महिला जननांग विकृति की प्रथा यानी चीख- असहनीय पीड़ा, 2012 से जारी है जंग

Female Genital Mutilation : पितृसत्तात्मक सोच में स्त्री महज एक वस्तु है और उसे एक एक व्यक्ति के अधीन किया गया है, जो उसका भाग्य निर्माता होता है. स्त्री पुरुषों के अधीन रहे और प्राकृतिक सुखों से भी वंचित रहे, इसी सोच के साथ विश्व के कई देशों में आज भी Female Genital Mutilation यानी महिला जननांग विकृति की कुप्रथा मौजूद है. इस कुप्रथा के जरिए स्त्री की यौन इच्छा को दबाया जाता है और इसकी प्रक्रिया इतनी डरावनी और असुरक्षित है कि जब किसी लड़की के साथ यह सबकुछ होता है, तो वह सदमे में चली जाती है. इतना ही नहीं, उसे जीवन भर कई तरह की शारीरिक और मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जो अत्यधिक पीड़ादायी है.

Female Genital Mutilation : महिला जननांग के साथ छेड़छाड़ या उसमें विकृति लाने की कुप्रथा के खिलाफ प्रति वर्ष संयुक्त राष्ट्र की पहल पर 6 फरवरी को जागरूकता अभियान चलाया जाता है और यह कोशिश की जाती है कि महिला जननांग विकृति (FGM) को रोका जाए, क्योंकि इसका उद्देश्य महज महिलाओं के यौन सुख को नियंत्रित करना है. यह एक तरह से पितृसत्तात्मक समाज की घिनौनी सोच का नतीजा है, जो महिलाओं को अपनी संपत्ति के तौर पर देखता है उसे नियंत्रित करने का प्रयास करता है.

क्या है महिला जननांग विकृति या  Female Genital Mutilation?

महिलाओं की यौन इच्छा को दबाने और उन्हें समाज के नियंत्रण में रखने के लिए महिला जननांग विकृति की प्रथा को जिंदा रखा गया है. यह पूरी तरह महिला अधिकारों का हनन है. इस प्रक्रिया के कोई चिकित्सीय लाभ नहीं हैं और इसे करने से महिलाओं को कई तरह की शारीरिक और मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. महिला जननांग विकृति की प्रक्रिया में महिलाओं के जननांग के बाहरी हिस्से को काटकर हटाया जाता है. इस प्रक्रिया को तब किया जाता है जब किसी लड़की की उम्र 5 हो जाती है और उसके युवावस्था में पहुंचने से पहले ही इस प्रथा को पूरा किया जाता है.

FGM के दौरान नहीं रखा जाता है सुरक्षा का ध्यान, जिससे बढ़ती हैं बीमारियां

FGM की क्रिया को बिना डाक्टर की मदद से पूरा किया जाता है और इस काम में जिन औजारों का प्रयोग किया जाता है, वे भी ना तो सुरक्षित होते हैं और ना ही तेज धारदार, जिसकी वजह से महिलाओं में संक्रमण का घोर खतरा रहता है. इस प्रक्रिया को घर की औरतें पूरा करती हैं और ब्लेड, चाकू या फिर कांच के टुकड़े से अंजाम दिया जाता है. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में यह बताया गया है कि जननांग को कई तरह से विकृत किया जाता है. 

  • स्त्री जननांग के अग्रभाग यानी क्लिटोरिस  के कुछ हिस्से को काटना
  • क्लिटोरिस और उसके आसपास की त्वचा को काटना
  • योनि के बाहरी हिस्से को काटकर उसे छोटा बनाया जाता है, इसमें योनि को सिला जाता है.
  • जननांग में छेद करना, उसे खुरचना और जलाना.

महिलाओं के जननांग के साथ जो दुर्व्यवहार किया जाता है, उसके बाद महिलाओं में कई तरह के संक्रमण, दर्द और यौन समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं. यहां तक कि उन्हें पेशाब करने और पीरियड्‌स के दौरान बहुत दर्द होता है. साथ ही शारीरिक संबंध बनाने और प्रसव के दौरान भी उन्हें इन विकृतियों की वजह से पीड़ा झेलनी पड़ती है. जिस वक्त जननांग के साथ यह विकृति की जाती है, उस वक्त बहुत दर्द होता है. काफी खून बहता है और पेशाब करना तक दूभर हो जाता है.

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FGM को संयुक्त राष्ट्र ने माना है स्त्री अधिकारों का हनन

संयुक्त राष्ट्र संघ ने FGM को स्त्री अधिकारों का हनन मानते हुए इसके खिलाफ 2012 से जागरूकता अभियान चलाया है और इसपर पूर्ण प्रतिबंध की बात कही है. यह एक सामाजिक रूढ़िवाद है, जो महिलाओं को नियंत्रित करने के उद्देश्य से किया जा रहा है. इस प्रक्रिया का कोई स्वास्थ्य लाभ नहीं है और सबसे बड़ी वजह यह है कि यह लड़कियों की सहमति के बिना जबरन किया जाता है. FGM एक तरह से महिलाओं को यौन सुख से वंचित करने की प्रक्रिया है.

किन देशों में सबसे अधिक हो रही हैं महिला जननांग विकृति की घटनाएं

महिला जननांग विकृति की सबसे अधिक घटनाएं अफ्रीकी और एशियाई देशों में होती है. इसके अलावा कुछ घटनाएं अमेरिका, यूरोप और आॅस्ट्रेलिया में भी सामने आई हैं. अफ्रीका के सोमालिया, गिनी, इथियोपिया और केन्या जैसे देशों में यह कुप्रथा सबसे ज्यादा देखने को मिलती है. वहीं भारत में यह दाऊदी बोहरा शिया मुसलमानों में भी देखने को मिलता है. हालांकि जागरूकता की वजह से यह कुप्रथा काफी कम हो चुकी है.

महिला जननांग विकृति के खिलाफ केन्या के उमोजा गांव की महिलाओं ने की अनूठी पहल

महिला जननांग विकृति को गलत ठहराते हुए केन्या के उमोजा गांव की महिलाओं ने विरोध का अनूठा तरीका अपनाया है. यहां की महिलाओं ने एक उमोजा गांव को महिला सशक्तिकरण का उदाहरण बनाया है. यहां हर काम महिलाएं करती हैं और उन अधिकारों का उपयोग भी करती हैं, जिनसे उन्हें वंचित किया जाता है. मसलन वे खेती करती हैं, भूमि का अधिकार अपने पास रखती हैं.1990 में रेबेका लोलोसोली और कुछ अन्य महिलाओं ने स्त्रियों को प्रताड़ना से बचाने के लिए इस गांव का निर्माण किया था. यहां किसी भी पुरुष का रहना वर्जित है. इस गांव में ज्यादातर प्रताड़ना की शिकार या प्रताड़ना से बचकर आई महिलाएं रहती हैं. जैसे बलात्कार पीड़ित या फिर महिला जननांग विकृति की शिकार या उससे बचकर भागी लड़कियां. यहां रहने वाली औरतें महिला सशक्तिकरण का उदाहरण हैं. इन्होंने अपनी पहल से सामाजिक कुप्रथाओं का विरोध किया और अपने हक की आवाज बुलंद की है.

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By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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