इमरजेंसी के बाद चुनाव हार कर कैसे रहती थीं इंदिरा? जानें गांधी परिवार की बहुओं से कैसे रहे रिश्ते

Indira Gandhi : भारत की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का 19 नवंबर को जन्मदिन है. उन्हें उनके जीवनकाल में कई नामों से पुकारा गया, जिनमें गूंगी गुड़िया और आयरन लेडी बहुत ही विरोधाभासी और कई सवाल खड़े करने वाला है? आखिर कैसा था इंदिरा गांधी का व्यक्तित्व और अपने रिश्तों को उन्होंने कैसे जीया?

Indira Gandhi : इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवंबर 1917 को तब हुआ था, जब देश आजाद नहीं था. उनके पिता और एक तरह से पूरा परिवार ही स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल था. परिणाम यह हुआ कि इंदिरा का बचपन आम बच्चों की तरह नहीं बीता. वे बेहद अकेली और गुमसुम रहती थीं, पिता अकसर जेल में रहते और मां भी सामाजिक कार्यों में जुटी रहती थीं.

1966 में जब इंदिरा प्रधानमंत्री बनीं थीं, तो उनकी छवि काफी कम बोलने वाली इंदिरा की थी. ऐसे में जब पोखरण1 हुआ तो उनकी छवि एकदम से बदल गई. उनकी गूंगी लड़की की उपाधि आयरन लेडी में बदल गई. उसके बाद जब 1975 में इंदिरा ने देश में इमरजेंसी लगाई तो सहसा लोगों को विश्वास ही नहीं हुआ था कि यह भी सच हो सकता है. इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी की छवि तानाशाह वाली बन गई. इंदिरा के स्वभाव और व्यक्तित्व पर काफी कुछ लिखा गया है, लेकिन उनके घर वाले उनके बारे में क्या सोचते हैं या सोचते थे यह जानने की इच्छा आम जनता को रहती है, क्योंकि वे इन बातों से दूर रहते हैं. इंदिरा के दोनों बेटों की पत्नी यानी दोनों बहुओं ने उनके व्यक्तित्व के बारे में कई बार चर्चा की है.

इंदिरा काफी सहज, मिलनसार और सीख देने वाली थीं

खुशनुमा माहौल में साथ बहू सोनिया और सास इंदिरा

सोनिया गांधी और मेनका गांधी ने कई इंटरव्यू में यह बात कही है -इंदिरा गांधी ने उन्हें मां की तरह संभाला और प्यार दिया. सोनिया गांधी ने इंडिया टुडे और धर्मयुग को दिए इंटरव्यू में यह बताया था कि जब वो पहली बार इंदिरा से मिली थीं तो काफी डरी हुईं थीं. इंदिरा गांधी ने उन्हें समझाया कि डरने की जरूरत नहीं है और उनका हौसला बढ़ाया.

मेनका गांधी ने सिम्मी ग्रेवाल को दिए इंटरव्यू में बताया है- जब मेरी और इंदिरा जी की मुलाकात हुई, तो मुझे पहले ये पता नहीं था कि वो प्रधानमंत्री हैं. जब पता चला संजय की मां प्रधानमंत्री हैं तो मेरी हालत खराब थी. लेकिन वो बहुत प्यार से मिलीं और सबकुछ ठीक हो गया. वे मुझे खाना बनाना भी सिखाती थीं और वो सबकुछ जो जानना जरूरी था.

संजय गांधी सुझाव देते थे, लेकिन फैसला इंदिरा गांधी का होता था

मेनका गांधी ने इंटरव्यू में बताया है कि संजय गांधी के बारे में मीडिया में कई ऐसी बातें चलती हैं, जो बिलकुल बकवास और घटिया हैं. इमरजेंसी के दौरान भी उनकी भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है. वे सुझाव देते थे लेकिन अंतिम फैसला इंदिरा गांधी का होता था. वे एक अच्छी प्रशासक थीं और जानती थीं कि क्या सही है और क्या गलत. संजय गांधी के बारे में यह कहा जाता है कि उन्होंने अपनी मां को थप्पड़ मारा. यह बेहद घटिया बात है. एक मां और बेटे के बीच किस तरह का रिश्ता होता है, यह मैं जानती हूं. मैं भी एक बेटे की मां हूं.

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चुनाव में हार के बाद टूट गईं थीं इंदिरा

इमरजेंसी के बाद जब चुनाव हुआ तो संजय और इंदिरा दोनों चुनाव हार गए, इस हार से इंदिरा टूट गई थीं. वे गुमसुम रहती थीं क्योंकि जब सत्ता नहीं थी तो लोग दूर हो गए थे. वो घर पर रहती थीं, सन्नाटा पसरा रहता था. कोई नौकर और कुक भी नहीं था. परिवार के लोगों ने उस कठिन वक्त को प्यार से काटा, यह इंटरव्यू में मेनका बताती हैं.

संजय की मौत से पहले इंदिरा ने मेनका को कमरे में बंद कर दिया था

मेनका गांधी ने एक इंटरव्यू में बताया है कि संजय को प्लेन उड़ाने का शौक था और जिस दिन उनकी मौत हुई उससे एक दिन पहले वे उसी प्लेन में उन्हें लेकर गए थे और उन्हें बहुत अजीब महसूस हुआ. वो बहुत रोईं और इंदिरा गांधी से यह कहा कि उन्हें यह प्लेन ना उड़ाने का आदेश दें. इंदिरा ने संजय को मना भी किया, लेकिन अगले ही दिन सुबह आठ बजे की करीब मेनका को उठाकर यह कहा गया कि अस्पताल जाना है संजय का एक्सीडेंट हुआ है. एंबुलेंस में संजय को लाया गया और तब इंदिरा गांधी ने उनसे कहा कि वो जीवित हैं और मेनका को एक कमरे में बंद कर दिया. उस कमरे में वो प्रार्थना करती रहीं और कुछ घंटे बाद इंदिरा ने दरवाजा खोलकर बताया कि संजय नहीं रहे. संजय और इंदिरा का रिश्ता बहुत खास था.

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Published by: Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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