JPSC-JSSC Protest : बारिश, भूख और उम्मीद के बीच संघर्ष जारी...

झारखंड में चल रहा JPSC-JSSC छात्र आंदोलन सिर्फ भर्ती परीक्षाओं की मांग तक सीमित नहीं है. बारिश, भूख और सीमित संसाधनों के बीच छात्र एक-दूसरे का सहारा बनकर इंसानियत, एकजुटता और सामुदायिक सहयोग की अनोखी मिसाल पेश कर रहे हैं.

रात के करीब तीन बजे हैं, यूं तो कुछ ही घंटों में सुबह होने वाली है, लेकिन रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में आज भी नींद का सन्नाटा नहीं, बल्कि संघर्ष की आहट शोर कर रही है. जिसकी आवाज बारिश की टप-टप से भी ज्यादा साफ सुनाई दे रही है.

स्टेडियम के एक कोने में प्लास्टिक की चादर की ओट लेकर छात्र मूसलाधार बारिश का सामना कर रहे हैं और बारिश की बूंदें कभी तिरपाल पर दस्तक देती हैं तो कभी अंदर तक रास्ता बना ले रही हैं.

मूसलाधार बारिश के बीच धरनास्थल पर टेंट लगाता आंदोलनकारी छात्र

उसी तिरपाल के नीचे कुछ छात्र भीगी जमीन पर लेटे हुए हैं, जबकि कई अब भी जाग रहे हैं. थोड़ी दूर मोबाइल की टॉर्च की रोशनी दिखाई देती है, जहां कुछ छात्र रात के इस पहर भी खाने की व्यवस्था करने में जुटे हैं. कोई ORS बांट रहा है तो कोई अपने साथियों की दूसरी जरूरतों का ख्याल रख रहा है. यह सिर्फ रात का एक दृश्य नहीं है, बल्कि उस संघर्ष की तस्वीर है, जो हर बीतती रात के साथ और लंबा होता जा रहा है.

दरअसल, 25 जुलाई से झारखंड में JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन को अगर सिर्फ विरोध प्रदर्शन के तौर पर देखा जाए, तो शायद इसकी सबसे बड़ी कहानी छूट जाएगी. जहां दिन हो या रात, गूंजते नारे और भाषण के बीच आंदोलन का एक दूसरा चेहरा सामने आता है, एक ऐसा चेहरा, जहां विरोध से ज्यादा इंसानियत दिखाई देती है.

दिल्ली से पिज्जा, बेंगलुरु से इडली, रांची में उम्मीद

देश के अलग-अलग शहरों में बैठे लोग, जो शायद इन छात्रों से कभी मिले भी नहीं, ऑनलाइन फूड डिलीवरी ऐप्स के जरिए उनके लिए खाना भेज रहे हैं, किसी ने पिज्जा ऑर्डर किया है, किसी ने इडली तो किसी ने पानी की बोतलें. और तो और कई सामाजिक संस्थाओं ने यहां लंगर शुरू कर दिया है...

धरनास्थल पर प्रदर्शन के बीच खाना खाते हुए छात्र

डिलीवरी बॉय जब धरनास्थल पर पहुंचता है, तो अक्सर पूछता है,ऑर्डर किसके लिए ?

जवाब आता है, सबके के लिए है.

कुछ दिन पहले तक यहां एक शिकायत बार-बार सुनाई देती थी, अगर किसी छात्र की तबीयत बिगड़ जाए, तो क्या होगा?

धरनास्थल पर न एंबुलेंस थी, न मेडिकल टीम, लगातार अनशन और बारिश के बीच यह चिंता बढ़ती जा रही थी. कई छात्रों की तबीयत भी बिगड़ रही थी. इस दौरान छात्र ही एक दूसरे का सहयोग करने लगे.

हालांकि मामला उठने के बाद प्रशासन ने एंबुलेंस भेजी, डॉक्टरों की टीम तैनात की गई. अब अनशन पर बैठे छात्रों की नियमित जांच होती है. ऑक्सीजन, शुगर और ब्लड प्रेशर पर नजर रखी जा रही है। यह व्यवस्था देर से आई, लेकिन उससे पहले छात्र खुद एक दूसरे की मदद कर रहे थे.

राजनीति नहीं, सिर्फ छात्र

अगर आप धरनास्थल पर जाएंगे तो सबसे पहले नजर पोस्टरों पर जाती है, जिस पर लिखे स्लोगन बता रहे है कि यह राजनीतिक मंच नहीं है, बल्कि छात्रों का विरोध मंच है.

धरनास्थल पर आंदोलन का 'Code of Conduct' दर्शाता पोस्टर

वहां पहुंचे मीडिया कर्मियों से बात के दौरान छात्र बार-बार यही दोहराते हैं कि यह किसी पार्टी का आंदोलन नहीं है। यह उन युवाओं का संघर्ष है, जिन्होंने वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की और अब भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। मतलब कि आंदोलन की कमान भी छात्रों के हाथ में है और व्यवस्थाएं भी।

रात के गीत

संघर्ष के बीच भी जिंदगी अपनी जगह तलाश ही लेती है, रात के सन्नाटे में कभी-कभी गीतों की आवाज सुनाई देती है. कुछ छात्र गाना गाकर अपने साथियों का मनोबल बढ़ाते हैं जिससे कुछ देर के लिए माहौल हल्का हो जाता है. साथ देने के लिए दो लोग साथ गाने लगते हैं और फिर पूरा समूह इक्कठा हो जाता है.

रात के सन्नाटे में गीत गाकर साथियों का हौसला बढ़ाते प्रदर्शनकारी छात्र

कुछ मिनटों के लिए चेहरों की थकान गायब हो जाती है. मुस्कान लौट आती है. लेकिन गाना खत्म होते ही सब फिर उसी सवाल पर लौट आते हैं,

क्या इस बार हमारी बात सुनी जाएगी?

भूख से बड़ी है भविष्य की चिंता

भोजन की व्यवस्था भी हर दिन आसान नहीं होती, कई बार लोगों द्वारा भेजा गया खाना सभी तक समय पर नहीं पहुंच पाता. ऐसे में कई बार दो रोटियां चार लोगों में बंटती दिखती हैं. कोई बिस्कुट और चिप्स के साथ ही रात का खाना खत्म कर ले रहा. किसी को इसकी जरूरत भी नहीं लग रही...लेकिन कोई शिकायत नहीं कर रहा...

धरनास्थल पर प्रदर्शन के बीच मोबाइल पर पढ़ाई करता एक छात्र

एक छात्र कहता है

अगर यह संघर्ष हमारे भविष्य को बचा दे, तो यह भूख भी मंजूर है.

प्लास्टिक की चादरों के नीचे बैठे, गीली जमीन पर लेटे, आंखों में नींद और चेहरे पर थकान लिए ये छात्र किसी उत्सव का हिस्सा नहीं हैं. यह उन युवाओं की तपस्या है, जो अपने अधिकार, अपने भविष्य और पारदर्शी भर्ती व्यवस्था की मांग को लेकर डटे हुए हैं.

धरनास्थल पर बिस्तर लगाकर सोने की तैयारी करता आंदोलनकारी छात्र

यह आंदोलन फिलहाल अपने राजनीतिक परिणाम का इंतजार कर रहा है, लेकिन मानवीय दृष्टि से यह पहले ही एक ऐसी कहानी बन चुका है, जिसमें संघर्ष के साथ संवेदना, विरोध के साथ अनुशासन और मांगों के साथ इंसानियत भी साफ दिखाई देती है.


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लेखक के बारे में

By गौतम कुमार

गौतम कुमार वर्तमान में प्रभात खबर से जुड़े पत्रकार और लेखक हैं. वे राजनीति, इतिहास, साहित्य, खेल, कानून, लोक संस्कृति और मनोरंजन जैसे विविध विषयों पर लिखते हैं. इसके साथ-साथ  ट्रेंडिंग, यूटिलिटी और वायरल हो रहे जरूरी विषयों पर भी लेखन करते हैं. रिपोर्टिंग या लेखन के दौरान उनका जोर केवल घटनाओं की जानकारी देने पर नहीं, बल्कि उसके पीछे की पृष्ठभूमि, सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ और उसके प्रभाव को समझाने पर रहता है.

अपने पत्रकारिता करियर में गौतम कुमार ने RealisticMedia और दैनिक भास्कर जैसे मीडिया संस्थानों के साथ मिलकर 2 साल से अधिक समय तक काम किया है. पत्रकारिता के अलावा उन्हें डिजिटल कंटेंट लेखन, वीडियो स्क्रिप्टिंग और डिजिटल प्रोडक्शन का अनुभव है.

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