देश की 50% महिलाओं में खून की सख्त कमी, एक स्वस्थ बच्चे को कैसे देंगी जन्म ?

Poshan Pakhwada 2025 : झारखंड की 66% के करीब महिलाएं एनीमिया जैसी गंभीर बीमारी का शिकार हैं. गर्भवती माताओं में यह आंकड़ा 57% के आसपास है. एक कुपोषित महिला के गर्भ से जो बच्चा जन्म लेगा, वह भी कुपोषण का शिकार ही होगा, यह बात सरकार को समझनी चाहिए. पोषण पखवाड़ा के दौरान सिर्फ संकल्प लेने से देश से कुपोषण नहीं मिटेगा, मिटेगा धरातल पर काम करने से. महिलाओं को पोषाहार उपलब्ध कराने और उन्हें यह समझाने की भी सख्त जरूरत है कि उसका स्वास्थ्य ठीक होगा, तभी एक स्वस्थ परिवार इस देश में पनपेगा.

Poshan Pakhwada 2025 : भारत की आधी आबादी महिलाओं की है और उनके स्वास्थ्य का मसला देश के लिए गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है. NFHS-5 के अनुसार देश में 50 प्रतिशत से अधिक महिलाएं एनीमिया यानी खून की कमी की शिकार हैं. पोषण पखवाड़े की देश में शुरुआत हो गई है, लेकिन इससे महिलाओं की स्थिति में कितना सुधार होगा यह अभी बताना बहुत कठिन है.

देश की 50% आबादी खून की कमी से ग्रस्त


भारतीय समाज में महिलाओं की परवरिश इस तरह की जाती है कि बचपन से ही उनके स्वास्थ्य और खान-पान पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है, जिसकी वजह से उनके शरीर में कई तरह के पोषक तत्वों की कमी हो जाती है. उसके बाद हर महीने होने वाले पीरियड्‌स और कम उम्र में मां बनने की वजह से भी महिलाओं में खून की कमी हो जाती है. एनीमिया को लेकर महिलाओं में जागरूकता की भी कमी है, जिसकी वजह से जब बीमारी की शुरुआत होती है, तो वे समझ नहीं पाती हैं कि उन्हें क्या समस्या हो रही है. जबतक उन्हें बीमारी का पता चलता है, मामला गंभीर हो चुका होता है और उसपर नियंत्रण भी मुश्किल हो जाता है.

झारखंड और बिहार में एनीमिया की स्थिति बहुत गंभीर

केंद्र सरकार ने 2018 में देश से कुपोषण को मिटाने के लिए पोषण अभियान की शुरुआत की थी, जिसका उद्देश्य 2022 तक देश को कुपोषण से मुक्त करना था, लेकिन यह 2025 में भी संभव नहीं हुआ है. बिहार और झारखंड दो ऐसे राज्य हैं जहां कुपोषण की स्थिति गंभीर है. झारखंड में 66% महिलाएं कुपोषण की शिकार हैं, जबकि बिहार में यह आंकड़ा 63.1% का है. पोषण को लेकर इन क्षेत्रों में जानकारी का भी सख्त अभाव है, जिसकी वजह से वे अपने आहार पर ध्यान ही नहीं देती हैं और संतुलित आहार नहीं लेती हैं.झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने मसले पर कहा कि स्थिति गंभीर तो है, लेकिन सरकार प्रयास कर रही है. महिलाओं को पोषाहार उपलब्ध कराया जा रहा है नि:संदेह कुछ समय में परिस्थितियां बदलेंगी, थोड़ा समय इस काम को पूरा करने के लिए सरकार को चाहिए.

Also Read : अगर आप मुसलमान नहीं है, तब भी जानें क्या है वक्फ संशोधन बिल की बड़ी बातें, जो बदल देंगी मुसलमानों का जीवन

वक्फ बिल पास हुआ तो मुसलमानों के जीवन में क्या होगा बदलाव? सरकार की नीयत पर क्यों उठ रहे सवाल

हिंदू और मुसलमान के बीच भारत में नफरत की मूल वजह क्या है?

Magadha Empire : अजातशत्रु के बेटे उदयिन ने की थी पटालिपुत्र की स्थापना, लेकिन अन्य शासक निकले नाकाबिल

विभिन्न विषयों पर एक्सप्लेनर पढ़ने के लिए क्लिक करें

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Author: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

Read More

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >