सरकारी भर्ती परीक्षाओं को लेकर विवादों के पीछे क्या है कारण ? जानिए सिस्टम में कहां है गड़बड़ी

सरकारी भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक और दूसरी गड़बड़ियों के कारण अभ्यर्थियों का भरोसा टूट रहा है. पेपर लीक सिर्फ एक कारण नहीं है, असली समस्या पूरी भर्ती प्रक्रिया की खामियों में छिपी है. जानिए, सिस्टम में कहां चूक हो रही है और अभ्यर्थियों का भरोसा कैसे लौट सकता है.

झारखंड सरकार के साथ छात्रों की रविवार को कई दौर की बातचीत के बाद भी समाधान नहीं निकला. नतीजा यह हुआ कि छात्र सोमवार को रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से विधानसभा की ओर बढ़ गए. झारखंड में जारी छात्रों का यह आंदोलन सरकारी भर्ती परीक्षाओं की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.

लेकिन यह सिर्फ झारखंड की कहानी नहीं है. देश के दूसरे राज्यों में भी पेपर लीक, नकल, सॉल्वर गैंग, प्रश्न पत्र की गोपनीयता भंग होने और परीक्षा रद्द होने जैसी घटनाएं सामने आती रही हैं. पिछले कुछ वर्षों में ऐसे मामलों ने भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर लगातार सवाल खड़े किए हैं.

लेकिन सवाल यह है कि क्या समस्या सिर्फ पेपर लीक तक सीमित है? या भर्ती परीक्षाओं की पूरी प्रक्रिया में ही ऐसे लूपहोल हैं, जिनका बार-बार फायदा उठाया जाता है?

कितना बड़ा है देश में भर्ती परीक्षाओं का संकट?

इस सवाल का जवाब सिर्फ पेपर लीक की संख्या गिनकर नहीं मिलेगा. असली संकट तीन स्तरों पर दिखाई देता है.

परीक्षा की विश्वसनीयता, भर्ती प्रक्रिया में लगने वाला समय और अभ्यर्थियों का व्यवस्था पर भरोसा

  • पिछले कुछ वर्षों में सरकारी भर्ती परीक्षाओं के साथ-साथ प्रवेश और दूसरी सार्वजनिक परीक्षाओं में भी पेपर लीक, नकल और दूसरी अनियमितताओं के मामले सामने आए हैं.
  • केंद्र सरकार ने 2024 में Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act लागू किया. इस कानून में पेपर लीक, उत्तर कुंजी से जुड़ी गड़बड़ी और परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल जैसी गतिविधियों के खिलाफ सजा का प्रावधान किया गया है. यह कानून UPSC, SSC, रेलवे भर्ती बोर्ड, NTA और केंद्र सरकार की दूसरी अधिसूचित सार्वजनिक परीक्षाओं पर लागू होता है.
  • 2026 में सरकार ने इस कानून को और सख्त करने के लिए संशोधन विधेयक भी लोकसभा में पेश किया है. इसमें सजा बढ़ाने, जांच के लिए विशेष टास्क फोर्स, जांच पूरी करने की समयसीमा और मामलों के लिए विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट जैसे प्रावधान प्रस्तावित हैं.

लेकिन कानून सख्त होने के बावजूद एक सवाल अपनी जगह बना हुआ है.

तो क्या सख्त कानून से व्यवस्था भरोसेमंद हो जाएगी?

क्योंकि पेपर लीक होने के बाद दोषी को सजा देना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी यह समझना है कि पेपर लीक कैसे हुआ  ?

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कहां होती है भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी?

भर्ती परीक्षा सिर्फ एक दिन का इम्तिहान नहीं होती. इसके पीछे महीनों की तैयारी और एक लंबी प्रक्रिया होती है.

पेपर तैयार होने से लेकर उसकी छपाई, सुरक्षित रखे जाने, परीक्षा केंद्र तक पहुंचने, परीक्षा कराने, कॉपियां या OMR शीट जमा करने, जांच और फिर रिजल्ट जारी करने तक कई पड़ाव होते हैं.

इनमें से किसी एक जगह भी चूक पूरी परीक्षा पर सवाल खड़ा कर सकती है. इसलिए हर बार पेपर लीक होने के बाद सिर्फ यह पूछना कि पेपर किसने लीक किया, काफी नहीं है. जबकि सवाल यह होना चाहिए कि पेपर लीक हुआ ही कैसे?

  • पेपर किसके पास था?
  • उसकी पहुंच किन लोगों तक थी?
  • प्रिंटिंग और ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था कितनी सुरक्षित थी?
  • परीक्षा केंद्र पर प्रश्न पत्र कब और कैसे खोला गया?
  • अगर पेपर डिजिटल तरीके से भेजा गया तो उस सिस्टम की निगरानी कौन कर रहा था?
  • और सबसे अहम सवाल...
  • इन सभी चरणों की जिम्मेदारी किसकी थी?

यही वह हिस्सा है जहां भर्ती परीक्षा को सिर्फ ‘पेपर लीक’ की घटना के बजाय एक पूरी प्रक्रिया के तौर पर देखने की जरूरत है.

परीक्षा कराने वाली एजेंसी कितनी जवाबदेह है?

कई बार आयोग या सरकार परीक्षा की जिम्मेदारी किसी बाहरी एजेंसी को देती है.जो परीक्षा करवाती है

लेकिन सवाल है कि उसकी निगरानी कौन करेगा?

एजेंसी को प्रश्नपत्र, उम्मीदवारों के डेटा और परीक्षा से जुड़ी दूसरी संवेदनशील जानकारी तक कितनी पहुंच होगी?

अगर परीक्षा में गड़बड़ी होती है तो जवाबदेह कौन होगा?

सरकार? आयोग? परीक्षा कराने वाली एजेंसी?

या फिर उस एजेंसी के कर्मचारी?

अगर जिम्मेदारी कई स्तरों में बंटी हुई है, तो क्या जवाबदेही भी उसी तरह साफ तौर पर तय है?

यही वजह है कि किसी भी भर्ती परीक्षा में agency accountability एक अहम मुद्दा बन जाता है.

क्योंकि परीक्षा कराने की जिम्मेदारी बाहर की एजेंसी को देने से सरकार या आयोग की जवाबदेही खत्म नहीं हो जाती.

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पेपर लीक के बाद सिर्फ परीक्षा रद्द क्यों?

पेपर लीक होने के बाद आमतौर पर सबसे पहला कदम परीक्षा रद्द करना और दोबारा परीक्षा कराना होता है.

यह जरूरी भी हो सकता है, क्योंकि अगर परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठ गया है तो उसी परिणाम के आधार पर भर्ती करना मुश्किल है.

लेकिन यहां एक दूसरा सवाल भी है कि उस परीक्षा में ईमानदारी से शामिल हुए लाखों अभ्यर्थियों का क्या? जिन्होंने परीक्षा की तैयारी की.

समय लगाया.

पैसा खर्च किया.

कई उम्मीदवारों के लिए उम्र सीमा भी मायने रखती है और फिर एक दिन उन्हें पता चलता है कि परीक्षा रद्द हो गई.

अब उन्हें फिर से वही तैयारी करनी है.

फिर वही परीक्षा देनी है और सबसे बड़ी बात कि फिर उसी सिस्टम पर भरोसा करना है.

यानी पेपर लीक का नुकसान सिर्फ उस दिन नहीं होता जिस दिन प्रश्नपत्र बाहर आता है या परीक्षा रद्द कर दी जाती है, बल्कि उसका असर महीनों और कई बार वर्षों तक चलता है.

भर्ती में देरी भी उतनी ही बड़ी समस्या है

दरअसल, भर्ती परीक्षाओं की समस्या सिर्फ पेपर लीक नहीं है. भर्ती में होने वाली देरी भी अभ्यर्थियों के लिए बड़ी परेशानी है.

विज्ञापन निकलने से लेकर परीक्षा, रिजल्ट, दस्तावेज जांच और नियुक्ति तक अगर दो-तीन साल लग जाएं, तो अभ्यर्थी की तैयारी के साथ-साथ उसकी उम्र भी आगे बढ़ती जाती है.

कई बार एक परीक्षा का रिजल्ट दूसरी परीक्षा की तैयारी को प्रभावित करता है.

  • कहीं भर्ती प्रक्रिया अदालत में चली जाती है.
  • कहीं कटऑफ को लेकर विवाद होता है.
  • कहीं आरक्षण या पदों की संख्या को लेकर मामला अटक जाता है.
  • और कई बार अभ्यर्थी सिर्फ अगली तारीख का इंतजार करता रह जाता है.

इस पूरी प्रक्रिया में एक चीज लगातार बढ़ती रहती है. अनिश्चितता और उम्मीदवार को यह नहीं पता होता.

  • परीक्षा कब होगी.
  • रिजल्ट कब आएगा.
  • भर्ती कब पूरी होगी.
  • और आखिर में नियुक्ति मिलेगी भी या नहीं.

बात सिर्फ पेपर लीक की नहीं, भरोसे की भी है

दरअसल, भर्ती परीक्षाओं का संकट सिर्फ पेपर लीक का संकट नहीं है. यह भरोसे का संकट भी है.

जिस अभ्यर्थी ने दो-तीन साल किसी परीक्षा की तैयारी में लगा दिए, उसके लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस परीक्षा में वह बैठने जा रहा है, उसका नतीजा उसकी मेहनत से तय होगा या सिस्टम की किसी गड़बड़ी से?

एक बार किसी परीक्षा में पेपर लीक हो गया या परीक्षा रद्द हो गई, तो सिर्फ उस परीक्षा में बैठे छात्रों का नुकसान नहीं होता.

अगली परीक्षा देने वाले छात्रों के मन में भी शक पैदा होता है.उन्हें लगने लगता है कि

  • मेहनत करने के बाद भी पता नहीं परीक्षा अपने समय पर होगी या नहीं.
  • पेपर लीक होगा या नहीं.
  • रिजल्ट कब आएगा.

और अगर रिजल्ट आ भी गया तो भर्ती पूरी होगी या मामला अदालत में चला जाएगा. यानी एक परीक्षा में हुई गड़बड़ी का असर सिर्फ उस परीक्षा तक सीमित नहीं रहता. वह अगली परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर भी असर डालता है.

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गड़बड़ी होने से पहले क्या करता है सिस्टम

भर्ती परीक्षा की असली चुनौती यह है कि गड़बड़ी होने से पहले सिस्टम कितना मजबूत है. यानी सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि पेपर लीक करने वाले को कितनी सजा मिलेगी? सवाल यह भी होना चाहिए कि पेपर लीक होने की गुंजाइश ही क्यों हुई?

  • किस स्तर पर सुरक्षा कमजोर थी?
  • किस स्तर पर निगरानी नहीं हुई?
  • किस स्तर पर जवाबदेही तय नहीं थी?
  • और क्या उस कमजोरी को अगली परीक्षा से पहले ठीक किया गया?

तो गड़बड़ आखिर है कहां ?

अगर पूरी प्रक्रिया को देखें तो समस्या किसी एक जगह नहीं है. पेपर लीक उसका सबसे ज्यादा दिखाई देने वाला हिस्सा है.

लेकिन उसके पीछे प्रश्नपत्र की सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, बाहरी एजेंसियों की जवाबदेही, डिजिटल सिस्टम की सुरक्षा, रिजल्ट प्रक्रिया, शिकायत निवारण और भर्ती में होने वाली देरी जैसे कई सवाल जुड़े हुए हैं.

इसलिए हर बार सिर्फ एक आरोपी को पकड़ लेने या परीक्षा दोबारा करा देने से समस्या खत्म नहीं होती.

जरूरत यह देखने की है कि जिस सिस्टम में गड़बड़ी हुई, वह गड़बड़ी होने तक पहुंचा कैसे? और उसे दोबारा होने से रोकने के लिए क्या बदला गया?

क्योंकि अगर सिस्टम में वही कमजोरी बनी रहती है, तो एक परीक्षा के बाद दूसरी परीक्षा में भी वही सवाल खड़े हो सकते हैं.

झारखंड का सवाल सिर्फ झारखंड का नहीं है

झारखंड में सड़क पर उतरे छात्र सिर्फ एक परीक्षा का जवाब नहीं मांग रहे. उनका सवाल उस पूरी व्यवस्था से है जिसमें उन्हें परीक्षा देने से पहले ही यह भरोसा नहीं रहता कि परीक्षा समय पर होगी, निष्पक्ष होगी और उसका परिणाम समय पर आएगा.

यही सवाल देश के दूसरे राज्यों के उन अभ्यर्थियों का भी है, जिन्होंने पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने या भर्ती में देरी का सामना किया है.

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By गौतम कुमार

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