फैसले की व्याख्या को लेकर ही आज भी दोनों पक्षों के बीच मतभेद है.
और अब 2026 में वंदे मातरम् के सम्मान और उसके गायन को लेकर नए कानूनी प्रावधानों ने इस बहस को और अहम बना दिया है. जिसको लेकर कांग्रेस का कहना है कि पार्टी का यह फैसला कि सिर्फ पहले दो अंतरे गाया जाए, उसकी कोई नई नीति नहीं, बल्कि 1937 से चली आ रही ऐतिहासिक नीति है.
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