जम्मू-कश्मीर के चुनाव में आमने-सामने हैं पार्टियां, घोषणापत्र के वादों को समझिए

Jammu Kashmir Election 2024 : जम्मू-कश्मीर विधानसभा का चुनाव तीन चरणों में होना है और पहले चरण का मतदान 18 सितंबर को है. विधानसभा की कुल 90 सीटों में से 24 सीट पर 18 सितंबर को मतदान होगा. इस बार जम्मू-कश्मीर में किसकी सरकार बनेगी इसपर पूरे देश की नजर है, हर आम और खास यह जानना चाहता है कि जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद वहां क्या बदलाव हुए और उनका वहां की जनता पर असर कैसा है.

Jammu Kashmir Election 2024 : जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव पर पूरे देश की नजर है, अपने-अपने वोटर्स को रिझाने के लिए पार्टियों ने घोषणापत्र में बड़े-बड़े वादे किए हैं. घोषणापत्र का फोकस आर्टिकल 370 पर है, कोई इसे फिर से बहाल करने की बात कर रहा है, तो कोई इसके फायदे गिनवा रहा है. यहां की प्रमुख पार्टियों में शुमार पीडीपी और नेशनल काॅन्फ्रेंस ने जिस तरह के वादे अपने घोषणापत्र के जरिए कश्मीरियों से किए हैं, उनकी खूब चर्चा हो रही है. इन पार्टियों ने अपने घोषणा पत्र में खुले आम यह कहा है कि अगर वे सत्ता में आए तो जम्मू-कश्मीर का विशेषाधिकार फिर से स्थापित किया जाएगा. इन पार्टियों ने कश्मीर की समस्या को सुलझाने में पाकिस्तान के हस्तक्षेप को भी स्वीकारा है और उसे एक तरह से कश्मीर का स्टेकहोल्डर तक कहा है.

पीडीपी – नेशनल काॅन्फ्रेस के घोषणापत्र में क्या है?

पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस कश्मीर में बीजेपी के अलावा बड़ी पार्टियां हैं, जिनका अच्छा-खासा प्रभाव कश्मीर घाटी में है. पीडीपी चुनावी मैदान में अकेले उतरी है, जबकि नेशनल  काॅन्फ्रेंस का कांग्रेस के साथ गठबंधन है. दोनों ही पार्टियों को पता है कि जम्मू क्षेत्र में उनकी पकड़ बहुत अच्छी नहीं है, यही वजह है कि ये पार्टियां घाटी के इलाके को फोकस कर रही हैं, जहां की आबादी मुस्लिम बहुल है. अबतक कश्मीर के क्षेत्र में बीजेपी को एक भी सीट पर जीत हासिल  नहीं हुई है और अलगावदियों का प्रभाव भी यहां ज्यादा रहा है.  पीडीपी और नेशनल  काॅन्फ्रेंस दोनों ने ही अपना घोषणा पत्र अगस्त महीने में जारी किया है.

पीडीपी और नेशनल काॅन्फ्रेंस दोनों ने ही अपने घोषणा पत्र में यह कहा है कि वे आर्टिकल 370 को पुनर्बहाल  करेंगे. पीडीपी ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि 2019 में आर्टिकल 370 और 35ए को असंवैधानिक तरीके से रद्द कर दिया गया, जिसकी वजह से कश्मीर का मसला और भी जटिल हो गया है और यहां के लोगों में अलगाव की भावना और गहरी हो गई है. पीडीपी ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि सार्थक सहभागिता यानी कश्मीरियों को साथ लेकर चलने से ही समस्या का समाधान संभव है. पीडीपी ने पाकिस्तान से साथ संबंध सुधारने की बात भी की है और बातचीत की वकालत भी की है. घोषणापत्र में लोक सुरक्षा अधिनियम (पीएसए), गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) और शत्रु अधिनियम को हटाने के लिए प्रयास करने के साथ-साथ सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफस्पा) को हटाने की बात भी कही गई है. 

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नेशनल काॅन्फ्रेंस ने भी पीडीपी की तरह ही आर्टिकल 370 और 35ए को बहाल करने की बात कही है और वो तमाम बातें भी अपने घोषणापत्र में कही है, जो पीडीपी कह रही है. जम्मू-कश्मीर की दोनों बड़ी पार्टियां जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को पुन: बहाल करने की कोशिश करना चाहती है और इसके लिए वे अपने वोटर्स से वादा भी कर रही हैं. इसके अलावा नेशनल काॅन्फ्रेंस भी उन तमाम चीजों को फिर से बहाल करने का वादा कर रही है, जिससे कश्मीर को विशेषाधिकार मिलता है. इसके साथ ही नेशनल काॅन्फ्रेंस ने शंकराचार्य पर्वत का नाम बदलकर तख्त ए सुलेमान करने का वादा भी किया है और हरि पर्वत का नाम कोह-ए-मरान  करने का वादा भी किया है. 

क्या हैं बीजेपी और कांग्रेस के वादे

बीजेपी इस चुनाव में अपने विकास कार्यों को लेकर उतरी है, वो जनता को यह बताना चाह रही है कि आर्टिकल 370 के हटने के बाद उन्हें कितनी सुविधाएं मिली हैं. आतंकवाद पर लगाम कसी गई है. आवागमन के साधन बढ़े हैं. कल्याणकारी योजनाओं की बात हो रही है. बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र में 25 गारंटी दी हैं, जिनमें श्वेत पत्र जारी करना और आतंकवाद के सभी पीड़ितों के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करना और कश्मीर में 100 मंदिरों का जीर्णोद्धार करना शामिल है. साथ ही कश्मीरी पंडितों की घर वापसी, पांच लाख रोजगार का सृजन और मेट्रो जैसे वायदे भी हैं. वहीं कांग्रेस यह कह रही है कि वह कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलवाएगी और उनके अधिकारों को सुनिश्चित करेगी. कांग्रेस जम्मू-कश्मीर में बहुत मजबूत स्थित में नहीं है इसलिए वो 370 पर कुछ नहीं कह रही है.

जम्मू और कश्मीर के लोगों के मुद्दे अलग हैं : अनिल आनंद

वरिष्ठ पत्रकार और जम्मू-कश्मीर मामलों के जानकार अनिल आनंद बताते हैं कि जम्मू और कश्मीर के लोगों के मुद्दे बिलकुल अलग हैं. यही वजह है कि जो पार्टियां कश्मीर में ज्यादा प्रभावी हैं, वे आर्टिकल 370 को बहाल करने की बात कर रही हैं, जिसमें महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी और नेशनल काॅन्फ्रेंस दोनों शामिल हैं. अब तो इंजीनियर राशिद भी मैदान में आ गए हैं. कांग्रेस जम्मू-कश्मीर में अपने बल पर चुनाव नहीं लड़ रही है, यही वजह है कि उसका स्टैंड भी 370 को लेकर थोड़ा अलग है, वो इसे फिर से बहाल करने की बात तो नहीं कर रही है, लेकिन वो बीजेपी के मत से सहमत भी नहीं है. कांग्रेस स्टेटहुड की बात कर रही है. आर्टिकल 370 को लेकर भी अब परिस्थितियां काफी बदली हैं.

कट्टरपंथ को बढ़ावा देना चाहती है पीडीपी और नेकां : अवधेश कुमार

राजनीतिक विश्लेषक अवधेश कुमार का कहना है कि इस बार के चुनाव में पीडीपी और नेशनल काॅन्फ्रेंस जैसी पार्टियों ने जिस तरह के वादे जनता से किए हैं, उससे यह प्रतीत होता है कि वे जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष दर्जे की ही चाह नहीं रखते बल्कि अलग झंडे और संविधान की चाहत भी रखते हैं. वे ना सिर्फ कट्टरपंथ को बढ़ावा देना चाहते हैं और अलगाववादियों की खुलकर हिमायत कर रहे हैं, बल्कि वे पाकिस्तान के साथ वार्ता के भी इच्छुक हैं. जबकि भारत सरकार लगातार यह कहती रही है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद बंद नहीं करेगा, उससे कोई बातचीत नहीं होगी. 

अवधेश कुमार कहते हैं कि शंकराचार्य पर्वत का नाम तख्त ए सुलेमान करने की बात कहना इस बात का सूचक है कि पीडीपी और नेशनल काॅन्फ्रेंस कश्मीर में अलगाववाद को बढ़ावा देना चाहते हैं और वे यहां कश्मीरी पंडितों की वापसी की बात तो करते हैं,लेकिन उनकी आस्था के प्रतीकों को नष्ट करना चाहते हैं.

अपने वोटर्स को साधने की कोशिश कर रही हैं कश्मीर की पार्टियां : उमेश चतुर्वेदी

राजनीतिक विश्लेषक उमेश चतुर्वेदी कहते हैं कि पीडीपी और नेशनल काॅन्फ्रेंस ने अपने घोषणापत्र में अलगाववाद की बात की है और वे जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 फिर से बहाल करने की बात करते हैं क्योंकि उनका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ अपने वोटर्स को लुभाना है.

राजनीतिक विश्लेषक उमेश चतुर्वेदी कहते हैं कि पीडीपी और नेशनल काॅन्फ्रेंस ने अपने घोषणापत्र में अलगाववाद की बात की है और वे जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 फिर से बहाल करने की बात करते हैं क्योंकि उनका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ अपने वोटर्स को लुभाना है. इसी वजह से पीडीपी और नेशनल काॅन्फ्रेंस जैसी पार्टियां अपने घोषणापत्र में जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष दर्जे की मांग करती हैं और अलगाववाद की बात करती हैं. 

लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि आर्टिकल 370 के समाप्त होने के बाद से जम्मू-कश्मीर में स्थितियां काफी बदल चुकी हैं. आम जनता सूचना क्रांति के युग में है और वह सारी चीजों को देख और समझ रही है. इस बार का चुनाव इस बात की भी परीक्षा साबित होगा कि कश्मीर की जनता आखिर चाहती क्या है? क्या वो सचमुच अलगाववाद की पक्षधर है या फिर यह सिर्फ राजनीतिक नेताओं की बतकही है. आज के संदर्भ में देखा जाए तो कांग्रेस पार्टी भले ही आर्टिकल 370 को बहाल करने की बात कहती हो, लेकिन वह भी यह जानती है कि इस अनुच्छेद की वजह से कितनी परेशानियां शासन चलाने में आती हैं, इसलिए आर्टिकल 370 को फिर से बहाल करना महज यूटोपिया है.

कश्मीरी जनता किसी पार्टी पर विश्वास नहीं कर पा रही है : डाॅ अमीना परवीन

कश्मीर यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफेसर अमीना परवीन कहती हैं कि चुनाव हो रहे हैं और हमारा दायित्व है कि हम वोट दें, तो कश्मीरी वोट देंगे, लेकिन वे किसी भी पार्टी पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं. सारी पार्टियां यह दावा करती हैं कि वो कश्मीरियों का हित चाहती है,लेकिन कश्मीरी हर बार ठगे जाते हैं. वे जिस पर भरोसा करते हैं, वे उनका भरोसा तोड़ते हैं. कश्मीरियों का दुख समझने वाला कोई नहीं है, रोजगार नहीं है, सुविधाएं नहीं है, आम जनता परेशान है, लेकिन उसका निराकरण करने वाला कोई नहीं है. लोग डिग्रियां लेकर बैठे हैं, लेकिन नौकरी नहीं मिल रही है. आर्टिकल 370 था तब भी कश्मीरियों की आवाज दबाई जाती थी आज भी वही स्थिति है. कश्मीरी किसी पाॅलिटिकल पार्टी के खिलाफ बोल नहीं सकता है, वो अपने मुद्दों का समाधान चाहता है, लेकिन कोई पार्टी यह नहीं कर रही है. कश्मीरी को किसी भी पार्टी से कोई उम्मीद नहीं है. लेकिन अगर कोई उनकी बात करेगा, उनके दुख को समझेगा तो वे उसके साथ जाएंगे.

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लेखक के बारे में

Published by: Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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