India US Trade Deal : क्या मोदी ने ट्रंप को अपनी कूटनीति से झुका दिया, क्या है टैरिफ वार के सुखद अंत का राज?

India US Trade Deal : भारत और अमेरिका के संबंधों की नयी शुरुआत मेड इन इंडिया प्रोडक्ट पर टैरिफ 50% से 18% करने के साथ हुई है. हालांकि अभी तो यह सेलिब्रेशन करने का वक्त नहीं है, क्योंकि अमेरिका बड़े–बड़े दावे कर रहा है. इन हालात में काफी स्पष्टता की जरूरत है, तभी यह कहा जा सकेगा कि अमेरिका, भारतीय कूटनीति के आगे झुका है या फिर बात कुछ और है. हां, यह जरूर हुआ है कि अमेरिका–भारत के रिश्ते पर जो बर्फ की चादर बिछ रही थी, वह टूट गई है, जो एक सकारात्मक कदम है.

India US Trade Deal : भारत और अमेरिका के बीच 2 अप्रैल 2025 से शुरू हुआ टैरिफ वार अंतत: 2 फरवरी 2026 को समाप्त हो गया है. पूरे 10 महीने तक यह वार चला, लेकिन अमेरिकी दबाव के आगे भारत ने घुटने टेकने के बजाय अपने लिए नये विकल्पों की तलाश की और आम जनता के हितों से समझौता नहीं किया. इसे एक तरह से भारतीय कूटनीति की जीत कहा जा सकता है.

प्रधानमंत्री मोदी ने की टैरिफ वार के खात्मे की घोषणा

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देर रात इस बात की घोषणा की कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से बात हुई है और उन्होंने इस बात पर सहमति जताई है कि अब अमेरिका मेड इंडिया प्रोडक्ट्‌स पर 18% टैरिफ ही लगाएगा. पीएम मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप की इस पहल को दोनों देशों के रिश्तों के लिए बेहतर बताया. उन्होंने देश की 1.4 बिलियन जनता की ओर से धन्यवाद भी दिया. वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ने टैरिफ कम करने के पीछे वजह यह बताया है कि भारत ने रूस से तेल खरीदना कम कर दिया है. 

टैरिफ कम होने को किसकी जीत माना जाए?

अमेरिका ने भारत पर लगाए टैरिफ को कम तो कर दिया है, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इसके पीछे की मूल वजह क्या है. क्या भारत के पीएम मोदी की नीतियों ने अमेरिका को टैरिफ कम करने के लिए मजबूर कर दिया या फिर भारत ट्रंप के दबाव में आ गया? इन सवालों पर साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी ने प्रभात खबर कहा कि टैरिफ कम होने के पीछे की वजहों पर अभी बहुत स्पष्टता नहीं है. अमेरिकी राष्ट्रपति और वहां की सरकार जिस तरह के दावे कर रही है, उसमें वे इस कदम को अपनी जीत बता रहे हैं, जबकि भारत की ओर से इसे दोनों देशों के रिश्ते को मजबूत करने वाला कदम बताया गया है. इन हालत में टैरिफ कम करने के फैसले को परिस्थिति के अनुसार लिया गया फैसला कहा जा सकता है. प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी कहते हैं कि पिछले 6–7 महीने में भारत–अमेरिका के रिश्तों में जो कुछ हुआ है, अमेरिका पर बहुत विश्वास करना भी अभी जोखिम भरा हो सकता है. सरकार को हर कदम सोच–समझकर उठाना होगा.

वर्षरूस से तेल का आयात (औसत प्रति दिन)कुल कच्चे तेल के आयात में रूस का हिस्सा
2022लगभग 740,000 16%
2023लगभग 1.77 मिलियन 39%
2024लगभग 1.78 मिलियन 36–37%
2025लगभग 1.47 मिलियन 20–35%

क्या इंडिया–ईयू डील से अमेरिका पर बना दबाव?

टैरिफ को लेकर भारत और अमेरिका के बीच पिछले 10 महीने से खींचतान चल रही थी. अमेरिका ने बार–बार भारत पर इस बात के लिए दबाव बनाया कि वह रूस से तेल खरीदना बंद करे, लेकिन भारत ने हमेशा जनहित को ऊपर रखा और कहा कि भारत अपनी जरूरतों के अनुसार ही अपनी नीतियां तय करेगा. इस बीच भारत ने अमेरिका का विकल्प भी तलाशना शुरू किया. इंडिया–ईयू डील को इसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जा सकता है. धनंजय त्रिपाठी ने बताया कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए डील से बेशक अमेरिका पर दबाव बना, इसके अतिरिक्त और भी कई वजहें हैं, जिन्होंने अमेरिका पर दबाव बनाया. जबसे अमेरिका ने भारत पर टैरिफ लगाया था, उसके अपने ही देश में इसका विरोध हो रहा था.

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भारत–अमेरिका संबंधों को आगे बढ़ाने में हुई नयी शुरुआत : धनंजय त्रिपाठी 

टैरिफ वार के बीच भारत–अमेरिका संबंधों में एक ठहराव आ गया था. दोनों देशों के बीच होने वाले डील पर भी रोक लग गई थी, लेकिन टैरिफ 18% होने से एक नई शुरुआत हुई है. कम से कम कुछ तो हुआ. अभी तो यह कहना कि यह भारत की जीत है, थोड़ा जल्दबाजी में दिया गया बयान होगा, क्योंकि टैरिफ होने के बाद जो कुछ हुआ है, उसमें स्पष्टता नहीं है. भारत की ओर से अभी कोई ऐसा आधिकारिक बयान नहीं है, जो यह बताता हो कि भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है, जबकि अमेरिका इस बात के दावे कर रहा है. इन हालात में यह कहा जा सकता है कि भारत–अमेरिका संबंधों में जो कुछ पिछले कुछ महीनों से चल रहा था, उसे देखते हुए टैरिफ कम करने के फैसले को एक कदम आगे बढ़ाना कहा जा सकता है. साथ ही यह भी कहा जा सकता है कि अभी इस मसले पर काफी स्पष्टता की जरूरत है.

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By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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