मंथन और निशांत जैसी फिल्मों के निर्माता श्याम बेनेगल पर 2019 में दर्ज हुआ था राजद्रोह का FIR

Shyam Benegal : श्याम बेनेगल को 18 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुके थे और उनकी पहली ही फिल्म अंकुर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीती थी. श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्मों में यथार्थवादी कहानियों का चयन किया, यानी ऐसी फिल्में जो सच्चाई पर आधारित हों .समाज में व्याप्त जातिवाद, अंधविश्वास और स्त्री-पुरुष के संबंधों को उन्होंने बखूबी अपनी फिल्मों में दिखाया.

Shyam Benegal : भारतीय सिनेमा के लीजेंड श्याम बेनेगल अब नहीं रहे, लेकिन क्या वे समचुम नहीं रहे? यह सवाल इसलिए क्योंकि रचनाएं यानी हिंदी सिनेमा की उत्कृष्ट फिल्में आज भी हमारे बीच हैं. श्याम बेनेगल ने मंथन, अंकुर और भूमिका जैसी फिल्मों के जरिए यथार्थवादी सिनेमा को लोगों से कनेक्ट किया और समाज में एक तरह की क्रांति ला दी थी.

Shyam Benegal :अंकुर और मंथन जैसी फिल्मों ने दिलाई अंतरराष्ट्रीय ख्याति

कांस में स्मिता पाटिल और शबाना आजमी के साथ श्याम बेनेगल

श्याम बेनेगल ने 1973 में अंकुर फिल्म बनाई जो ना सिर्फ काफी चर्चित रही, बल्कि इसके राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी जीता. यह फिल्म शबाना आजमी की पहली रिलीज फिल्म थी, जिसमें उन्होंने लक्ष्मी का बेहतरीन करेक्टर निभाया था. इसके बाद श्याम बेनेगल ने 1975 में निशांत फिल्म बनाई और 1976 में मंथन फिल्म बनाई दोनों ही फिल्में अपनी कहानी की वजह से यूनिक और यथार्थवादी फिल्में थीं. दोनों ही फिल्म ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता था. निशांत फिल्म में किस तरह गांव के जमींदार अपनी यौन इच्छा के लिए गांव के गरीब लोगों का शोषण करते हैं और उनके परिवार वाले भी कुछ नहीं कर पाते हैं, इसपर केंद्रित फिल्म है, जबकि मंथन फिल्म अमूल डेयरी के शुरू होने की कहानी है. इस फिल्म में वर्गीज कुरियन की भी भागीदारी थी जिन्होंने देश में श्वेत क्रांति लाया था.साथ ही 5 लाख किसानों ने इस फिल्म के लिए दो-दो रुपए दिए थे और फिल्म के निर्माता बने थे. उनकी फिल्म मंथन कांस में भी गई थी.

Shyam Benegal : मुस्लिम महिलाओं के चरित्र को भी बखूबी किया चित्रित

श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्मों में मुस्लिम महिलाओं के चरित्र को भी बखूबी उकेरा और उनके न्याय किया जिसमें, मम्मो सरदारी बेगम और जुबैदा उनकी यादगार फिल्में हैं. तीनों ही फिल्मों ने राष्ट्रीय फीचर फिल्म का पुरस्कार जीता.

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श्याम बेनेगल ने जीते थे 18 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

श्याम बेनेगल कितने बड़े निर्देशक थे उसे इस बात से समझा जा सकता है कि उन्होंने कुल 18 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता. उनकी पहली पहली ही फिल्म अंकुर को दूसरी सबसे बेहतरीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के लिए चुना गया था. श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्मों में वास्तविक कहानियों को चुना और उनके लोकेशन पर वास्तविक होते थे, जिसकी वजह से उनकी फिल्में एकदम सच के करीब लगती थीं. श्याम बेनेगल ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया और यात्रा जैसे सीरियल भी दूरदर्शन के लिए बनाए.

श्याम बेनेगल और गुरुदत्त थे भाई

गुरु दत्त और श्याम बेनेगल

श्याम बेनगल और मशहूर फिल्म निर्माता और निर्देशक गुरुदत्त रिश्ते में भाई थे.गुरुदत्त की नानी और श्याम बेनेगल की दादी बहनें थीं. श्याम बेनेगल ने अपने करियर की शुरुआत मुंबई स्थित विज्ञापन एजेंसी लिंटास एडवरटाइजिंग में कॉपीराइटर के तौर पर की थी. बाद में उन्होंने डाॅक्यूमेंट्री फिल्में बनाईं और 1973 में पहली फीचर फिल्म अंकुर बनाया था.श्याम बेनेगल का जन्म हैदराबाद में हुआ था. उन्होंने हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए की डिग्री प्राप्त की.श्याम बेनेगल ने इंडिया बुक हाउस की पूर्व संपादक नीरा मुखर्जी से विवाह कियाथा और उनकी एक बेटी है पिया बेनेगल, जो मशहूर कॉस्ट्यूम डिजाइनर हैं. श्याम बेनेगल ने 1966 और 1973 के बीच पुणे स्थित भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान (FTII) में पढ़ाया और दो बार संस्थान के अध्यक्ष के रूप में कार्य भी किया. उन्हें 1976 में पद्मश्री, 1991 में पद्मभूषण और 2005 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया था.

पीएम मोदी को खुला पत्र लिखकर आए थे विवादों में

श्याम बेनेगल 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे गए एक खुले पत्र की वजह से विवादों में आ गए थे और उनके खिलाफ राजद्रोह का एफआईआर भी दर्ज किया गया था. उस वक्त बेनेगल ने यह कहा था कि यह खुला पत्र है, एक अपील है प्रधानमंत्री से ना कि कोई धमकी. हम सिर्फ यह मांग कर रहे थे कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा रूके और जय श्रीराम नारे को भड़काऊ नारे में ना बदलने दिया जाए.

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Published by: Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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