सुबह 5:12 बजे, पटना
अलार्म बजने से पहले ही उसकी आंख खुल गई थी.
25 वर्षीय अनुराग ने कमरे की छत को कुछ सेकंड तक देखा. फिर बिस्तर के किनारे रखी हुई एनसीईआरटी की पुरानी किताब को उठाया. किताब के पन्नों पर दर्जनों निशान थे. कुछ नीले, कुछ लाल. कुछ उम्मीद के, कुछ घबराहट के.
आज यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा का दिन था.
पिछले तीन वर्षों से उसकी जिंदगी इसी तारीख के इर्द-गिर्द घूम रही थी.
पटना के राजेंद्र नगर की उस छोटी-सी किराए की कोठरी में मां की आवाज नहीं थी, लेकिन मोबाइल पर आया एक व्हाट्सएप संदेश था—
“बेटा, भगवान पर भरोसा रखना.“
अनुराग मुस्कुराया. जवाब में सिर्फ हाथ जोड़ने वाला इमोजी भेजा.
करीब 300 किलोमीटर दूर, दरभंगा में 28 वर्षीय श्वेता झा परीक्षा केंद्र जाने की तैयारी कर रही थी.
यह उसका पांचवां प्रयास था.
स्कूल में पढ़ाने की नौकरी छोड़कर उसने तैयारी शुरू की थी. परिवार अब भी पूछता था—”कब तक?”
आज वह सवाल फिर उसके मन में आया, लेकिन उसने उसे झटक दिया.
टेबल पर रखे एडमिट कार्ड को देखा और धीरे से खुद से कहा—
बस आज का दिन.
उधर रांची में 23 वर्षीय निधि मुंडू पहली बार यूपीएससी का पेपर देने जा रही थी.
उसके कमरे की दीवार पर चिपका हुआ एक कागज था—
“आईएएस 2027″
वह बार-बार समसामयिक घटनाओं के नोट्स पलट रही थी. पिछले छह महीनों में उसने अनगिनत वीडियो देखे थे, टेस्ट सीरीज दी थीं और शिक्षकों की भविष्यवाणियां सुनी थीं.
उसे लगता था कि उसे पता है कि इस साल पेपर किस दिशा में जाएगा.
कम-से-कम सुबह तक तो उसे यही लगता था.
UPSC Prelims : व्यवस्था और आकांक्षा के बीच का वह एक दिन
सुबह 9:30 बजे.
देशभर के हजारों अभ्यर्थियों की तरह ये तीनों भी अलग-अलग परीक्षा कक्षों में बैठे थे.
घड़ी की सुई आगे बढ़ी.
प्रश्नपत्र खुला.
पहला पन्ना पलटा.
फिर दूसरा.
फिर तीसरा.
और तभी तीनों के चेहरे पर लगभग एक जैसी प्रतिक्रिया उभरी—
हैरानी.
कुछ प्रश्न ऐसे थे जिनकी चर्चा किसी कोचिंग के ‘मोस्ट एक्सपेक्टेड’ नोट्स में नहीं थी.
कुछ विषय ऐसे थे जिन्हें अधिकांश अभ्यर्थियों ने हाशिये पर रखा था.
कई सवालों को देखकर अनुराग ने पेन रोक दिया.
श्वेता ने माथे पर हाथ रख लिया.
निधि को लगा जैसे वह किसी दूसरे परीक्षा पैटर्न का पेपर हल कर रही हो.
परीक्षा हॉल में सन्नाटा था, लेकिन हजारों दिमागों में एक ही सवाल घूम रहा था—
“यह वही परीक्षा है जिसकी तैयारी हम कर रहे थे?”
शाम 4 बजे.
परीक्षा समाप्त हो चुकी थी.
केंद्रों के बाहर अभ्यर्थियों के समूह बन चुके थे.
कोई कह रहा था—”कटऑफ बहुत नीचे जाएगी.”
कोई दावा कर रहा था—”पेपर आसान था.”
यूट्यूब चैनलों पर लाइव विश्लेषण शुरू हो चुके थे.
टेलीग्राम समूहों में अनौपचारिक उत्तर-कुंजियां दौड़ रही थीं.
व्हाट्सएप पर सैकड़ों संदेश आ रहे थे.
और इस शोर के बीच अनुराग, श्वेता और निधि अपने-अपने फोन की स्क्रीन पर झुके हुए थे.
हर नई उत्तर-कुंजी के साथ उनके अंक बदल रहे थे.
कभी चयन की उम्मीद बनती.
कभी टूट जाती.
अगले कुछ दिनों में भ्रम और गहरा गया.
एक कोचिंग संस्थान का उत्तर सही था.
दूसरे का गलत.
तीसरे का बिल्कुल अलग.
सोशल मीडिया पर कुछ प्रश्नों को लेकर तीखी बहस छिड़ गई.
किसी ने प्रश्नों को अस्पष्ट बताया.
किसी ने आधिकारिक उत्तर-कुंजी में संभावित तथ्यात्मक त्रुटियों का आरोप लगाया.
यूट्यूब पर वीडियो बन रहे थे.
टेलीग्राम पर स्क्रीनशॉट घूम रहे थे.
और हजारों अभ्यर्थियों की तरह अनुराग, श्वेता और निधि भी एक ऐसे सवाल से जूझ रहे थे जो किसी प्रश्नपत्र में नहीं लिखा था—
“क्या मैंने तैयारी में कहीं गलती की?”
“क्या मैंने ट्रेंड को गलत समझा?”
“या फिर पूरी तैयारी व्यवस्था ही गलत दिशा दिखा रही थी?”
यहीं से शुरू होती है उस परीक्षा की कहानी, जिसे लाखों लोग सिर्फ एक प्रतियोगिता मानते हैं, लेकिन जिसके भीतर वर्षों की उम्मीदें, आर्थिक त्याग, मानसिक दबाव और अनिश्चितता की एक लंबी दास्तान छिपी होती है.
सपनों की परीक्षा : यूपीएससी
इस देश में UPSC एग्जाम नहीं इमोशन है. आप कश्मीरी हो या तामिल, बिहार से हो या अरुणाचल से. अखंड भारत की झलक इसमें दिखती है. देश को क्रिकेट के बाद और मोमोस से ज्यादा किसी ने जकड़ा है तो वो है UPSC. यूट्यूब इंडिया के हिसाब से भी सबसे ज्यादा देखे जाने वाले वीडियोस में UPSC के इर्दगिर्द वाली वीडियोस हमेशा बवाल कटती है. ग्लोबल पॉलिटिक्स को इसने ‘कहानी घर-घर की‘ बना दिया है. और लक्ष्मीकांत को संविधान से ज्यादा पढ़वा दिया है.
बाजार के हिसाब से भले ही मुखर्जीनगर और ओल्ड राजेंद्रनगर दबदबा बनाते हो. पर जैसे-जैसे आप उत्तर-प्रदेश, बिहार के तरफ आएंगे, इसके तपस्या का ताप बढ़ जाता है. जज्बात गढ़ने लगते है और उम्र… वो तो ऐसे गुज़रती है जैसे बालकाल से मृत्यु के बीच में लोग यहां UPSC संस्कार ही कराते रह गए हो. चाय के ठेले पर, अपने बाप-दादा से ज्यादा कौन सा बन्दर-बिल्ली को लाल किताब में डाला गया है इसपर माथापच्ची करेगा. और गहराई में कहें तो शायद एक लम्बे अंधेरे दौर से गुजरने के कारण, लोगों को खुद को साबित करने का सबसे बड़ा माध्यम यही दिखता है.
हर वर्ष लाखों लोग इस यात्रा की शुरुआत करते हैं. लेकिन मंजिल तक पहुंचने वालों की संख्या कुछ सौ में सिमट जाती है. इस लंबी और कठिन प्रक्रिया के बीच तैयारी केवल किताबों और नोट्स तक सीमित नहीं रहती. बल्कि, यह समय, धन, भावनाओं, रिश्तों और आत्मविश्वास का भी निवेश बन जाती है.
विशेष श्रृंखला क्यों?
हाल के वर्षों में सिविल सेवा को लेकर उलझनें बढ़ी हैं. खासकर प्रारंभिक परीक्षा को लेकर एक नई बहस उभरी है. क्या यूपीएससी जानबूझकर अधिक अप्रत्याशित होती जा रही है? क्या परीक्षा रटंत तैयारी और कोचिंग-निर्भर मॉडल से दूरी बनाना चाहती है? या फिर बुनियादी समझ, निर्णय लेने की योग्यता और देश के विविधताओं के भांति व्यापक दृष्टिकोण को परखना चाहती है? इन सभी मुद्दों की वजह से अब उम्मीदवारों के मन में उत्सुकता, और उसके बाद उलझन, तनाव और असमानता की भावना पैदा हो रही है.
इस विशेष श्रृंखला में हम अनुराग, श्वेता और निधि जैसे हजारों अभ्यर्थियों की कहानी के माध्यम से यूपीएससी की बदलती दुनिया को समझने का प्रयास करेंगे. हम CSAT के 15 वर्षों की यात्रा, परीक्षा पैटर्न में आए बदलावों, मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियों, काउंसलरों की भूमिका, कोचिंग उद्योग के बढ़ते प्रभाव, और आयोग की संभावित सोच की पड़ताल करेंगे. साथ ही यह भी समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर उस परीक्षा के पीछे क्या है, जो हर साल लाखों सपनों को उम्मीद, अनिश्चितता और संघर्ष के एक नए दौर में प्रवेश कराती है. इस चरण में, हमें इंडस्ट्री के बड़े नामों, जैसे Unacademy, Drishti IAS, Vajiram & Ravi, Amity University, Pratiyogita Darpan, Oswal Publications, Disha Publications और पटना के मशहूर Eduteria का साथ मिलेगा. साथ ही, इसमें वे चुनिंदा छात्र भी शामिल होंगे जो अभी LBSNAA में ट्रेनिंग ले रहे हैं और वे शिक्षक भी जो स्वतंत्र रूप से हमसे जुड़े हैं.
यह केवल एक परीक्षा की कहानी नहीं होगी. यह हमारे अरमानों और व्यवस्था के बीच खड़े उस भारत की कहानी होगी, जो हर साल अपने सबसे महत्वाकांक्षी युवाओं को एक कठिन सवाल पूछता है, की आप कितनी दूर तक जाने को तैयार हैं?
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