AI के जमाने में कितने काम की है डिग्री? स्किल और नौकरी के बीच क्यों बढ़ रहा गैप

AI के दौर में नौकरी का बाजार तेजी से बदल रहा है. ऐसे में सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि प्रैक्टिकल स्किल, समस्या सुलझाने की क्षमता और AI के सही इस्तेमाल की समझ छात्रों के लिए कितनी जरूरी हो गई है?

एआई के दौर में जनरेटिव एआई ने काम करने के तौर-तरीके बदल दिए हैं. ऐसे में सवाल ये है कि पहले से ही स्किल और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की कमी झेल रहे इन छात्रों का भविष्य क्या होगा? क्योंकि अब मार्केट के सवाल भी बदल रहे हैं. अब सवाल ये किया जा रहा है कि आपके पास जो डिग्री और स्किल है, उसका इस्तेमाल करके आप क्या कर सकते हैं.

जब एआई कोड लिख सकता है, डेटा का विश्लेषण कर सकता है और तकनीकी समस्याओं के कई समाधान दे सकता है, तो आने वाले समय में कंपनियां किसी ग्रेजुएट से क्या उम्मीद करेंगी? दरअसल डिग्री और नौकरी के बीच का सवाल सिर्फ रोजगार का नहीं, बल्कि काम करने की क्षमता और बदलते कौशल का है कि हम कितने तैयार है और हमारी तैयारी कितनी है? इसे समझने के लिए इंजीनियरिंग का उदाहरण देखते हैं.

इंजीनियरिंग पढ़ने वालों की संख्या कितनी है?

  • शिक्षा मंत्रालय के अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (AISHE) के 2022-23 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में उच्च शिक्षा में कुल करीब 4.46 करोड़ छात्र थे. इनमें इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी से जुड़े पाठ्यक्रमों में करीब 40.83 लाख छात्र थे. यानी कुल उच्च शिक्षा में इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी के छात्रों की हिस्सेदारी करीब 9.2 फीसदी थी.
  • यह बताती है कि भारत में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की पहुंच काफी बढ़ी है. लेकिन सिर्फ ज्यादा छात्र होना यह साबित नहीं करता कि सभी छात्रों को एक जैसी अच्छी शिक्षा मिल रही है.

पढ़ाई और नौकरी के बीच कहां बढ़ रहा है फासला

  • आईआईटी, एनआईटी, आईआईआईटी और कई दूसरे संस्थानों में बेहतर शिक्षक, लैब, रिसर्च और कंपनियों के साथ काम करने के मौके मिलते हैं. लेकिन दूसरी तरफ ऐसे भी बहुत से कॉलेज हैं, जहां पढ़ाई अभी भी किताब, नोट्स और परीक्षा तक सीमित है.
  • यही वजह है कि पढ़ाई और नौकरी के बीच फासला दिखने लगता है. कॉलेज में छात्र परीक्षा पास करने के लिए जानकारी याद कर लेता है, लेकिन नौकरी में उससे उस जानकारी का इस्तेमाल करके असली समस्या हल करने की उम्मीद की जाती है.
  • यानी सवाल सिर्फ ये नहीं है कि छात्र ने क्या पढ़ा, बल्कि ये है कि वह पढ़ी हुई चीज का इस्तेमाल काम में कितना कर सकता है.

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कंपनियों को अब सिर्फ डिग्री नहीं चाहिए

  • नौकरी का बाजार भी तेजी से बदल रहा है. विश्व आर्थिक मंच की 2025 की फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में करीब 30 फीसदी कंपनियां कौशल आधारित भर्ती बढ़ाने की दिशा में हैं. यानी कंपनियां सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि यह भी देखना चाहती हैं कि उम्मीदवार वास्तव में क्या कर सकता है.
  • एआई, मशीन लर्निंग, बड़े डेटा और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में काम बढ़ रहा है. इसके साथ समस्या हल करने, विश्लेषण करने, नई चीजें सीखने और बदलती तकनीक के साथ खुद को अपडेट रखने की क्षमता भी जरूरी हो गई है.
  • सीधी बात ये है कि डिग्री दरवाजा खोल सकती है, लेकिन नौकरी में टिके रहने के लिए काम करना आना जरूरी है.
  • और अब जनरेटिव एआई ने इस चुनौती को और बड़ा कर दिया है. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि छात्र कोई काम कर सकता है या नहीं, बल्कि यह भी है कि वह एआई का इस्तेमाल करके उस काम को बेहतर, तेज और सही तरीके से कितना कर सकता है.

जनरेटिव एआई ने पुरानी पढ़ाई को और चुनौती दे दी

  • कुछ साल पहले तक छात्र को कोड लिखना होता था, प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनानी होती थी या किसी विषय पर असाइनमेंट तैयार करना होता था. आज यही काम जनरेटिव एआई की मदद से कुछ ही मिनट में किया जा सकता है.
  • लेकिन असल सवाल ये है कि अगर किसी छात्र ने एआई से कोड लिखवा लिया, तो क्या वह समझता है कि कोड काम कैसे कर रहा है? अगर एआई ने गलत जवाब दिया, तो क्या वह गलती पकड़ सकता है? किसी इंजीनियरिंग डिजाइन के लिए एआई ने कोई समाधान दिया, तो क्या छात्र यह जांच सकता है कि वह जमीन पर सही और सुरक्षित है या नहीं?
  • यानी अब कॉलेजों को सिर्फ यह नहीं देखना होगा कि छात्र ने जवाब लिखा या नहीं. यह भी देखना होगा कि वह जवाब को समझता है या नहीं और उसकी जांच कर सकता है या नहीं.
  • इसका मतलब यह नहीं है कि छात्रों को एआई से दूर रखा जाए. उन्हें एआई का इस्तेमाल करना सीखना होगा, लेकिन साथ में फंडामेंटल्स, रीजनिंग और वेरिफिकेशन की समझ भी मजबूत करनी होगी.

परीक्षा और असाइनमेंट का तरीका बदलना होगा

  • अगर एआई ने जवाब देना आसान कर दिया है, तो कॉलेजों को यह जांचने का तरीका भी बदलना होगा कि छात्र वास्तव में सोच भी रहा है या नहीं.
  • अगर छात्र को ऐसा सवाल दिया जाए जिसका जवाब इंटरनेट या एआई से सीधे मिल जाए, तो उस सवाल से छात्र की असली क्षमता का पता लगाना मुश्किल होगा.
  • इसकी जगह छात्रों से असली समस्या पर काम कराया जा सकता है. उनसे पूछा जा सकता है कि उन्होंने कोई खास तरीका क्यों चुना? दूसरा तरीका क्यों नहीं चुना? उनके समाधान में क्या कमी है? उन्होंने अपने नतीजे की जांच कैसे की?
  • इस तरह परीक्षा सिर्फ याददाश्त की नहीं, बल्कि सोचने और काम करने की क्षमता की परीक्षा बनेगी.

सिर्फ इंटर्नशिप का प्रमाणपत्र काफी नहीं

  • कॉलेज और कंपनियों के बीच बेहतर तालमेल भी जरूरी है. इंटर्नशिप सिर्फ प्रमाणपत्र लेने के लिए नहीं होनी चाहिए. छात्र को ऐसी समस्या पर काम करने का मौका मिलना चाहिए जिसका इस्तेमाल कंपनी वास्तव में करती हो.
  • एआईसीटीई का इंटर्नशिप पोर्टल छात्रों को कंपनियों, स्टार्टअप, एमएसएमई और दूसरे संस्थानों में इंटर्नशिप के अवसरों से जोड़ता है. लेकिन असली फायदा तभी होगा जब इंटर्नशिप में छात्र को सिर्फ औपचारिक काम न देकर कुछ सीखने और करने का मौका मिले.
  • यानी कॉलेज को इंटर्नशिप की संख्या नहीं, उसकी गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा. छात्र ने कितने प्रमाणपत्र जुटाए, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उसने कितनी वास्तविक समस्याओं पर काम किया और उनसे क्या सीखा.

शिक्षकों भी बदलनी होगी अपनी भूमिका

  • एआई के दौर में शिक्षक की भूमिका सिर्फ किताब का कंटेंट समझाने तक सीमित नहीं रह सकती.
  • जब छात्र के मोबाइल में ऐसा एआई मौजूद है जो किसी भी विषय को समझा सकता है, कोड लिख सकता है और सवालों के जवाब दे सकता है, तब शिक्षक का असली काम होगा - छात्र को सही सवाल पूछना और गलत जवाब पहचानना सिखाना.
  • छात्र को यह समझाना होगा कि एआई का इस्तेमाल कैसे करें, उसके जवाब की जांच कैसे करें और जरूरत पड़ने पर उसे चुनौती कैसे दें.
  • दूसरे शब्दों में, शिक्षक की भूमिका सिर्फ ज्ञान देने वाले की नहीं, बल्कि समस्या को समझने और समाधान की जांच करने वाले मेंटर की भी होनी होगी.

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डिग्री से आगे अब क्या जरूरी है?

एआई के दौर में जनरेटिव एआई ने काम करने के तरीके बदल दिए हैं. ऐसे में सवाल है कि पहले से ही स्किल और बुनियादी सुविधाओं की कमी झेल रहे छात्रों का भविष्य क्या होगा? क्योंकि अब कंपनियां सिर्फ यह नहीं देखेंगी कि आपके पास कौन-सी डिग्री है, बल्कि यह भी देखेंगी कि आप उस ज्ञान और एआई का इस्तेमाल करके क्या कर सकते हैं.

इसलिए आने वाले समय में छात्रों के लिए सबसे बड़ी चुनौती एआई नहीं, बल्कि एआई के साथ काम करने की क्षमता विकसित करना होगी.डिग्री जरूरी रहेगी, लेकिन उसके साथ मजबूत फंडामेंटल्स, प्रैक्टिकल स्किल, रीजनिंग और वेरिफिकेशन की समझ भी जरूरी होगी.

यानी सवाल आखिर वही है, छात्र के पास डिग्री क्या है, इससे ज्यादा अहम यह होगा कि वह उस डिग्री और एआई की मदद से वास्तव में क्या कर सकता है.

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By गौतम कुमार

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