भारत-रूस की दोस्ती को टैरिफ वार से तोड़ना चाहता है अमेरिका, क्या होगी हसरत पूरी?

Lindsey Graham : भारत-रूस की दोस्ती काफी पुरानी है. शीत युद्ध के वक्त से ही भारत रूस के साथ खड़ा है. रूस ने भी अपनी दोस्ती को निभाया है और भारत का साथ वैश्विक मंचों पर पूरी मजबूती के साथ दिया है. अब जबकि अमेरिका यह धमकी दे रहा है कि भारत, रूस से तेल आयात करना बंद करे, तो क्या होगा भारत का रुख और अमेरिका की इस धमकी को भारत, चीन और ब्राजील जैसे देश कैसे लेंगे? क्या अमेरिका अपना टैरिफ वार जारी रखेगा या फिर वह अपने रुख में नरमी लाएगा?

Lindsey Graham : अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने भारत, चीन और ब्राजील को खुले तौर पर धमकी दी है कि अगर वे रूस से तेल आयात जारी रखते हैं तो अमेरिका उनकी अर्थव्यवस्था को तहत-नहस कर देगा.लिंडसे ग्राहम ने यह चेतावनी इसलिए दी है ताकि रूस को यूक्रेन के खिलाफ मिलने वाली आर्थिक सहायता को रोका जा सके. लिंडसे ग्राहम ने फाॅक्स न्यूज के साथ बातचीत में भारत, चीन और ब्राजील का नाम लेकर यह चेतावनी दी है कि अमेरिका उनपर 100% तक टैरिफ लगा सकता है.

अमेरिकी सीनेटर क्यों दे रहे हैं ये धमकी?

रूस- यूक्रेन के बीच 24 फरवरी 2022 से पूर्ण युद्ध जारी है, जो अबतक चल रहा है. इस युद्ध में अमेरिका यूक्रेन के साथ खड़ा है और वह उसे लगातार हथियार और अन्य सहायता उपलब्ध करा रहा है. इस स्थिति में वह बिलकुल भी नहीं चाहता है कि रूस, यूक्रेन पर लगातार हमले करता रहे. भारत, चीन, ब्राजील सहित कई अन्य देश रूस से तेल आयात करते हैं, जिससे होने वाली आय का उपयोग वह यूक्रेन के खिलाफ करता है. अमेरिका रूस की इस आय को रोकना चाहता है, इसके लिए जी-7 संगठन ने रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं, जिनमें सैन्य और आर्थिक प्रतिबंध शामिल हैं. रूस पर जी-7 की ओर से जो प्रतिबंध लगाए गए हैं, उनका असर रूस पर इसलिए नहीं दिखता है, क्योंकि रूस को तेल बेचकर पैसे मिल जाते हैं. बस इसी बात से अमेरिका को परेशानी हो रही है और वह उन देशों को धमका रहा है, जो रूस से तेल खरीदते हैं और उसकी मदद कर रहे हैं.

अमेरिका चाहता है रूस का साथ छोड़ दे भारत

अमेरिका यह चाहता है कि भारत रूस का साथ छोड़ दे और पश्चिमी देशों के साथ खड़ा हो जाए,लेकिन भारत इस मुद्दे पर अमेरिका के साथ खड़ा नहीं दिख रहा है. वह रूस के साथ अपनी वर्षों की दोस्ती को तोड़ना नहीं चाहता है. अमेरिका के दबाव के बावजूद भारत ने अमेरिका से तेल खरीदना बंद नहीं किया है. भारत और रूस की दोस्ती वर्षों से चली आ रही है, रूस सिर्फ तेल ही भारत को नहीं बेचता है, वह भारत को सैन्य मदद भी बड़े पैमाने पर देता है.

भारत रूस से कितना तेल खरीदता है?

भारत, रूस से प्रतिदिन 1.8-2.0 मिलियन बैरल तेल प्रतिदिन खरीदता है. यह सूचना राइटर्स के जरिए मिली है. यह एक रिकाॅर्ड है. रूस, भारत को बाजार भाव से सस्ते दर पर तेल बेचता है और रूस से तेल मंगाने में भारत को ज्यादा परेशानी भी नहीं होती है. आवागमन समुद्री मार्ग से होता है, हालांकि इसमें लागत लगता है, लेकिन वह बहुत ज्यादा नहीं होता है. रूस के साथ अपने संतुलित संबंधों को बनाए रखने के लिए भारत रूस के साथ लगातार तेल खरीदता रहता है, वह इसमें किसी तरह का कोई समझौता नहीं करता है.

अमेरिका की धमकी का क्या हो सकता है असर?

भारत ने हमेशा ही मुद्दों के आधार पर अपनी विदेश नीति तय की है, वह किसी खेमे में बंटकर नहीं रहा है. जहां तक बात रूस की है, तो रूस ने हमेशा सार्वजनिक मंचों पर विपरीत परिस्थिति में भारत का साथ दिया है, इसलिए भारत किसी दबाव में आकर रूस का साथ नहीं छोड़ेगा. रूस ने कई बार संयुक्त राष्ट्र में भारत का पक्ष लेने के लिए अपने वीटो पावर का प्रयोग किया है. इस लिहाज से भारत किसी भी दबाव में रूस के खिलाफ तो नहीं जाएगा. हां, यह संभव है कि संबंधों में संतुलन के लिए वह अमेरिका से कूटनीतिक बातचीत करे या यह भी संभव है कि वह रूस से तेल का आयात कुछ कम कर दे, लेकिन वह अमेरिकी धमकी से रूस से संबंध तोड़ देगा यह संभव नहीं है. भारत को सैन्य क्षेत्र में रूस से काफी मदद मिलती है और उनकी जरूरत भारत को अभी भी है. भारत यह कभी नहीं चाहेगा कि रूस के साथ उसके संबंध खराब हों, क्योंकि अगर ऐसा हुआ, तो चीन इसका फायदा उठाएगा, जो भारत के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है.

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Published by: Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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