मणिपुर की सनातन यात्रा - 1: जहां सनातन ने किसी पर विजय नहीं पाई, बल्कि एक सभ्यता का हिस्सा बन गया

मणिपुर को हमने अक्सर सुर्खियों में देखा है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी कहानी खबरों में नहीं मिलती. लेखक डियाना चिंगाखम बताती हैं कि कैसे इस पूर्वोत्तर राज्य में सनामाही और वैष्णव परम्पराएं टकराईं नहीं, बल्कि साथ मिलकर एक ऐसी सांस्कृतिक विरासत बनीं, जिसकी मिसाल पूरे भारत में दुर्लभ है.

जोहार. आज 29 जुलाई है. 

कल से सावन का महीना शुरू हो रहा है. अगले तीन-चार महीनों तक हम पूरी तरह से भक्ति के सागर में डूब जाएंगे. इसी को ध्यान में रखते हुए, हम सनातनी आस्था और क्षेत्रीय दृष्टिकोण पर एक विशेष सीरीज शुरू कर रहे हैं. आज के पहले एपिसोड में, हम Manipur की सनातनी विरासत की यात्रा करेंगे. 

सनातन यात्रा: मणिपुर 

मणिपुर के बारे में आप क्या जानते हैं?

मैंने यह सवाल डियाना चिंगाखम से नहीं, बल्कि खुद से पूछा.

मन में जो तस्वीर उभरी, वह शायद वही थी जो पिछले कुछ वर्षों में पूरे देश ने देखी है- समाचार चैनलों की बहसें, इंटरनेट बंद होने की खबरें, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और हिंसा की भयावह तस्वीरें. 

लेकिन फिर एक दूसरा सवाल आया...

क्या किसी राज्य की पहचान सिर्फ उसकी सबसे कठिन घड़ी से तय की जा सकती है? क्या काशी को सिर्फ उसकी भीड़ से, राजस्थान को सिर्फ उसके रेगिस्तान से या कश्मीर को सिर्फ उसकी राजनीति से समझा जा सकता है?

शायद नहीं.

फिर मणिपुर को भी केवल सुर्खियों से क्यों समझा जाए?

इसी जिज्ञासा के साथ मेरी बातचीत शुरू हुई लेखक और मार्केटिंग पेशेवर डियाना चिंगाखम से. बातचीत के पहले ही कुछ मिनटों में उन्होंने एक ऐसी बात कही जिसने पूरी चर्चा का स्वर बदल दिया.

वह मुस्कुराते हुए बोलीं,

अगर आप सचमुच मणिपुर को समझना चाहते हैं, तो सुबह चार बजे उठिए. हमारा मणिपुर दिन चढ़ने के बाद नहीं, सूरज निकलने से पहले अपना परिचय देता है.

उनकी यह बात किसी कविता जैसी लगी. लेकिन जैसे-जैसे वह मणिपुर की सुबह का चित्र खींचती गईं, एहसास हुआ कि यह कविता नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी है.

सुबह की पहली किरणें जब इंफाल घाटी को छूती हैं, तब लोकटक झील का पानी सोने की तरह चमकने लगता है. दूर पहाड़ियों के पीछे से सूरज निकल रहा होता है. हवा में हल्की ठंडक रहती है और मंदिरों की घंटियां धीरे-धीरे पूरे वातावरण को भरने लगती हैं. किसी घर का दरवाजा खुलता है.

घर की महिला स्नान करके आती है, माथे पर गोपी चंदन लगाती है, दीपक जलाती है. लेकिन उसकी पूजा यहीं समाप्त नहीं होती. वह पहले सनामाही देवता को प्रणाम करती है और फिर भगवान कृष्ण तथा विष्णु की आराधना करती है.

मैंने बीच में ही टोका-

मतलब... एक ही घर में दोनों परम्पराएं?

डियाना ने मुस्कुराकर कहा,

हां. और हमारे लिए इसमें कोई टकराव भी नहीं है.

...और यहीं से मणिपुर की कहानी बाकी भारत से अलग हो जाती है.

हम अक्सर इतिहास को इस तरह पढ़ते हैं, जैसे एक परंपरा दूसरी को हटाकर उसकी जगह ले लेती है. लेकिन मणिपुर का इतिहास इस आसान फॉर्मूले में फिट नहीं बैठता. यहां सनातन धर्म आया, लेकिन उसने पहले से मौजूद परंपराओं को मिटाया नहीं. उसने उन्हें अपने भीतर समेट लिया. शायद यही कारण है कि मणिपुर को समझने के लिए केवल इतिहास नहीं, उसकी संवेदनाओं को भी पढ़ना पड़ता है.

डियाना कहती हैं,

हमारे बुज़ुर्ग हमेशा कहते थे कि पेड़ केवल पेड़ नहीं होते, पहाड़ केवल पत्थर नहीं होते और जल केवल पानी नहीं होता. हर चीज में एक चेतना है

यही था मणिपुर का प्राचीन आध्यात्मिक संसार.

आज हम जिसे मणिपुर कहते हैं, उसका प्राचीन नाम कांगलेइपाक था.

यह केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं था, बल्कि अपनी भाषा, अपनी लिपि, अपने राजवंश और अपने सांस्कृतिक आत्मविश्वास वाला एक संगठित राज्य था. इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका इतिहास केवल लोककथाओं में नहीं, बल्कि लिखित रूप में भी सुरक्षित है.

चैथारोल कुम्बाबा नामक राजकीय इतिहास-ग्रंथ लगभग 2000 वर्षों के राजकीय घटनाक्रम का विवरण देता है. जब दुनिया के अनेक समाज अपनी स्मृतियां मौखिक परंपरा में संजो रहे थे, तब मणिपुर उन्हें लिख भी रहा था.

शायद यही कारण है कि मणिपुर की सभ्यता को समझते समय हमें उसे भारत के दूरस्थ सीमा-प्रदेश के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र सांस्कृतिक केंद्र के रूप में देखना चाहिए.

मैंने डियाना से पूछा,

तो क्या उस समय भी यहां वैष्णव परंपरा थी?

उन्होंने सिर हिलाया.

नहीं. उस समय हमारे पूर्वज सनामाही परंपरा का पालन करते थे

सनामाही केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन को देखने का एक तरीका है. इसमें प्रकृति, पूर्वज, धरती, जल, अग्नि और स्थानीय देवताओं के प्रति गहरा सम्मान है. हर गांव का अपना संरक्षक देवता है. हर परिवार की अपनी परंपरा है. मनुष्य स्वयं को प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक हिस्सा मानता है.

दिलचस्प बात यह है कि जिस जीवन-दर्शन को दुनिया आज पर्यावरण संरक्षण और सस्टेनेबल लिविंग जैसे आधुनिक शब्दों में समझाने की कोशिश कर रही है, वह मणिपुर की इस परंपरा में सदियों से स्वाभाविक रूप से मौजूद रहा है.

लेकिन इतिहास कभी स्थिर नहीं रहता.
वह यात्राएं करता है.
लोगों के साथ चलता है.
व्यापार के साथ चलता है.
युद्धों के साथ चलता है.
और कभी-कभी... एक छोटे-से उपहार के साथ भी.
मणिपुर में सनातन धर्म की कहानी भी कुछ ऐसी ही शुरू होती है.

लगभग पंद्रहवीं शताब्दी में मणिपुर के राजा क्याम्बा को पड़ोसी पोंग राज्य के शासक की ओर से एक उपहार मिला. वह सोना-चांदी या कोई युद्ध-हाथी नहीं था. वह थी गरुड़ पर विराजमान भगवान विष्णु की एक छोटी-सी पत्थर की प्रतिमा.

इतिहास की किताबों में यह घटना एक पंक्ति में लिखी मिलती है. लेकिन कभी-कभी इतिहास की दिशा बदलने के लिए एक पंक्ति ही काफी होती है.

राजा क्याम्बा ने उस प्रतिमा को राजमहल की किसी अलमारी में सजाकर नहीं रखा. उन्होंने उसके लिए एक मंदिर बनवाया. आज का बिष्णुपुर मंदिर उसी स्मृति का साक्षी है.

लेकिन अगर आपको लगता है कि यहीं से पूरा मणिपुर अचानक वैष्णव बन गया, तो इतिहास आपको फिर चौंकाएगा.

बंगाल से आए वैष्णव संतों ने यहां केवल पूजा-पद्धति नहीं लाई. वे अपने साथ भक्ति, संगीत, भागवत की कथाएं और कृष्ण के प्रति प्रेम लेकर आए. और सबसे महत्वपूर्ण बात- उन्होंने यहां पहले से मौजूद परंपराओं को मिटाने की कोशिश नहीं की.

डियाना इस पूरे प्रसंग को एक वाक्य में समेट देती हैं.

मणिपुर में सनातन धर्म ने हमारी जड़ों को काटा नहीं, उन्हें और गहरा कर दिया.

यही वाक्य शायद इस पूरी कहानी का सबसे सुंदर सार है.

लेकिन यह तो केवल शुरुआत थी.

अभी इतिहास के मंच पर उस राजा का प्रवेश होना बाकी है जिसने एक सपना देखा... और उस सपने ने मणिपुर की कला, संगीत, नृत्य और भक्ति की दिशा हमेशा के लिए बदल दी.

उस राजा का नाम था- महाराजा भाग्यचंद्र.

मणिपुर की सनातन यात्रा: अचल प्रियदर्शी और डियाना चिंगाखम के साथ

प्रभात खबर सनातन विशेष : मणिपुर की सनातन यात्रा - 2: जब एक राजा ने सपना देखा... और मणिपुर की संस्कृति हमेशा के लिए बदल गई!

प्रभात खबर UPSC पर खास कवरेज कर रहा है, ताकि आपको एक्सपर्ट गाइडेंस के लिए कहीं और न जाना पड़े. UPSC परीक्षाओं से जुड़ी सभी ताजा जानकारी के लिए हमारे साथ जुड़े रहें.


प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By Achal Priyadarshy

अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 32 पुस्तकों के लेखक हैं.

उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.

उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.

साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.

ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;

  1. Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  2. बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  3. International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)

  4. ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)

  5. झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)

  6. जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  7. Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)

  8. उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)

  9. बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)

  10. International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

  11. Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >